संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 90
| * माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ६१ |
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पार्वतीकी यह बात सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित धर्मात्मा हिमवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी पुत्रीसे बोले—‘अब हम सब लोग घरको चलें।’ उस समय सब लोग एकत्र हो पार्वतीको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर हिमवान् पार्वतीको अपने घर ले आये। देवतालोग दुन्दुभि बजाने लगे। उनके शंख और तूर्य भी बज उठे। इस प्रकार अपने पिताके घरमें आयी हुई पार्वती उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित होने लगीं। वे मन-ही-मन सदा भगवान् शिवका चिन्तन करती रहती थीं। श्रेष्ठ देवता भी उनके प्रति पूज्यभाव रखते थे।
### सप्तर्षियोंका आगमन, शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय, समस्त देवताओंका शिवकी बारातमें आगमन, हिमवान्द्वारा स्वागत तथा मण्डपमें कन्यादानकी तैयारी
लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान् महेश्वरके भेजे हुए सप्तर्षिगण सहसा हिमवान्के पास आये। उन्हें आया देख हिमवान्के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने शीघ्र उठकर उन सबका स्वागत-सत्कार किया। फिर मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक पूछा—‘महर्षियो! आपलोग कैसे पधारे हैं? अपने आगमनका कारण बतलाइये।' तब सप्तर्षियोंने कहा—'पर्वतराज! हम लोग भगवान् शिवके भेजे हुए हैं, यहाँ आपके पास आये हैं। आपकी कन्याको देखना ही हमारे आनेका उद्देश्य है। अतः शीघ्र अपनी कन्या हमें दिखाइये।' 'बहुत अच्छा' कहकर हिमवान्ने पार्वतीको वहाँ बुलाया और सप्तर्षियोंसे हँसते हुए कहा—'यही मेरी कन्या है, किंतु इस समय मुझे आपसे एक विशेष बात कहनी है। जो तपस्वियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, परम विरक्त हैं और कामदेवका नाश करनेवाले हैं, जिन्होंने कामके शरीरको जलाकर उन्हें अनंग बना डाला है; ऐसे भगवान् शंकर अब विवाहके इच्छुक कैसे हो गये? जो अधिक समीप या अधिक दूर रहनेवाला हो, (अपनेसे) अत्यन्त धनी अथवा सर्वथा निर्धन हो, जिसकी कोई आजीविका न हो तथा जो मूर्ख हो, ऐसे पुरुषको कन्या देना अच्छा नहीं माना गया है। जो मूर्ख, विरक्त, स्वयं ही अपनेको बड़ा माननेवाला, रोगी तथा प्रमादी हो, ऐसे पुरुषको कन्या नहीं देनी चाहिये।\* अतः मुनिवरो! आपके साथ भलीभाँति विचार करके ही मुझे महादेवजीको अपनी कन्या देनी है, यही मेरा उत्तम निश्चय है।'
तब महर्षियोंने कहा—जिन्होंने तीव्र तपस्या की है और उस तपके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की है, उन पार्वती देवीके ऊपर आज भगवान् शिव बहुत प्रसन्न हैं। पर्वतराज! तुम्हें पार्वती और भगवान् शिवकी महिमाका थोड़ा भी ज्ञान नहीं है। अतः तुम हमारी बात मानो। अपनी पुत्री पार्वतीको परमात्मा भगवान् शिवकी सेवामें दे दो।
पवित्रात्मा ऋषियोंका यह वचन सुनकर गिरिराज हिमवान् बड़ी उतावलीके साथ समस्त पर्वतोंसे बोले—‘हे मेरु! हे निषध! हे गन्धमादन! हे
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\* अत्यासन्ने चातिदूरे अत्याढ्ये धनवर्जिते । वृत्तिहीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ॥
मूढाय च विरक्ताय आत्मसम्भाविताय च । आतुराय प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत् ॥
(स्क० पु०, मा० के० २३।८-९)