संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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देवता बोले—जगत्पते! इस समय आपके द्वारा | संगम है, जहाँ गोप्रतारघाटसे तीन योजन हमारा सब कार्य सिद्ध हो गया तथापि हमारी | पश्चिम घाघरा नदीसे सरयूका संगम हुआ है। रक्षाके लिये आपको सदैव यहीं रहना चाहिये। | वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके समस्त मनोरथोंकी श्रीभगवान् बोले—देवताओ! यह कथा संसारमें | सिद्धि करनेवाले भगवान् गुप्तहरिका दर्शन प्रसिद्धिको प्राप्त होगी। समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ | करना चाहिये। जो पुरुष यहाँ उत्तम भक्तिसे पूजा, यज्ञ और | ऐसा कहकर पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु जप आदिका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको | वहीं अन्तर्धान हो गये। देवता भी विधिपूर्वक प्राप्त होता है। जो जितेन्द्रिय मानव अपनी | यात्रा करके यत्नपूर्वक अयोध्यामें रहने लगे। शक्तिके अनुसार यहाँ दान करता है, वह | तबसे यह स्थान पृथ्वीमें विख्यात हो गया। अनुपम स्वर्गलोकको पाकर फिर कभी शोक | कार्तिककी पूर्णिमाको विशेषरूपसे यहाँकी वार्षिक नहीं करता। यहाँ मेरी प्रसन्नताके लिये शुद्धचित्तसे | यात्रा होती है। वहाँ संगमस्नान करके भगवान् गोदान करना चाहिये। जो मेरी भक्तिमें तत्पर | गुप्तहरिका दर्शन किया जाता है। तत्पश्चात् होकर यहाँ आत्मशुद्धिके लिये स्नान करते हैं, | सरयू और घाघराके मिले हुए जलके तटपर उनकी मुक्ति उनके हाथमें ही है। भगवान् | गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके सम्पूर्ण कामनाओंको चक्रहरिके स्थानपर मेरी प्रीतिके लिये प्रयत्नपूर्वक | देनेवाले भगवान्की पूजा करनी चाहिये। मार्गशीर्ष उत्तम दान और जप-होमादि करना चाहिये। | शुक्ला द्वादशीको चक्रहरिकी यात्रा करनी चाहिये। श्रेष्ठ देवताओ! तुम भी यहाँ विधानसे यात्रा | जो इस प्रकार यात्रा करता है, वह भगवान् करो। इस गुप्तहरिके स्थानके निकट ही शुभ | विष्णुके लोकमें आनन्दका अनुभव करता है।
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गोप्रतारतीर्थकी महिमा और श्रीरामके परमधामगमनकी कथा
सरयू और घाघराके संगममें दस कोटिसहस्र | जो संगमपर श्रद्धापूर्वक सुवर्ण, अन्न और वस्त्र तथा दस कोटिशत तीर्थ हैं। उस संगमके जलमें | देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। संगममें स्नान करके एकाग्रचित्त हो देवताओं और पितरोंका | स्नान करनेवाला मनुष्य सात पीढ़ी पूर्वकी तथा तर्पण करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। | सात पीढ़ी भावी सन्तति इन सबको तार देता है। फिर वैष्णवमन्त्रसे हवन करके पवित्र होवे। | संगमके समीप ही एक दूसरा गोप्रतार नामक अमावास्या, पूर्णिमा, दोनों द्वादशी तिथि, अयन | तीर्थ है। वह भी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला और व्यतीपातयोग आनेपर संगममें किया हुआ | है। उसमें स्नान और दान करनेसे मनुष्य कभी स्नान विष्णुलोक प्रदान करनेवाला है। विष्णुभक्त | शोकके वशीभूत नहीं होता है। जैसे काशीमें पुरुष भगवान् विष्णुकी पूजा करके उन्हींकी लीला- | मणिकर्णिका, उज्जयिनीमें महाकाल-मन्दिर तथा कथाका श्रवण करते हुए विष्णुप्रीतिकारक गीत, | नैमिषारण्यमें चक्रवापीतीर्थ सबसे श्रेष्ठ है, उसी वाद्य, नृत्य तथा पुण्यमयी कथा-वार्ताके द्वारा | प्रकार अयोध्यामें गोप्रतार-तीर्थका महत्त्व सबसे रात्रिमें जागरण करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल विधिपूर्वक | अधिक है, जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे श्रद्धासे स्नान करके भगवान् विष्णुका पूजन करे | समस्त साकेतनिवासियोंको उनके दिव्य धामकी और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति सुवर्ण आदि दान करे। | प्राप्ति हुई थी।