भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भी देवताओंको साथ लेकर स्वर्गलोकसे वहाँ आये। शेषनागके फणोंकी सहस्र मणियोंसे वहाँकी पृथ्वी दग्ध हो गयी थी; इसलिये सरयूतटवर्ती यह शुभकारक महातीर्थ सहस्रधाराके नामसे विख्यात हुआ। इस क्षेत्रका प्रमाण पचीस धनुष है; इस तीर्थमें मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान, दान और श्राद्ध करनेसे सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इसमें स्नान करके अविनाशी भगवान् शेषकी विधिपूर्वक पूजा करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है। अतः इस तीर्थमें विधिवत् स्नान करना चाहिये। श्रावणके शुक्ल पक्षमें जो पंचमी तिथि होती है, उसमें यहाँ नागोंके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक उत्सव करना चाहिये। उस उत्सवमें पहले शेषनागका पूजन करना उचित है। नागपूजापूर्वक ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट किया जाय, तो सभी सर्प प्रसन्न होते हैं और प्रसन्न होनेपर वे मनुष्योंको कभी पीड़ा नहीं देते हैं। जो वैशाख मासमें एकाग्रचित्त होकर यहाँ स्नान करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। इसलिये मनुष्योंको इस तीर्थमें यत्नपूर्वक वैशाख मासका स्नान, दान, श्रीहरिका पूजन और ब्राह्मणोंका सत्कार करना चाहिये। जो बुद्धिमान् मनुष्य इस तीर्थमें अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान-दान आदि करता है, वह शुद्धचित्त होकर इस लोकमें प्रचुर सुखोंका उपभोग करता है और भक्तिभावके प्रभावसे अन्तमें शेषशायी भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।


स्वर्गद्वार तथा चन्द्रहरितीर्थकी महिमा, चन्द्रसहस्रव्रतकी उद्यापनविधि

सूतजी कहते हैं- स्वर्गद्वार नामसे प्रसिद्ध तीर्थ सब पापोंको दूर करनेवाला है। स्वर्गद्वारके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है, इसलिये संक्षेपसे सुनो। सरयूके जलमें सहस्रधारा तीर्थसे लेकर पूर्व दिशामें छः सौ छत्तीस धनुषतक पुराणके ज्ञाताओंने स्वर्गद्वारका विस्तार बतलाया है। सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल अपनेको प्राप्त हो, ऐसी इच्छा रखनेवाले पुरुषको यहाँ विशेषरूपसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये। स्वर्गद्वारमें जो जप, तप, हवन, दर्शन और ध्यान, अध्ययन एवं दान आदि किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। सहस्रों जन्मान्तरोंमें पहले जो पाप संचित किया गया है, वह स्वर्गद्वारमें प्रवेश करनेमात्रसे तत्काल नष्ट हो जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, म्लेच्छ, संकीर्ण पापयोनि, कीड़े, मकोड़े, मृग, पक्षी जो भी स्वर्गद्वारमें कालसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सब हाथमें कौमोदकी गदा ले गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो सुन्दर कल्याणमय वैकुण्ठधाममें जाते हैं। जो लोग आदरपूर्वक वहाँ मध्याह्नमें स्नान करते हैं तथा जो जितेन्द्रिय पुरुष स्वर्गद्वारमें निराहार व्रत करते हैं अथवा जो एक मासतक उपवास करनेवाले हैं, वे सभी उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं। जो स्वर्गद्वारमें ब्राह्मणोंको अन्नदान, रत्नदान, भूमिदान, गोदान तथा वस्त्रदान करते हैं, वे सब श्रीहरिके धामको जाते हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु अपने स्वरूपको चार शरीरोंमें व्यक्त करके रघुवंशशिरोमणि श्रीराम होकर अपने तीनों भाइयोंके साथ यहाँ नित्य विहार करते हैं। इसी स्वर्गद्वारमें कैलासनिवासी शिव भी वास करते हैं। मेरु तथा मन्दराचलके समान पापकी बड़ी भारी राशि भी स्वर्गद्वारमें पहुँचते ही नष्ट हो जाती है। ऋषि, देवता, असुर, जप-होमपरायण मनुष्य, संन्यासी और मुमुक्षु पुरुष स्वर्गद्वारका सेवन करते हैं। काशीमें योगयुक्त होकर शरीर त्याग करनेवाले पुरुषोंको