संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५११
तीर्थसे पूर्व दिशामें बीस धनुषकी दूरीपर पापमोचन तीर्थ है। यह भी सरयूके जलमें ही है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य उसी क्षण सब पापोंसे मुक्त हो शुद्धचित्त हो जाता है। पांचालदेशमें नरहरि नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था जो दुष्टोंके संगके प्रभावसे पापात्मा हो गया था। उसने ब्रह्महत्या आदि अनेक प्रकारके पाप किये थे। पापियोंके संसर्गमें आकर वह तीनों वेदोंके मार्गकी निन्दा करता था। वह किसी समय साधुओंके साथ तीर्थयात्राके प्रसंगसे अयोध्याजीमें आया। उस महापातकी ब्राह्मणने साधुसंगसे पापमोचन तीर्थमें स्नान किया। फिर तो उसी क्षण उसकी सारी पापराशि नष्ट हो गयी और वह निष्पाप हो दिव्य विमानपर बैठकर विष्णुधाममें चला गया। मनुष्योंको सब पापकी शुद्धिके लिये वहाँ माघकृष्ण चतुर्दशीको विशेषरूपसे स्नान और दान करना चाहिये। अन्य समयमें भी स्नान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है।
पापमोचन तीर्थसे पूर्व दिशामें सौ धनुषकी दूरीपर सहस्त्रधारा नामक उत्तम तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसीमें शत्रु-वीरोंका नाश करनेवाले वीरवर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रकी आज्ञासे योगशक्तिद्वारा प्राण त्यागकर अपने शेष नामक स्वरूपको प्राप्त हुए थे। एक धनुषका प्रमाण साढ़े तीन हाथ माना गया है और चार हाथका एक दण्ड बताया गया है। पहलेकी बात है, रघुकुलनायक श्रीरामचन्द्रजी देवताओंका कार्य पूरा करके कालके साथ बैठकर एकान्तमें मन्त्रणा कर रहे थे। उस समय उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी कि परस्पर मन्त्रणा करते समय हम दोनोंको जो कोई समीप आकर देखेगा, वह शीघ्र ही मेरे द्वारा त्याग दिया जायगा। ऐसा निश्चय करके जब वे मन्त्रणा करने लगे तब लक्ष्मणजी राजद्वारपर खड़े हो पहरा देने लगे। उसी समय तेजोनिधि, तपोराशि दुर्वासाजी आ पहुँचे और भूखसे व्याकुल हो लक्ष्मणजीसे प्रेमपूर्वक बोले—'सुमित्रानन्दन! तुम शीघ्र जाओ तथा श्रीरामचन्द्रजीके आगे मेरे आगमनकी सूचना दो। मैं कार्यवश उनसे मिलने आया हूँ। तुम्हें मेरी यह बात टालनी नहीं चाहिये।'
तब लक्ष्मणजी शापसे डरकर शीघ्र ही भीतर गये और श्रीरामचन्द्रजी तथा कालदेव दोनोंके सामने खड़े हो यह निवेदन किया कि 'तपोराशि अत्रिनन्दन दुर्वासा श्रीरघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये आये हैं।' श्रीरामचन्द्रजीने कालसे सलाह करके उन्हें विदा किया तथा स्वयं बाहर निकले। बाहर आनेपर उन्होंने मुनिको देखा और प्रणाम करके उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराया। उसके बाद उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया तथा सत्य-भंग होनेके भयसे श्रीरघुवीरने लक्ष्मणको त्याग दिया। लक्ष्मणजी भी अपने बड़े भाईकी आज्ञाको सफल बनानेके लिये सरयूके तटपर आये और स्नान करके ध्यानका आश्रय ले सच्चिदानन्दमय परमेश्वरमें अपने शान्त मनको शीघ्र ही लगाकर अविचलभावसे बैठ गये। तदनन्तर सहस्रफणोंसे सुशोभित शेषनाग पृथ्वीको सहस्र छिद्रोंमें भेदन करके वहाँ प्रकट हुए। इसी समय देवराज इन्द्र