भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 542

* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१३

जो गति प्राप्त होती है, वही एकादशीको सरयूमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाती है। वे भगवान् विष्णुकी भक्तिको पाकर निश्चय ही परमानन्दको प्राप्त होते हैं।

एक समय शीतरश्मि चन्द्रमा अयोध्यावासी भगवान् विष्णुको नमस्कार करके उत्कण्ठापूर्वक यहाँके तीर्थकी महिमाका साक्षात्कार करनेके लिये आये। यहाँ आकर उन्होंने क्रमशः प्रत्येक तीर्थमें विधिपूर्वक यात्रा की। इससे उन्हें अनेक प्रकारके आश्चर्यका अनुभव हुआ। तत्पश्चात् दुष्कर तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनकी प्रसन्नता प्राप्त की और वहाँ अपने नामके साथ भगवान्‌का नाम रखकर उनके अर्चाविग्रहको स्थापित किया। इससे वे भगवान् वहाँ चन्द्रहरिके नामसे विख्यात हुए। श्रीवासुदेवके प्रसादसे वह स्थान अद्भुत हो गया। वह श्रीविष्णुका अत्यन्त गूढ़ स्थान है। समस्त प्राणियोंके मोक्षके स्वामी श्रीरघुनाथजीके इस दिव्य स्थानमें सिद्धपुरुष सदा श्रीविष्णुका व्रत धारण किये निवास करते हैं। नाना प्रकारके वेषवाले जितेन्द्रिय मुक्तात्मा पुरुष यहाँ विष्णुलोककी आकांक्षा रखकर नित्य उत्तम योगका अभ्यास करते हैं। यहाँ मनुष्य जिस प्रकार धर्मका फल पाता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं पाता। इसमें किया हुआ दान, व्रत और होम सब अक्षय होता है। मनुष्योंको यहाँ भगवान् चन्द्रहरिके आगे ब्राह्मणकी प्रधानतामें चन्द्रसहस्रव्रतकी उद्यापनविधि करनी चाहिये। दो वर्ष, आठ महीने और सत्रह दिन बीतनेपर दिनके आठवें भागमें एक अधिमास आकर प्राप्त होता है*। तिरासी वर्ष चार महीनेमें एक सहस्रसे अधिक चन्द्रमा (पूर्णमासी तिथिमें) होते हैं। उतने समयतक जो मनुष्य जीवित रहता है, उसको यात्राके प्रसंगसे यहाँ आकर उद्यापन करना चाहिये। चतुर्दशीमें दन्तधावनपूर्वक स्नान करके पवित्र हो, ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए मन, वाणी और शरीरको काबूमें रखे और पूर्णिमा तिथिको भी उसी प्रकार रहते हुए चन्द्रमाकी पूजा करे। पहले गौरी आदि षोडश मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद भक्तिपूर्वक नान्दीमुख श्राद्ध करके ऋत्विजोंका पूजन करे। मनको पवित्र रखते हुए चन्द्रमण्डलके आकारकी प्रतिमा बनवावे। तदनन्तर शास्त्रोक्त विधानसे चन्द्रमाकी पूजा करे। चन्द्रमाके मन्त्रसे होम करे। प्रतिमा स्थापन करते समय भी सोममन्त्रका उच्चारण करे, सोमकी उत्पत्ति और सोमसूक्तका पाठ करे। मण्डलमें चन्द्रन्यास, कलान्यास और विधिपूर्वक एकादश इन्द्रियोंका न्यास करे। उत्तम अक्षतोंसे चन्द्रबिम्बके समान मण्डल बनावे। उसके बीचमें गायके दूधसे भरे हुए कलशकी स्थापना करे। फिर उस मण्डलमें भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा क्रमशः चन्द्रमाकी पूजा करे— हिमांशवे नमः, सोमचन्द्राय नमः, चन्द्राय नमः, विधवे नमः, कुमुदबन्धवे नमः, सुधांशवे नमः, सोमाय नमः, ओषधीशाय नमः, अब्जाय नमः, मृगाङ्काय नमः, कलानिधये नमः, नक्षत्रनाथाय नमः, शर्वरीपतये नमः, जैवातृकाय नमः, द्विजराजाय नमः, चन्द्रमसे नमः —इन सोलह नामोंसे क्रमशः चन्द्रमाका स्तवन करे। तदनन्तर पवित्र चित्त हो शंखमें जल, फल, फूल और चन्दन लेकर निम्नांकित मन्त्रसे विधिपूर्वक अर्घ्य दे—

अर्घ्य-मन्त्र

नमस्ते मासमासान्ते जायमान पुनः पुनः।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्क त्वं रोहिण्या सहितो मम॥

'प्रत्येक मासके अन्तमें पूर्णरूपेण प्रकट होनेवाले चन्द्रदेव! आपको नमस्कार है, आप रोहिणी देवीके साथ पधारकर मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।'

इस प्रकार विधिपूर्वक अर्घ्य देकर चन्द्रमाको


* गते वर्षद्वये सार्धे पञ्चपक्षे दिनद्वये। दिवसस्याष्टमे भागे पतत्येकोऽधिमासकः॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० ३।५६)

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