संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५९
और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। भला, रुद्रकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता है? अरी! रुद्र तो अमंगलरूप हैं। हाथमें कपाल धारण करते हैं। मरघटका निवास ही उन्हें अधिक प्रिय है। जिस दिन इसके वरण कर लेनेपर रुद्रका इसके साथ सम्बन्ध होगा उसी दिनसे यह शुभांगी पार्वती भी अशुभरूप हो जायगी। रुद्र वही हैं न, जिन्हें दक्षके शापसे ब्राह्मणोंने यज्ञबहिष्कृत कर दिया है। अत्यन्त भयानक विषवाले जो-जो सर्प थे वे ही उनके अंगोंके आभूषण बने हुए हैं। रुद्र अपने अंगोंमें चिताकी राख लगाते हैं, चमड़ेका वस्त्र पहनते हैं, अमांगलिक वस्तुएँ धारण करते हैं तथा निरन्तर भूत, प्रमथ और पिशाचोंसे घिरे रहते हैं। इस सुकुमारी कन्याको उस रुद्रसे क्या लेना है। सखियोंको चाहिये कि इसे ऐसा करनेसे रोकें। मनोहर रूपवाले देवराज इन्द्र, परम तेजस्वी धर्मराज, वरुण, कुबेर, वायु तथा अग्निको छोड़कर रुद्रके प्रति इसका अनुराग कैसे हुआ?'
परमेश्वर शिवने इस प्रकारकी बहुत-सी बातें वहाँ कहीं। पार्वती सखियोंके मध्यमें बैठकर तपस्यामें संलग्न थीं। उन्होंने वटुरूपधारी रुद्रकी बातें सुनकर उनके प्रति रोष प्रकट करते हुए कहा—'जया! साध्वी विजया! विश्वसुन्दरी प्रम्लोचा! और महाभागा सुलोचना! मैं तुमलोगोंसे कहती हूँ—मैंने जो कुछ किया है, ठीक किया है। परंतु तुम्हें इस ब्रह्मचारीसे क्या काम है जो इसकी कठोर बातें सुनती हो। ब्रह्मचारीका रूप धारण करके यह कोई महादेवजीका निन्दक आ गया है, ऐसा समझो। सखियो! ऐसे व्यक्तिसे अपना क्या प्रयोजन है? जो महात्माओंकी निन्दा करनेवाले, पापी, कृतघ्न, वेददूषक, वेदभ्रष्ट और मर्यादाहीन हैं, उन लोगोंके साथ बुद्धिमान् पुरुषोंको वार्तालाप नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा सुनकर जो तुरंत वहाँसे उठकर दूसरे स्थानपर नहीं चले जाते, वे प्रतिष्ठाहीन मानव पापके भागी होते हैं।'*
गिरिजाका वचन सुनकर विजया वटुरूपधारी रुद्रसे सहसा कुपित होकर बोली—'ब्रह्मचारी! जाओ, जाओ यहाँसे; अब तुम्हें यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरना चाहिये।' विजया बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी। उसने इस प्रकार फटकारकर विवाद करनेवाले वटुरूपधारी शिवको विदा कर दिया। वे तत्काल अन्तर्धान हो गये। सम्पूर्ण सखियोंमेंसे किसीने नहीं देखा कि वे कहाँ चले गये? तदनन्तर भगवान् महेश्वर पार्वतीजीके सामने अपना वास्तविक स्वरूप धारण करके फिर सहसा वहीं प्रकट हो गये। ध्यानमें लगी हुई पार्वतीदेवी जब अपने ध्यानगत स्वरूपको ढूँढ़ रही थीं, उसी समय उनके हृदयस्थित देवता बाहर दिखायी देने लगे। विशाल नेत्रोंवाली सुशीला गिरिजाने आँख खोलकर देखा तो सर्वलोकमहेश्वर देवदेवेश्वर शिव सामने दृष्टिगोचर हुए। उन कैलाशनिवासी शंकरके दो भुजाएँ, एक मुख और अद्भुत स्वरूप था। मस्तकपर जटाओंका जूड़ा बँधा हुआ था। उसमें चन्द्रमाकी कला शोभा पा रही थी। भगवान्ने हाथीका चमड़ा पहन रखा था। उनके कानोंमें कुण्डलके स्थानपर महाभाग कम्बल और अश्वतर—ये दो नाग विराज रहे थे। परम कान्तिमान् सर्पराज वासुकिको हार बना लिया गया था। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े सर्पोंके ही कंगन पड़े थे जो बड़ी शोभा दे रहे थे। इस प्रकार रुद्रने सर्पोंके आभूषण बनाये थे। ऐसा स्वरूप धारणकर भगवान् शिव पार्वतीके सामने खड़े हुए और शीघ्रतापूर्वक बोले—'कल्याणी!
* ये निन्दकाश्च पापाश्च कृतघ्ना वेददूषकाः। वेदभ्रष्टा ह्यप्रतिष्ठा अवाच्यास्ते मनीषिभिः॥
आर्याणां निन्दनं श्रुत्वा ये न यान्ति त्वरान्विताः। स्थानान्तरं ह्यप्रतिष्ठास्तेऽपि स्युः पापिनो जनाः॥
(स्क० पु०, मा० के० २२।६३-६४)