भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


श्रीअयोध्या-माहात्म्य

## अयोध्यापुरीकी महिमा और सीमाका वर्णन, चक्रतीर्थ एवं श्रीविष्णुहरिका माहात्म्य

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।  
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥  

महाक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें जब महात्मा राजा श्रीरामचन्द्रजीका बारह वर्षोंमें पूरा होनेवाला यज्ञ चल रहा था, उस समय उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर शुद्ध अन्तःकरणवाले सभी मुनि पधारे थे, जो वेदों और वेदांगोंके पारगामी विद्वान् थे। वे वहाँ स्नान करके न्यायपूर्वक जप आदि कर्म करके वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित भरद्वाज मुनिको आगे करके क्रमशः विचित्र-विचित्र आसनोंपर बैठे। उस समय व्यासशिष्य रोमहर्षण सूतजीसे भरद्वाज आदि मुनिवरोंने पूछा—'महाभाग! इस समय हम महापुरी अयोध्याका गुणोंसे उज्ज्वल एवं रहस्ययुक्त सनातन माहात्म्य सुनना चाहते हैं। विष्णुप्रिया अयोध्या कैसी है? उसमें कैसे स्थान हैं, कौन-कौन-से तीर्थ हैं और उसके सेवनसे कैसा फल प्राप्त होता है?'

**सूतजी बोले—** तपोधनो! मैं भगवान् व्यासको प्रणाम करके आपके आगे महापुरी अयोध्याके रहस्ययुक्त माहात्म्यका यथावत् वर्णन करता हूँ। अलसीके फूलकी भाँति जिनकी श्याम कान्ति है तथा जिन्होंने रावणका विनाश किया है, उन कमलके समान नेत्रोंवाले अविनाशी परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ।\* अयोध्यापुरी परम पवित्र है, पापी मनुष्योंको इसकी प्राप्ति होनी बहुत कठिन है। जिसमें साक्षात् भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, वह अयोध्यापुरी भला किसके सेवनके योग्य नहीं है? अयोध्या सरयूके तटपर बसी है। वह दिव्य पुरी परम शोभासे युक्त है। प्रायः बहुत-से तपस्वी महात्मा उसके भीतर निवास करते हैं। जिस पुरीमें सूर्यवंशी इक्ष्वाकु आदि सब राजा प्रजापालनमें तत्पर रहे हैं। जिसके किनारे मानसरोवरसे निकली हुई पुण्यसलिला सरयू नामवाली नदी सदा सुशोभित होती है और उसके तटपर भ्रमरोंके गुंजन एवं पक्षियोंके कलरव होते रहते हैं। मुनिवरो! भगवान् विष्णुके दहिने चरणके अँगूठेसे गंगाजी और बायें चरणके अँगूठेसे शुभकारिणी सरयूजी निकली हैं। इसलिये वे दोनों नदियाँ परम पवित्र तथा सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हैं। इनमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्याका नाश कर डालता है। अकार कहते हैं ब्रह्माको, यकार विष्णुका नाम है और धकार रुद्रस्वरूप है, इन सबके योगसे 'अयोध्या' नाम शोभित होता है। समस्त उपपातकोंके साथ ब्रह्महत्या आदि महापातक इस पुरीसे युद्ध नहीं कर सकते, इसलिये इसे 'अयोध्या' कहते हैं। यह भगवान् विष्णुकी आदिपुरी है और विष्णुके सुदर्शनचक्रपर स्थित है। अतएव पृथ्वीपर अतिशय पुण्यदायिनी है। इस पुरीकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं। सहस्रधारातीर्थसे पूर्व दिशामें एक योजनतक और समं नामक स्थानसे पश्चिम दिशामें एक योजनतक, सरयूतटसे दक्षिण दिशामें एक योजनतक और तमसासे उत्तर दिशामें एक योजनतक इस अयोध्याक्षेत्रकी स्थिति है। यही भगवान् विष्णुका अन्तर्गृह है। यह

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\* नमामि परमात्मानं रामं राजीवलोचनम्। अतसीकुसुमश्यामं रावणान्तकमव्ययम्॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० १।२९)