संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५०९
विष्णुपूरी मछलीके आकारवाली बतलायी गयी है। पश्चिम दिशामें गो-प्रतारतीर्थसे लेकर असीतीर्थपर्यन्त इसका मस्तक है, पूर्व दिशामें इसका पुच्छ भाग है और दक्षिण एवं उत्तर दिशामें इसका मध्यम भाग है।
प्राचीन कालमें विष्णुशर्मा नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। वे वेद-वेदांगके तत्त्वज्ञ और धर्म-कर्ममें तत्पर रहनेवाले थे। विष्णुशर्मा निरन्तर भगवान् विष्णुके भजनमें संलग्न रहते थे। एक दिनकी बात है, वे तीर्थयात्राके प्रसंगसे अयोध्यापुरीमें आये। वहाँ उन्होंने शाक, मूल और फल खाकर तपस्या प्रारम्भ की। सबेरे स्नान करके विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करते और इन्द्रियसमुदायको वशमें करके विशुद्ध चित्तसे भगवान् विष्णुमें मन लगाकर प्राणायाम करते हुए ओंकारका जप करते तथा हृदयमें विकसित कमलका चिन्तन करके उसके ऊपर पीताम्बरधारी शंख-चक्र-गदाधर भगवान् विष्णुका ध्यान एवं पुष्प आदिसे मानसिक पूजन करते थे। ब्रह्मरूप श्रीहरिका ध्यान और द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए वे वायु पीकर रहने लगे। इस प्रकार उस ब्राह्मणके तीन वर्ष बीत गये। तदनन्तर विप्रवर विष्णुशर्माने ध्यानपूर्वक भगवान् विष्णुका इस प्रकार स्तवन किया।
विष्णुशर्मा बोले—भगवन्! विष्णो! आप प्रसन्न होइये। पुरुषोत्तम! प्रसन्न होइये। देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये। कमलनयन! प्रसन्न होइये। कृष्ण! आपकी जय हो। अचिन्त्य परमेश्वर! आपकी जय हो। विष्णो! आपकी जय हो। अव्यय! आपकी जय हो। नाथ! यज्ञपते! आपकी जय हो। विष्णो! आप सबके पालक और सर्वत्र व्यापक हैं, आपकी जय हो। पापहारी अनन्त! आपकी जय हो। जन्मरूपी ज्वरका निवारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा जो कमलकी माला धारण करते हैं, ऐसे आप श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। सर्वेश! आपको नमस्कार है। कैटभका संहार करनेवाले भूतेश्वर! आपको नमस्कार है। जगत्के मूल कारण जगदीश्वर! आप तीनों लोकोंके रक्षक हैं, आपको नमस्कार है। आप देवताओंके भी अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। आप जलमें शयन करनेवाले नारायण हैं, आपको नमस्कार है। सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले सच्चिदानन्दमय श्रीकृष्णको नमस्कार है। जहाँ योगीजनोँका मन रमण करता है, उन श्रीरामको नमस्कार है। चक्र-सुदर्शनधारी श्रीहरिको नमस्कार है। आप सब लोगोंकी माता हैं, आप ही जगत्के पिता हैं, भयसे व्याकुल प्राणियोंके लिये आप ही सुहृद् और मित्र हैं, आप ही पिता और पितामह हैं, हविष्य, वषट्कार, प्रभु और अग्नि सब कुछ आप ही हैं, आप ही करण, कारण, कर्ता और परमेश्वर हैं। हाथमें शंख-चक्र-गदा धारण करनेवाले माधव! मेरा उद्धार कीजिये। मन्दराचलधारी कच्छप! आप प्रसन्न होइये। मधुसूदन! प्रसन्न होइये। कमलाकान्त! प्रसन्न होइये। भुवनेश्वर! प्रसन्न होइये।
इस प्रकार स्तुति करते हुए महात्मा विष्णुशर्माकी भक्तिसे प्रसन्न हो विश्वात्मा भगवान् विष्णु गरुड़की पीठपर बैठे हुए वहाँ प्रकट हुए। उनके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरधारी अविनाशी श्रीहरि प्रसन्न चित्त हो विष्णुशर्मासे इस प्रकार बोले—'वत्स! मैं तुम्हारी बड़ी भारी तपस्यासे इस समय सन्तुष्ट हूँ। इस स्तोत्रसे तुम्हारा पाप नष्ट हो गया है। विप्रवर! कोई वर माँगो।' विष्णुशर्मा बोले—'देवेश! इस समय आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया हूँ। जगदीश्वर! मुझे एकमात्र अपनी अविचल भक्ति प्रदान कीजिये।'
श्रीभगवान्ने कहा—तुम्हें मोक्ष देनेवाली मेरी अविचल वैष्णवी भक्ति प्राप्त हो और यहींपर