भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६७

चण्डीके गणोंने भी वहाँ भोजन किया। वेताल, क्षेत्रपाल, कूष्माण्ड, भैरव, शाकिनी, डाकिनी, यक्षिणी, मातृका आदि चौंसठ योगिनी तथा अन्यान्य योगीजन भी वहाँ भोजनमें सम्मिलित थे। भगवान् शिवके उन महात्मा गणोंकी संख्या ग्यारह करोड़ थी। ऋषि और देवता आदिके विषयमें तो मैंने पहले ही कह दिया है।

इस प्रकार वे सब बराती खा-पीकर संतुष्ट हुए। उन सबके चित्तमें बड़ा हर्ष था। ब्रह्मा आदि सभी देवता विश्राम करनेके लिये अपने-अपने डेरोंपर गये। इस तरह हिमवान्ने बड़े विस्तारके साथ परम मंगलमय और अतिशय शोभायमान वह वैवाहिक उत्सव सम्पन्न किया। अन्तिम दिन हिमवान्ने उत्साहपूर्ण हृदयसे वस्त्र, आभूषण और भाँति-भाँतिके रत्न भेंट करके देवाधिदेव भगवान् शिवका पूजन किया। तत्पश्चात् वे विष्णुभगवान्के पूजनमें संलग्न हुए। सुन्दर-सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंद्वारा उन्होंने लक्ष्मीसहित विष्णुका पूजन किया। इसी प्रकार ब्रह्माजीकी, बृहस्पतिजी और इन्द्राणीसहित इन्द्रकी तथा अन्य लोकपालोंकी भी पृथक्-पृथक् पूजा की। तदनन्तर वस्त्राभूषणों तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे भूत, प्रमथ और गुह्यक-गणोंसहित चण्डीदेवीका भी पूजन किया। इनके अतिरिक्त भी जो लोग वहाँ पधारे थे, उन सबका हिमवान्ने यथावत् सत्कार किया। इस प्रकार उस समय हिमवान्के द्वारा सब देवता, ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, चारण, मनुष्य तथा अप्सरा—इन सबका भलीभाँति सत्कार किया गया।

इसके बाद भगवान् विष्णुने भी उसी तरह सब पर्वतोंका सत्कार किया। सह्याचल, विन्ध्याचल, मैनाक, गन्धमादन, माल्यवान्, मलय, महेन्द्र, मन्दराचल तथा मेरु—इन सबका श्रीहरिने प्रयत्नपूर्वक पूजन किया। श्वेतकूट, श्वेतगिरि, नीलगिरि, उदयगिरि, शृंगाचल, अस्ताचल, मानसाचल, कैलास तथा लोकालोक पर्वतका पूजन ब्रह्माजीने किया। इस प्रकार सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी वहाँ पूजा की गयी। साथ ही सम्पूर्ण पर्वतवासियोंका भी पूजन किया गया। भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके साथ सबके स्वागत-सत्कारका कार्य समुचित रूपसे सम्पन्न किया। दूसरे दिन बारात लौटी। हिमालयने अपने बन्धुओंके साथ गन्धमादन पर्वततक वरका अनुगमन किया। शिव और पार्वती दोनों महातेजस्वी दम्पति हाथीपर आरूढ़ हो शोभा पा रहे थे। ब्रह्माजी विमानपर और भगवान् विष्णु गरुड़पर बैठे थे। इन्द्र ऐरावतपर और कुबेर पुष्पक विमानपर विराज रहे थे। पाशधारी वरुण मगरपर तथा यमराज भैंसेपर सवार थे। नैर्ऋत प्रेतपर और अग्निदेव बकरेपर चढ़े थे। वायुदेव मृगपर तथा ईशान वृषभपर आरूढ़ थे। इस प्रकार ये सब लोकपाल और ग्रह अपनी-अपनी सेनाओंके साथ वरको घेरे हुए चल रहे थे। प्रमथ आदि गण भी वरयात्रामें सम्मिलित थे। जिनके कन्यादानरूपी महान् दानसे भगवान् शंकर सन्तुष्ट हुए, वे गिरिराज हिमवान् तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये।

जिनकी जिह्वाके अग्रभागपर सदा भगवान् शंकरका दो अक्षरोंवाला नाम (शिव) विराजमान रहता है वे धन्य हैं, वे महात्मा पुरुष हैं तथा वे ही कृतकृत्य हैं। आज भी जिन्होंने ‘शिव’ इस अविनाशी नामका उच्चारण किया है, वे निश्चय ही मनुष्यरूपमें रुद्र हैं; इसमें संशय नहीं है। महादेवजी थोड़ा-सा बिल्वपत्र पाकर भी सदा सन्तुष्ट रहते हैं। फूल और जल अर्पण करनेसे भी प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान् शिव सदा सबके लिये कल्याणस्वरूप हैं। ये पत्र, पुष्प और जलसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसलिये सबको इनकी पूजा करनी चाहिये। शिवजी इस जगत्में मनुष्योंको महान् सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं। ये एक हैं, महान् हैं, ज्योतिःस्वरूप हैं तथा अजन्मा परमेश्वर हैं। महात्मा शिव कार्य और कारण सबसे