संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आधा योजन दक्षिण जाकर भगवान् पश्चिमकी ओर मुख करके चलने लगे। आगे जाकर रघुनाथजीने पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया। उस समय सब देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंसे घिरे हुए लोकपितामह ब्रह्माजी श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये। उनके साथ सौ कोटि दिव्य विमान भी थे। वे उस समय आकाशको सब ओरसे तेजोमय एवं प्रकाशित कर रहे थे। वहाँ परम पवित्र सुगन्धित एवं सुखदायिनी वायु चलने लगी। श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणोंसे सरयूजीके जलका स्पर्श किया।
तदनन्तर ब्रह्माजी देवताओंके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करने लगे—देव! आप समस्त लोकोंके पति हैं, आपके स्वरूपको कोई नहीं जानता। विशाललोचन! आप अचिन्त्य एवं अविनाशी ब्रह्मरूप हैं। महावीर्य! आप अपने जिस दिव्य स्वरूपको ग्रहण करना चाहें ग्रहण करें। ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने अपने भाइयोंसहित दिव्य वैष्णवतेजमें सशरीर प्रवेश किया। तत्पश्चात् सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुका सब देवताओंने पूजन किया। देवताओंका मनोरथ पूर्ण हुआ था; इसलिये वे सब बहुत प्रसन्न थे। उस समय महातेजस्वी भगवान् विष्णुने पितामह ब्रह्मासे कहा—'सुव्रत! इस जनसमुदायको तुम्हें उत्तम लोक देना चाहिये।' भगवान्का यह आदेश पाकर सर्वलोकेश्वर ब्रह्माने कहा—'वे समस्त मानव सान्तानिक लोकमें निवास करेंगे। स्वर्गद्वार तीर्थमें श्रीरामचन्द्रजीका चिन्तन करते हुए जो प्राणत्याग करता है वह परम उत्तम सान्तानिक लोकको प्राप्त होता है। सान्तानिक लोक मेरे लोकसे भी ऊपर है। वानर आदिमेंसे जो जिस देवताके अंश थे, वे उसीमें मिलेंगे। सूर्यपुत्र सुग्रीव सूर्यमण्डलमें चले जायँगे। ऋषि, नाग और यक्ष सभी अपने-अपने कारणको प्राप्त होंगे।'
देवेश्वर ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर गोप्रतारतीर्थमें उपस्थित जल सरयूको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् वहाँ सरयूजल परिपूर्ण हो गया। फिर तो सबने जलमें डुबकी लगायी और हर्षपूर्वक प्राणत्याग करके मनुष्य-शरीरको त्याग दिया तथा विमानोंपर बैठकर दिव्यलोकको प्रस्थान किया। पशु-पक्षी आदिकी योनिमें जो जीव थे, वे भी सरयूमें प्रवेश करके शरीर त्यागकर दिव्यरूपधारी हो गये। इसी प्रकार अन्य चराचर प्राणी भी उत्तम शरीर पाकर देवलोक (सान्तानिक)-में गये। भगवान् श्रीराम देवताओंके साथ परमधामको गये। अतः सबको तारनेवाला वह तीर्थ 'गोप्रतार' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोप्रतारतीर्थमें उत्तम मोक्ष प्राप्त होता है। गोप्रतारतीर्थमें निःसन्देह भगवान् विष्णु स्थित हैं। उसमें जो स्नान करता है, वह निश्चय ही योगियोंके लिये भी दुर्लभ परम धामको प्राप्त होता है। जितेन्द्रिय मनुष्योंको वहाँ विशेषरूपसे कार्तिककी पूर्णिमामें स्नान करना चाहिये। नियमपूर्वक व्रत पालन करनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे वहाँ स्नानपूर्वक ब्राह्मणोंका विशेषरूपसे पूजन करना चाहिये तथा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये बड़ी भक्तिके साथ नाना प्रकारके अन्न, सुवर्ण और भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यात्मा पुरुष उत्तम विधिसे गोप्रतारतीर्थमें यत्नपूर्वक स्नान करके आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करनेपर समस्त पाप-तापसे रहित हो उन्हींके सायुज्यको प्राप्त होता है।