भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मुक्तिदायिनी गंगा भी प्रकट होकर अविचल-रूपसे रहें।

यों कहकर देवदेवेश्वर श्रीविष्णुने चक्रसे उस स्थलको खोदकर पातालमण्डलसे गंगाजीका जल प्रकट किया। तबसे वह स्थान चक्रतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह त्रिभुवनप्रसिद्ध तीर्थ समस्त पापराशिका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। तदनन्तर भगवान् विष्णुने विष्णुशर्मासे पुनः कहा—'विप्रवर! यहाँ भक्तोंको मुक्ति देनेवाली मेरी मूर्ति विष्णुहरिके नामसे प्रसिद्ध होकर रहे।' भगवान्‌की यह बात सुनकर बुद्धिमान् ब्राह्मणने भगवान् विष्णुकी उस मूर्तिको स्थापित किया। तबसे शंख, चक्र, गदा और पीताम्बर धारण करनेवाले चतुर्भुज भगवान् विष्णु वहाँ विष्णुहरिके नामसे स्थित हुए। कार्तिक शुक्ल पक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक वहाँकी वार्षिक यात्रा होती है। चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करेगा, उसके पितर तृप्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जायँगे। समस्त सद्गुणोंके सागर ध्येयमूर्ति सच्चिदानन्दमय श्रीहरि इस प्रकार लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके लिये उत्तम स्वरूप धारण करके वहाँ स्थित हुए। जो वहाँ चक्रतीर्थमें स्नान करके अधिक भक्तिभावसे भगवान् विष्णुहरिकी पूजा करता है, वह पुण्यात्मा मनुष्य वैकुण्ठधाममें निवास करता है।


ब्रह्मकुण्ड, ऋणमोचन तथा पापमोचन आदि तीर्थोंकी महिमा

सूतजी कहते हैं— प्राचीन कालमें जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुको अयोध्यापुरीमें निवास करते देख स्वयं भी वहाँ रहनेका निश्चय किया। उन्होंने वहाँकी यात्रा की और अपने नामसे एक विशाल कुण्ड बनाया, जो अनेक देवताओंसे संयुक्त तथा अगाध जलराशिकी लोल लहरोंसे सुशोभित था। कुमुद, उत्पल, कह्लार और पुण्डरीकसे आच्छादित हुआ वह कुण्ड सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस समय ब्रह्माजीने कुण्डके विषयमें इस प्रकार कहा—'इसमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे पापी जीव भी विमानपर बैठकर सुन्दर, दिव्य वस्त्रसे सुशोभित हो प्रलयकालपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करेंगे। यहाँ यथाशक्ति दान और होम करनेसे मनुष्य तुलादान और अश्वमेध यज्ञका पुण्य प्राप्त कर लेंगे। इस तीर्थमें विधिपूर्वक किया हुआ स्नान, दान और जप आदि कर्म सम्पूर्ण यज्ञोंके समान महापातकोंका नाश करनेवाला होगा। यह कुण्ड ब्रह्मकुण्डके नामसे प्रसिद्ध होगा और इसके समीप मैं सदा निवास करूँगा।'

यों कहकर देवदेव, लोकपितामह ब्रह्माजी उस तीर्थको देखकर देवताओंके साथ अन्तर्धान हो गये। तभीसे वह कुण्ड इस पृथ्वीपर विशेष विख्यात है। वह महाकुण्ड चक्रतीर्थसे पूर्व दिशामें स्थित है। ब्रह्मकुण्डसे पूर्व-उत्तर दिशामें सात सौ धनुषकी दूरीपर सरयूजीके जलमें ऋणमोचन नामक तीर्थ विद्यमान है। वहाँ पूर्वकालमें तीर्थयात्राके प्रसंगसे आये हुए मुनिवर लोमशने विधिपूर्वक स्नान किया था। इससे वे ऋणमुक्त एवं पापशून्य हो गये। तब उन्होंने अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर हर्षसे आँसू बहाते हुए कहा—'यह ऋणमोचन नामक तीर्थ बहुत उत्तम है। मनुष्यपर इहलोक और परलोकके जो तीन प्रकारके ऋण हैं, वे सब इस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। इसलिये यहाँ फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको श्रद्धापूर्वक विधिके साथ यथाशक्ति स्नान और दान करना चाहिये।' इस प्रकार तीर्थका माहात्म्य बतलाकर मुनिश्रेष्ठ लोमश उसके गुणकी प्रशंसा करते हुए अन्तर्धान हो गये। ऋणमोचन