संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ६९
लिये आयें तब उनके शरीरमें तुम भगवान् शिवका यह तेज स्थापित कर देना।'
नारदजीकी यह बात मानकर परम कान्तिमान् एवं महान् प्रभावशाली अग्निदेव ब्राह्ममुहूर्तमें बैठकर अपने प्रचण्ड तेजसे प्रज्वलित हो उठे। अग्निको प्रज्वलित देख शीतसे कष्ट पानेवाली कृत्तिकाओंने अग्निसेवनकी इच्छासे वहाँ आनेका विचार किया। उस समय अरुन्धती देवीने उन सबको रोका, तो भी उनकी बात न मानकर वे सब कृत्तिकाएँ आग तापने लगीं। जबतक वे आग तापती रहीं तबतक ही शंकरजीके वीर्यके सभी परमाणु उनके रोमकूपोंमें होकर शरीरमें घुस गये। अब अग्निदेव उस वीर्यसे मुक्त हो गये। फिर तो स्वयं ही उनका वह प्रज्वलित तेज शान्त हो गया। तत्पश्चात् वे कृत्तिकाएँ गर्भवती होकर वहाँसे अपने घरको लौटीं। वहाँ उनके पति महर्षियोंने जब उन्हें शाप दिया तो वे नक्षत्रोंके रूपमें आकाशमें विचरने लगीं। उसी समय उन सबने भगवान् शिवके उस वीर्यको हिमालयके शिखरपर छोड़ दिया। छोड़नेपर वह सहसा तपाये हुए सुवर्णके समान चमक उठा। फिर वह गंगाजीमें डाल दिया गया। गंगाजीमें बहता हुआ वह तेजोमय वीर्य सरकंडोंके समूहसे घिर गया। वहाँ वह तेज छः मुखोंवाले बालकके रूपमें परिणत हो गया। इसका पता लगनेपर सम्पूर्ण देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर नारदजीने आकर शिव और पार्वतीसे उस बालकके जन्मका समाचार कहा—'शिवजीके अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ है'। यह समाचार सुनकर गन्धमादन पर्वतपर निवास करनेवाले समस्त प्रमथगणोंका हृदय आनन्दोल्लाससे भर गया। वहाँ अनेकों पताकाएँ फहराने लगीं। बिल्वपत्रकी बन्दनवारें शोभा पाने लगीं तथा भाँति-भाँतिके वितानोंसे उस पर्वतकी शोभा बढ़ गयी। महात्मा शंकरके पुत्रके जन्मसे वह श्रेष्ठ पर्वत अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था। उस समय सब देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, यक्ष, गन्धर्व, सर्प तथा अप्सराएँ सब-के-सब गंगाके तटपर विराजमान उस गंगापुत्रको देखनेके लिये वहाँ गये। पार्वतीके साथ भगवान् शंकर भी वृषभपर आरूढ़ हो इन्द्रादि देवताओंको साथ ले उस स्थानको चल दिये। देवता, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, विद्याधर और नाग सभी आनन्दमें मग्न थे। वे शिवजीके साथ ही उनके वरदायक पुत्रका दर्शन करनेके लिये गये। शंकरजीके समान प्रतापी उस गंगापुत्रकी ओर देवताओंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें महान् तेज दिखायी दिया, जो तीनों लोकोंमें व्याप्त था। उस तेजसे घिरा हुआ वह बालक तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। उसका मुख बड़ा ही सुन्दर था। अंग-अंग मनोहारिणी शोभासे सम्पन्न था। नासिकाकी बनावट बड़ी सुन्दर थी। वह मन्द-मन्द मुसकराते हुए सबकी ओर देखता था। उसके दाँत बड़े ही स्वच्छ और चमकीले थे। सम्पूर्ण अंगोंमें सुन्दरता खेल रही थी। उसके सिरके बाल सब ओर बिखरे हुए थे। अत्यन्त अद्भुत रूपवाले तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस गंगाकुमारको देखकर सम्पूर्ण देवताओंने उसका वन्दन किया। भगवान् शंकरके समस्त पार्षद, प्रमथगण और वीरभद्र आदि उस बालकको दायें-बायें दोनों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंसहित इन्द्र भी उस समय बालकके समीप आये थे। ऋषि, यक्ष और गन्धर्व भी बालकको सब ओरसे घेरकर पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ गये। कुछ लोग गर्दन झुकाये खड़े रहे। कुछ लोगोंने मस्तक नवाकर प्रणाम किया तथा दूसरोंने उन्हें अपना अविनाशी स्वामी मानकर नमस्कार किया। इस प्रकार वहाँ एक महान् उत्सव छा गया। उसमें विचित्र-विचित्र बाजे बजने लगे। उस अभ्युदय-कालमें ऋषिलोग शान्तिपाठ करने लगे। इतनेहीमें गिरिजापति भगवान् शंकर भी वहाँ आ पहुँचे