संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
परे हैं। ये व्यवधानशून्य, निर्गुण, निर्विकार, निर्बाध, निर्विकल्प, निरीह, निरंजन, नित्ययुक्त, निष्काम, निराधार तथा सदैव नित्यमुक्त हैं।*
ऐसी महिमावाले देवाधिदेव विश्वबन्धु भगवान् शिवका सब देवताओंने पूजन किया। शिवजी सर्वज्ञ हैं, वे स्तुति, ध्यान, पूजन और चिन्तन करनेपर सबको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। महादेवजीकी आराधनासे ही हिमवान् उस समय सबसे श्रेष्ठ, सबसे महान्, सम्पूर्ण सद्गुणोंसे प्रसिद्ध, सर्वगुण-सम्पन्न, महात्मा विश्वेश्वरोंके लिये भी वन्दनीय तथा समस्त पर्वतोंमें श्रेष्ठ हो गये। धर्मात्मा हिमालय जब मेनाके साथ अपने स्थानको लौटे तब उन्होंने सब पर्वतोंको विदा किया।
उधर भगवान् शिवने गन्धमादन पर्वतके एकान्त प्रदेशमें अत्यन्त सुन्दर रूप धारणकर पार्वती देवीके साथ रमण करनेका विचार किया। फिर वे महाप्रभु पार्वतीके साथ महती रतिक्रीड़ामें तत्पर हुए। उन दोनोंका वह महान् सुरतारम्भ उस समय सब लोगोंके लिये अनिष्टकारक, अत्यन्त अद्भुत तथा प्रलयकारी हुआ। वह महती सम्भोग-लीला आरम्भ होनेपर भगवान् शंकरके दुःसह वीर्यसे समस्त चराचर जगत् नष्ट होने लगा। यह देख ब्रह्माजी तथा अध्यात्मज्ञानको प्रकाशित करनेवाले भगवान् विष्णुने अग्निदेवका स्मरण किया। मनसे स्मरण करते ही अग्निदेव बड़ी उतावलीके साथ तत्काल वहाँ आ पहुँचे। फिर उन दोनोंकी आज्ञा पाकर अग्निने केसरके समान कान्तिवाले हंस (संन्यासी)-का रूप धारण करके शिवजीके भवनमें प्रवेश किया। वहाँ आँगनमें पहुँचकर वे बैठ गये और बोले— 'माँ! हाथ ही मेरा पात्र है; इसमें मुझे भिक्षा दो।' तब माता पार्वतीने 'जातवेदा' अग्निको भिक्षा (के रूपमें वीर्य) दे दिया। अग्निने हाथपर भिक्षा लेकर उनकी आँखोंके सामने ही उसे खा लिया। यह देख पार्वतीजी कुपित हो उठीं और अग्निको शाप देती हुई बोलीं— 'अरे ओ भिक्षुक! मेरे शापसे तू शीघ्र ही सर्वभक्षी हो जायगा तथा शंकरजीके इस वीर्यसे तुझे सब ओर बड़ी भारी पीड़ा प्राप्त होगी।'
तदनन्तर अग्निदेवने लोककल्याणकारी भगवान् शंकरसे कहा— 'प्रभो! महादेव! अब मुझे क्या करना चाहिये; सुरश्रेष्ठ! अब मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जिससे मैं सर्वदा सुखी रहूँ और देवताओंका हविष्य वहन करता रहूँ।' तब भगवान् शिवने सब देवताओंके सुनते-सुनते कहा— 'अग्ने! तुम अपने शरीरमें पड़े हुए मेरे वीर्यको स्त्रीके गर्भमें स्थापित कर दो।' यह सुनकर अग्निने कहा— 'भगवान्! आपका तेज दुःसह है, इसे प्राकृत जन कैसे धारण कर सकते हैं।' उस समय नारदजीने अग्निदेवसे कहा— 'तुम मेरी बात मानो; माघ मासमें प्रातःस्नान करके शीतके कारण जो अत्यन्त कष्ट पा रहे हों, वे जब अग्निसेवनके
* ते धन्यास्ते महात्मानः कृतकृत्यास्त एव हि। द्व्यक्षरं नाम येषां वै जिह्वाग्रे संस्थितं सदा ॥
शिव इत्यक्षरं नाम यैरुदीरितमद्य वै। ते वै मनुष्यरूपेण रुद्राः स्युर्नात्र संशयः ॥
किञ्चिदल्लेन सन्तुष्टः पुष्पेणापि तथैव च। तोयेनापि च सन्तुष्टो महादेवो निरन्तरम् ॥
पत्रेण पुष्पेण तथा जलेन प्रीतो भवत्येष सदाशिवो हि।
तस्माच्च सर्वैः परिपूजनीयः शिवो महाभाग्यकरो नृणामिह ॥
एको महान् ज्योतिरजः परेशः परावराणां परमो महात्मा।
निरन्तरो निर्गुणो निर्विकारो निराबाधो निर्विकल्पो निरीहः ॥
निरञ्जनो नित्ययुक्तो निराशो निराधारो नित्यमुक्तः सदैव हि ॥
(स्क० पु०, मा० के० २७। २२-२८)