भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 89

६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तुम वर माँगो।' उस समय सतीसाध्वी पार्वतीजीको बड़ी लज्जा आयी। उन्होंने शंकरजीसे कहा— 'देवेश! आप मेरे सनातन स्वामी हैं, क्या आपको पहलेकी घटनाका कुछ स्मरण है? प्रभो! मैं वही सती हूँ जिसके लिये आपने दक्ष-यज्ञका विनाश किया था। वही आप हैं और वही मैं हूँ। तारकासुरके वधरूप देवकार्यकी सिद्धिके लिये मैं मेनाके गर्भसे प्रकट हुई हूँ। आपसे मेरे द्वारा एक पुत्र होगा। इसलिये महेश्वर! आप मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करें। आपको ऋषियोंके साथ हिमवान्‌के पास जाना चाहिये और उनसे मेरे लिये याचना करनी चाहिये। मेरे पिता हिमवान् आपकी आज्ञाका पालन करेंगे इसमें सन्देह नहीं है। पूर्वकालमें जब मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय भी मेरे पिताने ही मुझे आपकी सेवामें समर्पित किया था। महाभाग! हमारा और आपका विवाह देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये हो रहा है।'

तब महादेवजीने पार्वतीसे हँसते हुए कहा— देवि अहंकाररूपा प्रकृतिसे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। महत्तत्त्वसे तामस अहंकारकी उत्पत्ति हुई। तामस अहंकारसे सर्वव्यापी आकाश प्रकट हुआ। आकाशसे वायु और वायुसे अग्निकी उत्पत्ति हुई। अग्निसे जल और जलसे पृथ्वी हुई। सुमुखि! पृथ्वी आदि भूत तथा भौतिक वस्तुएँ जो भी दृष्टिमें आती हैं उन सबको नश्वर समझो। अविनाशी तो आत्मा ही है जो एक होकर भी अनेकताको प्राप्त हुआ है, निर्गुण होकर भी गुणोंसे आवृत हो रहा है, जो सदा अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला है किंतु इस समय दूसरेसे प्रकाश ग्रहण करनेवाला बन गया है, स्वतन्त्र होकर भी परतन्त्र-सा हो गया है। देवि! प्रकृतिरूपसे तुमने ही महत्तत्त्वको प्रकट किया है। यह सम्पूर्ण मायामय जगत् तुम्हारे द्वारा ही रचा गया है। तीनों गुणोंका कार्य तुमने ही प्रकट किया है। तुम्हीं त्रिगुणमयी सूक्ष्म प्रकृति हो और मैं सदा तुम्हारे सब व्यापारोंका साक्षीमात्र हूँ। मैं हिमालयके पास नहीं जाऊँगा। उनसे किसी प्रकार याचना नहीं करूँगा। क्योंकि किसीके सामने 'दीजिये' ऐसा वचन मुँहसे निकालनेपर पुरुष उसी क्षण लघुताको प्राप्त हो जाता है।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर हिमवान् अपनी धर्मपत्नी मेना तथा दूसरे पर्वतोंके साथ वहाँ आये। पार्वतीजीने जब उन्हें देखा तो वे उठकर खड़ी हो गयीं और अपने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तब हिमालयने मधुर वाणीमें पूछा—'साध्वी! तुमने जैसे-तैसे यहाँ रहकर क्या किया है?'

पार्वती बोलीं—पिताजी! मैंने यहाँ उत्तम तपस्याके द्वारा कामनाशक महादेवजीकी आराधना की है। मेरा वह महान् कार्य, जो अन्य सब लोगोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आज सिद्ध हो गया। महादेवजी सन्तुष्ट होकर यहीं मेरा वरण करनेके लिये पधारे थे; किंतु जब मैंने यह कहा कि मेरे पिताकी अनुपस्थितिमें इस समय आप मेरा पाणिग्रहण कैसे कर सकते हैं; तब वे जिस मार्गसे आये थे उसीसे लौट गये।