संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५१
सुनो। मैं सुतललोकमें तुम्हारा द्वारपाल होकर रहूँगा, मेरे इस वचनको तुम वरदान समझो। आज मैं तुम्हारे लिये वरदायक होकर उपस्थित हूँ। अपने वैकुण्ठवासी पार्षदोंके साथ तुम्हारे घरमें निवास करूँगा।' अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दैत्यराज बलि असुरोंके साथ सुतललोकमें चले गये। वहाँ बाणासुर आदि सौ पुत्रोंके साथ वे सुखपूर्वक निवास करने लगे। महाबाहु बलि दाताओंके भी परम आश्रय हैं। तीनों लोकोंके याचक राजा बलिके पास जाते हैं और उनके द्वारपर विराजमान भगवान् विष्णु स्वयं उन्हें मुँहमाँगी वस्तुएँ देते हैं। कोई भोगकी कामना लेकर जाय या मोक्षकी, जिनकी जैसी रुचि होती है, उसीके अनुसार, उनको वह वस्तु वे समर्पित करते हैं।
भगवान् शंकरकी कृपासे ही राजा बलि ऐसे महत्त्वशाली हुए हैं। पूर्वकालमें जुआरीके रूपमें उन्होंने परमात्मा शिवके उद्देश्यसे जो दान किया था उसीका यह फल है। अपवित्र भूमिमें पहुँचकर गिरी हुई गन्ध, पुष्प आदि सामग्रीको भी परमात्मा शिवकी सेवामें समर्पित करके जब बलिने इतनी उन्नति की, तब जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे महादेवजीकी सेवामें गन्ध, पुष्प और जल अर्पण करते हैं उनके लिये तो कहना ही क्या है? वे साक्षात् भगवान् शिवके समीप जाते हैं। ब्राह्मणो! भगवान् शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय देवता नहीं है। जो गूँगे हैं, अन्धे हैं, पंगु और जड़ हैं तथा जाति-बहिष्कृत, चाण्डाल, श्वपच और अन्त्यज हैं; वे भी यदि सदा भगवान् शिवके भजनमें तत्पर रहें तो परम गतिको प्राप्त होते हैं। अतः सम्पूर्ण मनीषी पुरुषोंके लिये भी भगवान् शिव ही सदा पूजनीय हैं। पूजनीय ही नहीं, विद्वानोंके द्वारा वे सदा चिन्तनीय और वन्दनीय भी हैं। परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता पुरुष अपने हृदयमें विराजमान भगवान् महेश्वरका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं।
तारकासुरको ब्रह्माजीका वरदान, हिमालयके घर सतीका पार्वतीरूपमें अवतार, शंकरजीके रोषसे कामदेवका भस्म होना तथा पार्वतीकी उग्र तपस्या
ऋषियोंने पूछा— महाभाग सूतजी! दक्षकुमारी सती जब अपने पिता दक्षके यज्ञमें अग्निप्रवेश करके अन्तर्धान हो गयीं तब पुनः कब और कहाँ प्रकट हुईं? वे पुनः किस प्रकार उन्हें मिलीं?
सूतजी बोले— ब्राह्मणो! दक्षकुमारी सतीदेवी जब अपने पिताके यज्ञमें अन्तर्धान हो गयीं, तब अपनी शक्तिसे बिछुड़े हुए भगवान् महेश्वर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। वे लीला-देह धारणकर भृंगी और नन्दीके साथ हिमालयपर्वतपर रहने लगे। इसी समय नमुचिके पुत्र तारकासुरने बड़ी भारी तपस्या करके ब्रह्माजीको सन्तुष्ट किया। ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हुए और उस दुरात्माको इच्छानुसार वर देनेके लिये उद्यत हो बोले—'तुम कोई वर माँगो।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर तारकासुर बोला—'प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अजर, अमर और अजेय बना दीजिये।'
ब्रह्माजीने कहा— तू अमर कैसे हो सकता है? जो इस संसारमें जन्म ले चुका है, उसकी मृत्यु अटल है।
तारकासुर बोला— तब मुझे 'अजेय' बना दीजिये।
ब्रह्माजीने कहा— दैत्यराज! तू 'अजेय' होगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु एक बालकको छोड़कर अन्य सबसे ही तेरी अजेयता रहेगी।
इस प्रकार वरदान पाकर तारकासुर बड़ा बलवान् हो गया। उस समय देवतालोग राजा मुचुकुन्दका