संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 550, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२१
पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने आलस्यहीन होकर देवताओंका कार्य पूरा करके अपने भाइयोंके साथ परम धाममें जानेका विचार किया। गुप्तचरोंके मुँहसे यह समाचार सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, भालु, गोपुच्छ एवं राक्षस झुंड-के-झुंड वहाँ आये। वानरगण देवताओं, गन्धर्वों तथा ऋषियोंके पुत्र थे। वे सब-के-सब श्रीरामचन्द्रजीके अन्तर्धान होनेका समाचार पाकर वहाँ आ पहुँचे। श्रीरामचन्द्रजीके समीप आकर सब वानर यूथपतियोंने कहा—'राजन्! हम सब लोग आपके साथ चलनेके लिये आये हैं। पुरुषोत्तम! यदि आप हमें छोड़कर चले जायँगे तो हम सब लोग महान् दण्डसे मारे गये प्राणियोंकी-सी अवस्थामें पहुँच जायँगे।' उन वानर, भालु और राक्षसोंकी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उसी क्षण विभीषणसे कहा—'विभीषण! जबतक भूतपर प्रजा रहे, तबतक तुम भी यहीं रहकर लंकाके महान् साम्राज्यका पालन करो। मेरा वचन अन्यथा न करो।' विभीषणसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीरामचन्द्र हनुमान्जीसे बोले—'वायुनन्दन! तुम चिरजीवी रहो। कपिश्रेष्ठ! जबतक लोग मेरी कथा कहें, तबतक तुम प्राणोंको धारण करो। मयंद और द्विविद—ये दोनों अमृतभोजी वानर हैं। ये दोनों तबतक इस पृथ्वीपर जीवित रहें, जबतक कि सम्पूर्ण लोकोंकी सत्ता बनी रहे। ये सभी वानर यहाँ रहकर मेरे पुत्र-पौत्रोंकी रक्षा करते रहें।'
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने शेष वानरोंसे कहा—'तुम सब लोग मेरे साथ चलो।' तदनन्तर रात बीतनेपर जब प्रातःकाल हुआ, तब विशालवक्ष और कमलदलके समान नेत्रोंवाले महाबाहु श्रीराम अपने पुरोहित वशिष्ठजीसे बोले—'भगवन्! प्रज्वलित अग्निहोत्रकी अग्नि आगे चले। वाजपेय यज्ञ और अतिरात्र यज्ञकी अग्नि भी आगे-आगे ले जायी जाय।' तब महातेजस्वी वशिष्ठजीने अपने मनमें सब बातोंका निश्चय करके विधिपूर्वक महाप्रस्थान-कालोचित कर्म किया। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपूर्वक रेशमी वस्त्र धारण किये भगवान् श्रीराम दोनों हाथोंमें कुश लेकर महाप्रस्थानको उद्यत हुए। वे नगरसे बाहर निकलकर शुभ या अशुभ कोई वचन नहीं बोले। भगवान् श्रीरामके वामपार्श्वमें हाथमें कमल लिये लक्ष्मीजी खड़ी हुईं और दाहिने पार्श्वमें विशाल नेत्रोंवाली लज्जा देवी उपस्थित हुईं। आगे मूर्तिमान् व्यवसाय (उद्योग एवं दृढ़निश्चय) विद्यमान था। धनुष, प्रत्यंचा और बाण आदि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र पुरुषशरीर धारण करके भगवान्के पीछे-पीछे चले। ब्राह्मणरूपधारी वेद वामभागमें और गायत्री दक्षिण भागमें स्थित हुई। ॐकार, वषट्कार सभी श्रीरामचन्द्रजीके साथ चले। ऋषि, महात्मा और पर्वत सभी स्वर्गद्वारपर उपस्थित भगवान् श्रीरामके पीछे-पीछे चले। अन्तःपुरकी स्त्रियाँ वृद्ध, बालक, दासी और द्वाररक्षक सबको साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजीके साथ प्रस्थित हुईं। रनिवासकी स्त्रियोंको साथ ले शत्रुघ्नसहित भरत भी चले। रघुकुलसे अनुराग रखनेवाले महात्मा ब्राह्मण भी स्त्री, पुत्र और अग्निहोत्रसहित जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले। मन्त्री भी सेवक, पुत्र, बन्धु-बान्धव तथा अनुगामियोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके पीछे गये। भगवान्के गुणोंसे सतत प्रसन्न रहनेवाली अयोध्याकी सारी प्रजा हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे घिरी हुई श्रीरामचन्द्रजीका अनुगमन करनेके लिये घरसे चल दी। उस समय वहाँ कोई दीन, भयभीत अथवा दुःखी नहीं था, सभी हर्ष और आनन्दमें मग्न थे। अयोध्यामें उस समय कोई अत्यन्त सूक्ष्म प्राणी भी ऐसा नहीं था जो स्वर्गद्वारके समीप खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे न गया हो। वहाँसे