संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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माप लिया। फिर उस विराट् स्वरूपको छोड़कर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन पुनः वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपने आसनपर विराजमान हुए। उस समय देवता, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध और चारण यज्ञपति भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये बलिके यज्ञमें आये। ब्रह्माजीने वहाँ आकर परमात्मा श्रीहरिका स्तवन किया। गन्धर्वपतियोंने गीत गाये तथा अप्सराओं, विद्याधरियों और किन्नरोंने विशेष समारोहके साथ नृत्य किया। महात्मा बलिके यज्ञ-मण्डपमें प्रह्लादजी भी पधारे। अन्यान्य दैत्यपति भी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचे। उस समय भगवान् वामनने बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिसे हँसकर पूछा—'देवि! तुम्हारे पतिके द्वारा आज मुझे तीन पग पृथ्वी मिलनी चाहिये। उसकी पूर्ति इस समय कहाँसे होगी, इसका उत्तर शीघ्र दो।' विन्ध्यावलि बड़ी साध्वी थी। उसे इस घटनासे तनिक भी विस्मय नहीं हुआ। वह भगवान् त्रिविक्रमसे इस प्रकार बोली—'देव! आप समस्त लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आपने अपना भारी डग बढ़ाकर यह त्रिलोकी माप ली है। इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् आपसे व्याप्त है। संसारके एकमात्र बन्धु आप ही हैं। आपके स्वरूपकी तुलना कहीं नहीं है। भला हम-जैसे लोग आपको क्या दे सकते हैं? इसलिये इस समय मैं जो निवेदन करती हूँ, उसीके अनुसार कार्य कीजिये। मेरे स्वामीने इस समय आपको तीन पग भूमि देनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मेरे पूज्य पतिदेव तीनों पगोंके लिये स्थान इस प्रकार दे रहे हैं—प्रभो! देवेश्वर! आप अपना पहला पग मेरे मस्तकपर रखिये। जगत्पते! दूसरा पग मेरे इस बालकके मस्तकपर स्थापित कीजिये तथा जगन्नाथ! अपना तीसरा पग मेरे पतिके मस्तकपर रख दीजिये। केशव! इस प्रकार ये तीन पग मैं आपको दूँगी।'
विन्ध्यावलिकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और राजा बलिसे मधुर वाणीमें बोले—'तात! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो—मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ। महामते! सम्पूर्ण दाताओंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण किये देता हूँ।' भगवान् वामनने ऐसा कहकर विरोचनकुमार बलिको बन्धनसे मुक्त कर दिया और उन्हें छातीसे लगा लिया। तब बातचीत करनेमें चतुर राजा बलि इस प्रकार बोले—'प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न किया है। अतः आपके चरणारविन्दोंके सिवा दूसरी कोई वस्तु मैं नहीं चाहता। देव! जनार्दन! आपके चरण-कमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे। देवेश्वर! वह सनातन भक्ति बार-बार निरन्तर बढ़ती रहे।'
बलिके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वामनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—'राजन्! तुम अपने भाई-बन्धु और सम्बन्धियोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ।' यह सुनकर दैत्यराज बलि बोले—'देवदेव! आप ही बताइये, सुतललोकमें मेरा क्या काम है? मैं तो आपके पास ही रहूँगा, इसके विपरीत कुछ भी कहना उचित नहीं है।' तब भगवान् हृषीकेश राजा बलिके प्रति अत्यन्त कृपालु होकर बोले—'राजन्! मैं सदा तुम्हारे समीप रहूँगा। असुरश्रेष्ठ! तुम खेद न करो, मेरी बात