भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 552
  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२३

क्षीरोदकतीर्थ, बृहस्पतिकुण्ड, रुक्मिणी आदि कुण्डोंका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—सीताकुण्डसे वायव्य कोणमें क्षीरोदक नामक तीर्थ है, जो सब दुःखोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा दशरथने वहीं पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ किया था। यज्ञके अन्तमें वहाँ भगवान् अग्निदेव अपने हाथमें हविष्यसे भरा हुआ सोनेका पात्र लिये दृष्टिगोचर हुए थे। उस हविष्यमें परम उत्तम विष्णुतेज व्याप्त था। राजाने उसके चार भाग करके अपनी पत्नियोंको बाँट दिया। जहाँ उस क्षीर (खीर या हविष्य)-की प्राप्ति हुई, वहीं क्षीरोदक नामवाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थमें आदरपूर्वक स्नान करके सम्पूर्ण भोगों और बहुज्ञ पुत्रोंको प्राप्त करता है। आश्विन शुक्ला एकादशीको व्रतका पालन करनेवाला पुरुष वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके ब्राह्मणको यथाशक्ति दान दे। इससे वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। उस क्षीरोदक स्थानसे नैर्ऋत्यकोणमें बृहस्पतिका कुण्ड प्रसिद्ध है। वह सब पापोंका नाशक तथा पवित्र जलकी तरंगोंसे सुशोभित है, जहाँ साक्षात् बृहस्पतिजीने निवास किया है। वह तीर्थ सघन पत्तोंकी छायासे सुशोभित एवं नाना प्रकारके फल देनेवाला है। पापियोंके लिये वह दुर्लभ है। भादोंके शुक्ल पक्षकी पंचमी तिथिमें वहाँकी यात्रा फलदायिनी होती है। अन्य समयमें भी बृहस्पतिके दिन उसमें किया हुआ स्नान बहुत फलदायक है। जो मनुष्य वहाँ भगवान् विष्णु तथा बृहस्पतिका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठधाममें आनन्दका अनुभव करता है।

उसके दक्षिण भागमें परम उत्तम रुक्मिणीकुण्ड है, जिसे श्रीकृष्णकी प्रियतमा महारानी रुक्मिणी देवीने स्वयं निर्माण कराया था। उस समय भगवान् विष्णुने स्वयं ही उस कुण्डके जलमें निवास किया। पत्नीके स्नेहसे वर देकर भगवान्ने उस कुण्डके महत्त्वको और बढ़ा दिया है। मनुष्यको चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर वहाँ स्नान, दान, वैष्णवमन्त्रसे होम, ब्राह्मणपूजन तथा भगवान् विष्णुका अर्चन करे। कार्तिक कृष्णा नवमीको वहाँकी वार्षिक यात्रा करनी चाहिये। इससे सब पापोंका नाश होता है। यात्रा करनेवाला मनुष्य रुक्मिणी और श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। वहाँ शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—भगवान्‌के श्रीअंगोंमें पीताम्बर शोभा पा रहा है। वे वनमाला पहने हुए हैं और नारद आदि ऋषि उनकी स्तुति करते हैं। मस्तकपर मुकुट शोभा पा रहा है तथा वे इन्द्रनीलमणि आदि दिव्य रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं। वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणि प्रकाशित हो रही है, जो समस्त कामनाओं एवं फलकी प्राप्ति करानेवाली है। भगवान्‌की अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम है। उनके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। इस प्रकार ध्यान करनेपर मनुष्य निःसन्देह सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता है और इहलोकमें सुख भोगकर भगवान्‌के लोकमें आनन्दका अनुभव करता है।

रुक्मिणीकुण्डके वायव्य कोणमें 'धनयक्ष' नामसे प्रसिद्ध उत्तम तीर्थ है। पूर्वकालकी बात है विश्वामित्र मुनिने राजसूय यज्ञ करनेवाले राजा हरिश्चन्द्रसे (दानमें) सारा राज्य ले लिया। तत्पश्चात् वह सब राज्य और धन एक यक्षके संरक्षणमें दे दिया। किसी समय परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनि उस यक्षपर प्रसन्न हुए और बोले—'यक्ष! यह तीर्थ 'धनयक्ष' के नामसे प्रसिद्ध होगा। यहाँ नवों निधियोंका पूजन करनेसे मनुष्य इहलोकमें सुख और परलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। महापद्म, पद्म, शंख, मकर,