भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विशेष कुलसे ही सम्बन्ध है। ये गोत्रोंके भी परम गति हैं। महादेवजी नादमें प्रतिष्ठित हैं और नाद उनमें प्रतिष्ठित है। अतः भगवान् शिव नादमय हैं और नादसे ही उपलब्ध होते हैं। परंतप ! यही भाव व्यक्त करनेके लिये मैंने इस समय वीणा बजायी है। इनके गोत्र और कुलका नाम ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। भगवान् शिवका कोई रूप नहीं है, इसीलिये किसी कुलमें उत्पन्न न होनेके कारण ये अकुलीन कहलाते हैं। गिरिश्रेष्ठ ! इसीलिये तुम्हारे ये 'जामाता' गोत्ररहित हैं। राजन् ! मेरे बहुत कहनेसे क्या लाभ। इनके अंशमात्रसे मोहित होकर ये ऋषिलोग भी इनके स्वरूपको यथावत्रूपसे नहीं जानते। यह कन्या कौन है, इस बातको अभी तुम भी ठीक-ठीक नहीं जानते। शिव और पार्वती—इन दोनोंसे ही सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति होती है तथा इन्हीं दोनोंके आधारपर यह टिका हुआ है।'

महात्मा नारदका यह वचन सुनकर हिमवान् आदि समस्त पर्वत और इन्द्र आदि सब देवता विस्मित होकर उन्हें 'साधुवाद' देने लगे। भगवान् महेश्वरकी गम्भीरताको जानकर वहाँ आये हुए सब विद्वान् आश्चर्यचकित हो परस्पर कहने लगे—जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजीके द्वारा इस सम्पूर्ण विशाल विश्वकी सृष्टि हुई है, जिनसे अभिन्न होनेके कारण यह समस्त जगत् परात्पररूप तथा आत्मबोधस्वरूप है, स्वतन्त्र परमेश्वररूपसे जाननेयोग्य है, वे भगवान् शिव ही अपने त्रिभुवनमय स्वरूपसे युक्त होकर सर्वत्र विराज रहे हैं।

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हिमवान्द्वारा कन्यादान, बारातका भोजन और बिदाई, शिवमहिमा तथा कुमारका जन्म

**लोमशजी कहते हैं—**तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञासे हिमवान्ने कन्यादान किया— 'इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर! भार्यार्थं प्रतिगृह्णीष्व' (हे परमेश्वर! मैं अपनी यह कन्या आपको धर्मपत्नी बनानेके लिये अर्पित करता हूँ, कृपया स्वीकार करें) यह वाक्य बोलकर उन्होंने अपनी कन्या दे दी। फिर कमलके समान नेत्रोंवाले वे दोनों दम्पति (वर-वधू) वेदीके बाहर लाये गये तथा उन पार्वती और परमेश्वरको बाहरकी ही वेदीपर बिठाया गया। जब होमका कार्य आरम्भ हुआ तब ब्रह्माजी भगवान् शिवके समीप ही ब्रह्मासनपर विराजमान हो गये। हवन पूरा होनेपर ब्राह्मणलोग शान्तिपाठ करने लगे। उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उच्चस्वरसे बोले जानेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे वहाँकी सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। तत्पश्चात् देवांगनाओंने महादेवजीकी आरती उतारी तथा ऋषिपत्नियोंने उनका पूजन किया। गिरिराज हिमालयके घरकी स्त्रियोंने भी वरकी आरती उतारी। संगीतज्ञोंमें कुशल गन्धर्व आदिने अपने गीतोंसे तथा महर्षियोंने स्तुतियोंद्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न किया। उदार चित्तवाले गिरिराज हिमालयने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और वहाँ पधारे हुए अन्य लोगोंको भी बहुमूल्य रत्न भेंट किये। इसके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु आदि देवेश्वर भगवान् शिवको आगे करके भोजनमें तत्पर हुए। हिमालयने उन सबका सत्कार किया। उन सबने एक साथ मिलकर और एक ही स्थानपर पंक्ति लगाकर लिंगी और शृंगीके साथ भोजन किया। कोई-कोई गण पंक्तिसे अलग होकर भोजन कर रहे थे। उन्होंने अपने लिये पृथक् पात्र बना रखा था। नन्दी तथा वीरभद्र आदि महात्मा भगवान् शिवके पीछे बैठकर भोजन कर रहे थे। इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि-मुनियोंने भी भगवान् महेश्वरके पास ही भोजन किया।