संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ६५ |
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रहे थे। अरुन्धती, अनसूया, सावित्री तथा मातृकाओंसे घिरी हुई लक्ष्मीजी भी उस शोभायात्रामें सम्मिलित थीं। इन सबके साथ जगत्के एकमात्र बन्धु भगवान् शिव अपने उत्तम तेजसे सुशोभित हो रहे थे। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, श्रेष्ठ लोकपाल तथा महर्षिगण भी उनके साथ थे। साक्षात् वायुदेव पंखा कर रहे थे। चन्द्रमाने उनके सिरपर छत्र लगा रखा था। सूर्य आगे रहकर अपने तेजसे तप रहे थे। देवराज इन्द्र हाथमें बेंतकी छड़ी लेकर छड़ीदारका काम कर रहे थे। इस प्रकार देवता और पर्वत भगवान् शिवके आगे चलते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय देवता और मुनि भगवान् शिवके ऊपर फूल बरसा रहे थे, जिससे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। सामने हिमवान्का सुन्दर भवन था जो महान् वैभवके कारण सब ओरसे शोभासम्पन्न दिखायी देता था। उस घरका आँगन सोनेका बना हुआ था। वहाँ द्वारपर भगवान् शिवकी विशेषरूपसे पूजा हुई। फिर मनुष्य, देवता और दानवोंके द्वारा पूजित होकर उन्होंने उस भवनमें प्रवेश किया। इस प्रकार अन्तःपुरमें पहुँचकर भगवान् शिव यज्ञ-मण्डपमें पधारे। उस समय नाना प्रकारकी स्तुतियोंसे परमेश्वर शिवके गुण गाये जा रहे थे। वहाँ पहुँचनेपर गिरिराज हिमवान्ने महेश्वरको हाथीसे उतारा और मंगलपीठपर बिठाकर सखियोंसहित मेना तथा पुरोहितने उनकी विशेषरूपसे आरती की। वहाँ मधुपर्क आदिकी जो आवश्यक विधि है, वह सब ब्रह्माजीकी आज्ञासे पुरोहितने तत्काल सम्पन्न की। तत्पश्चात् अन्तर्वेदीमें प्रवेश करके, जहाँ ‘तन्वंगी’ पार्वती समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो वेदीके ऊपर विराजमान थीं, वहीं महादेवजी भी लाये गये। उनके साथ भगवान् विष्णु और ब्रह्मा भी थे। बृहस्पति आदि विद्वान् लग्नकी प्रतीक्षा कर रहे थे। गर्ग और वशिष्ठ मुनि जहाँ घड़ीका स्थान था, वहीं बैठे थे। ज्यों ही घड़ी पूरी हुई, गर्गाचार्यने ॐकारका उच्चारण करके हाथ जोड़कर निवेदन किया। अब मंगलमय पुण्य मुहूर्त आ गया। पार्वती ने अपने हाथकी अंजलिमें अक्षत लेकर उसे शिवके ऊपर छोड़ा। फिर दही, अक्षत और कुशके जलसे उनका भलीभाँति पूजन किया।
इसी समय गर्गाचार्यके आदेशसे हिमवान् अपनी पत्नी मेनाके साथ वहाँ कन्यादान करनेको उद्यत हुए। मेना सोनेका कलश लेकर उनकी अर्द्धांगिनी बनी हुई थीं। परम सौभाग्यवती मेना समस्त आभरणोंसे विभूषित होकर हिमवान्के साथ बैठी थीं। उस समय हिमवान्ने सबको वर देनेवाले भगवान् विश्वनाथसे कहा—‘आज मैं ब्रह्माजी तथा भगवान् विष्णुका संग पाकर और अपने पुरोहित परम महात्मा गर्गजीके साथ बैठकर देवाधिदेव भगवान् शंकरको कन्यादान करता हूँ। विप्रवर! इस समय कन्यादानके लिये उत्तम बेला आयी है। इसमें आप संकल्प पढ़ें।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर वहाँ आये हुए सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने हिमवान्की बात स्वीकार की। वे सभी शुभ समयके ज्ञाता थे। उन्होंने तिथि, मास, नक्षत्र आदिका यथावत् उच्चारण किया। फिर हिमवान् भगवान् शंकरसे इस प्रकार बोले।
हिमवान्ने कहा—तात! महाभाग! आप अपने गोत्रका नाम बतावें और अपने कुलका विशेषरूपसे परिचय दें।
भगवान् शंकरके मुखारविन्दसे इस प्रश्नका कोई उत्तर नहीं मिला। उस समय नारदजी बहुत हँसे और अपनी वीणा बजाने लगे। यह देख बुद्धिमान् हिमवान्ने उन्हें मना करते हुए कहा—‘प्रभो! आप वीणा न बजाइये।’ पर्वतके ऐसा कहनेपर नारदजी बोले—‘गिरिराज! तुमने साक्षात् शिवजीसे उनका गोत्र बतानेके लिये कहा है; परंतु इनका गोत्र और कुल तो ‘नाद’ ही है। भगवान् शंकर न तो किसी कुलमें उत्पन्न हुए हैं और न इनका किसी