संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मन्दराचल! और हे मैनाक! तुम सब लोग अपनी यथोचित सम्मति दो, जिससे वैसा ही किया जाय।' तब बातचीत करनेमें कुशल मेनाने कहा—'नाथ! इस समय आपसमें विचार करनेसे क्या लाभ? यह कार्य तो तभी सम्पन्न हो गया था जब इस बड़भागिनी कन्याने जन्म लिया था। यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भगवान् शिवके लिये ही इसका अवतार हुआ है। अतः यह शिवको ही दी जानी चाहिये। इसने भगवान् रुद्रकी आराधना की है और रुद्रने भी वरदान देकर इसका आदर किया है। महाभागा पार्वती साक्षात् सती ही है। अतः यह शिवको ही ब्याही जाय। वह वैवाहिक कृत्य हमारे द्वारा भगवान् शिवकी पूजामें निमित्त बनेगा।'
मेनाकी यह बात सुनकर हिमवान् बहुत सन्तुष्ट हुए। तदनन्तर सप्तर्षियोंने वहाँसे पुनः लौटकर भगवान् शिवसे उनकी प्रेयसी पार्वतीका सब वृत्तान्त इस प्रकार कहा—'देवेश्वर! गिरिराज हिमवान्ने अपनी कन्या आपको दे दी, इसमें संशय नहीं है। अब देवताओंको साथ ले शीघ्र ही पार्वतीसे विवाह करनेके लिये जाइये।' ऋषियोंका यह वचन सुनकर परमेश्वर शिवने कहा—'विवाह कैसे होगा और कौन-कौन उसमें चलेंगे, यह सब बात विस्तारपूर्वक बताओ।' तब उन ऋषियोंने भगवान् सदाशिवसे हँसकर कहा—'देव! भगवान् विष्णुको बुलाना चाहिये। साथ ही ब्रह्मा, इन्द्र, ऋषिगण, यक्ष, गन्धर्व, नाग, सिद्ध, विद्याधर, किन्नर, अप्सरागण तथा अन्य लोगोंको भी शीघ्र बुलाइये।' ऋषियोंकी यह बात सुनकर महादेवजीने देवर्षि नारदसे कहा—'तुम शीघ्र जाकर भगवान् विष्णुको बुला लाओ। उसके बाद ब्रह्मा, इन्द्र तथा अन्य देवगणोंको भी ले आना।' लोकपावन नारदने भगवान् शिवकी आज्ञा शिरोधार्य की और तुरंत वहाँसे भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् विष्णु एक श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हैं। देवी लक्ष्मी उनकी सेवा कर रही हैं। भगवान्के चार भुजाएँ हैं। वे सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति नील कमलके समान श्याम है। कानोंमें बहुमूल्य रत्नजटित मनोहर कुण्डल झलमला रहे हैं। मस्तकपर परम सुन्दर विशाल मुकुट शोभा पा रहा है, जिसमें जड़े हुए उत्तम रत्नोंकी प्रभासे वे और भी प्रकाशित हो रहे हैं। गलेमें सुन्दर वैजयन्तीकी बनी हुई वनमाला शोभा दे रही है। इस प्रकार त्रिभुवनमें एकमात्र सुन्दर वे सनातन देव विष्णु वैकुण्ठमें विराज रहे हैं।*
ऋषियोंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ नारदजी ब्रह्मवीणा बजाते हुए भगवान् विष्णुके समीप गये और शंकरजीका सन्देश सुनाते हुए बड़े आदरसे बोले—'महाविष्णो! शीघ्र चलिये, महादेवजी विवाहके लिये उतावले हो रहे हैं। उनकी ओरसे सब कार्योंकी व्यवस्था करनेवाले केवल आप ही हैं।' नारदजीकी बात सुनकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन नारदजी तथा पार्षदोंको साथ ले वहाँसे चल दिये। भगवान् विष्णु योगेश्वरोंके भी प्रभु हैं, महान् हैं तथा परमात्मा हैं। वे उस समय गरुड़पर आरूढ़ हो श्रेष्ठ देवताओंके साथ आकाशमार्गसे भगवान् शिवके समीप गये।
* ददर्श देवं परमासने स्थितं श्रिया च देव्या परिसेव्यमानम्।
चतुर्भुजं देववरं महाप्रभुं नीलोत्पलश्यामतनुं वरेण्यम्॥
महाहैरलावृतचारुकुण्डलं महाकिरीटोत्तमरत्नभास्वरम्।
सुवैजयन्त्या वनमालयान्वितं सनातनं तं भुवनैकसुन्दरम्॥
(स्क० पु०, मा० के० २३। ३४-३५)