भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 87

५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


क्रोधका जन्म होता है। क्रोधसे सम्मोह होता है और सम्मोहसे मनुष्य जल्दी ही भ्रममें पड़ जाता है। अतः सभी श्रेष्ठ देवता काम, क्रोधका परित्याग करके शास्त्रों और संतोंके सदुपदेशोंको मानें—उनके अनुसार जीवन बनावें।'

वृषभके चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले भगवान् महादेवने इस प्रकार उत्तम बातें सुनाकर देवताओं तथा ऋषि-मुनियोंको भलीभाँति समझाया। तत्पश्चात् वे पुनः ध्यान लगाकर मौन हो गये। तब वे सब देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। फिर शिवजीने बुद्धिके द्वारा मनको आत्मामें एकाग्र करके अपने स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन किया—'जो परसे भी अत्यन्त परे, अपने-आपमें स्थित, मल आदि दोषोंसे रहित, विघ्न-बाधाओंसे शून्य, निरंजन (निर्लिप्त) तथा निराभास (मिथ्या ज्ञानसे रहित) है, जिसके विषयमें विवेकी विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं, जहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा नक्षत्र आदि दूसरी किसी ज्योतिका प्रकाश नहीं, जहाँ वायुकी भी गति कुण्ठित हो जाती है, जो विचारदृष्टिसे भी केवल (अद्वितीय) सद्वस्तु है, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतर वस्तुओंसे भी परे है, जिसका कोई नाम या संकेत नहीं है, जो चिन्तनका विषय नहीं है, जिसमें विकारका सर्वथा अभाव है, जो रोग और शोकसे सर्वथा दूर है, विशुद्ध ज्ञान ही जिसका स्वरूप है, सर्वत्यागी संन्यासी जिसे प्राप्त होते हैं, जो शब्द या वाणीकी पहुँचसे परे है, निर्गुण और निर्विकार है, सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, जो ज्ञानगम्य होकर भी वास्तवमें अगम्य है, वेदान्त और आगम भी मूक होकर ही ('नेति-नेति'की भाषामें) जिसका सर्वदा प्रतिपादन करते हैं, वही सबके ईश्वर पिनाकधारी भगवान् वृषध्वज परमार्थ वस्तु (परब्रह्म परमात्मा) हैं।* उन्होंने ही कामदेवका नाश किया है। वे साक्षात् परमेश्वर होकर भी 'तप' का सेवन करते हैं।'

लोमशजी कहते हैं—उधर पार्वती देवी बड़ी कठोर तपस्यामें लगी हुई थीं। उस तपस्यासे उन्होंने भगवान् शंकरको जीत लिया। देवीकी तपस्यासे हार मानकर भगवान् शिव समाधिसे विरत हो, तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ पार्वतीजी विराजमान थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा—देवी गिरिजा सखियोंसे घिरी हुई 'वेदी' पर बैठी हैं और चन्द्रमाकी कलाके समान प्रकाशित हो रही हैं। महादेवजीने उन्हें देखकर तत्काल ब्रह्मचारीका वेष धारण कर लिया और उसी स्वरूपसे सखियोंकी मण्डलीमें उपस्थित होकर पूछा— 'सखियो! यह सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या अपनी सहेलियोंके बीचमें क्यों बैठी है? यह कौन है? किसकी पुत्री है? कहाँसे आयी है और किस लिये तपस्या कर रही है?'

तब जयाने उत्तर दिया—ब्रह्मचारीजी! ये गिरिराज हिमवान्की कन्या हैं और तपस्याद्वारा परमेश्वर रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त करना चाहती हैं।'

जयाकी यह बात सुनकर वटुरूपधारी शिव ठाठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'सखियो! यह पार्वती भोली-भाली है। इसे अपने हित


* आत्मानमात्मना कृत्वा आत्मन्येवमचिन्तयत् ॥
परात्परतरं स्वस्थं निर्मलं निरवग्रहम् । निरञ्जनं निराभासं यन्मुह्यन्ति च सूरयः॥
भानुर्न भात्यग्निरथो शशी वा न ज्योतिरेवं न च मारुतो हि।
यत्केवलं वस्तु विचारतोऽपि सूक्ष्मात् परं सूक्ष्मतरात्परं च ॥
अनिर्देश्यमचिन्त्यं च निर्विकारं निरामयम् । ज्ञप्तिमात्रस्वरूपं च न्यासिनो यान्ति यत्र वै ॥
शब्दातीतं निर्गुणं निर्विकारं सत्तामात्रं ज्ञानगम्यं त्वगम्यम्।
यत्तद् वस्तु सर्वदा कथ्यते वै वेदान्तैश्चागमैर्मूकभूतैः ॥
तद्वस्तुभूतो भगवान् स ईश्वरः पिनाकपाणिर्भगवान् वृषध्वजः ॥
(स्क० पु०, मा० के० २२। ३२-३७)