भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 553
५२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व—ये नौ निधियाँ हैं*। इन सबका इस कुण्डमें निवास होगा। यहाँ जलमें निधि-लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। माघ कृष्णा चतुर्दशीको यहाँकी वार्षिक यात्रा होनी चाहिये। उस समय स्नान और पितृतर्पण विशेषरूपसे करने चाहिये।'

धनयक्षतीर्थसे उत्तर दिशामें वशिष्ठकुण्ड नामक विख्यात तीर्थ है, जो सदा सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तपोनिधि वशिष्ठ और निर्मल व्रतवाली अरुन्धतीजीका नित्य निवास है। उसमें आलस्य छोड़कर जो बुद्धिमान् पुरुष स्नान और विशेषरूपसे श्राद्ध करता है, उसे उत्तम पुण्यकी प्राप्ति होती है। वहाँ वशिष्ठ और वामदेवजीका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। पतिव्रता अरुन्धती देवी वहाँ विशेषरूपसे पूजनीय हैं। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान और यथाशक्ति दान करना चाहिये। जो उसमें स्नान करता है, वह वशिष्ठके समान होता है। भाद्रमासकी शुक्ला पंचमीको विधिपूर्वक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए वहाँकी वार्षिक यात्रा करनी चाहिये और प्रयत्नपूर्वक श्रद्धासे भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापोंसे शुद्धचित्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।

वशिष्ठकुण्डसे पश्चिम दिशामें सागरकुण्डके नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो सम्पूर्ण कामनाओं और मनोरथोंकी सिद्धि देनेवाला है। उसमें स्नान और दान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। सागरसे नैर्ऋत्यकोणमें उत्तम योगिनीकुण्ड है, जहाँ जलमें चौंसठ योगिनियाँ निवास करती हैं। वे पुरुषोंका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करती हैं और स्त्रियोंको विशेषरूपसे उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। वे सब-की-सब समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाली हैं। योगिनीकुण्डसे पूर्व परम उत्तम उर्वशीकुण्ड है, जिसमें स्नान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें उर्वशीको प्राप्त करता है। यहाँ स्नान करके मनुष्योंको भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला विद्वान् मनुष्य सदैव विष्णुलोकमें निवास करता है। वह स्त्री हो या पुरुष, सब मनोरथोंको पाता है। उर्वशीकुण्डके दक्षिणभागमें उत्तम घोषार्ककुण्ड है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। घावसे युक्त, कोढ़ी, निर्धन अथवा दुःखसे घिरा हुआ जो कोई भी मनुष्य वहाँ विधिपूर्वक स्नान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विशेषतः रविवारको वहाँ आदरपूर्वक स्नान करना चाहिये। रविवारके साथ यदि सप्तमी तिथिका भी योग हो तो वहाँका स्नान बहुत फलदायक होता है। घोष नामक एक राजाने किसी समय उस तीर्थमें स्नान और सन्ध्या करते हुए मुनियोंको देखा। तब उसने भी विधिपूर्वक आचमन करके स्नान किया। स्नान करते ही राजाका शरीर दिव्य हो गया। उनका मन आनन्दसे परिपूर्ण हो गया। तब मुनियोंसे उस तीर्थकी महिमा जानकर राजाने सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये स्तुति की।

राजा बोले—देवदेवेश्वर! भगवान् सूर्य! आपका स्वरूप सच्चिदानन्दमय है, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले तथा जगत्‌को आनन्द देनेवाले सूर्यदेवको नमस्कार है। आप प्रभाके निकेतन तथा दिव्यरूपधारी हैं। तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। योगके ज्ञाता एवं सत्स्वरूप आप भगवान् विवस्वान्‌को नमस्कार है। आप सबसे परे हैं, परमेश्वर हैं और त्रिलोकीका अन्धकार नष्ट करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आप प्रभा फैलानेवाले तेजसे सम्पन्न हैं, आपको सदा नमस्कार हैं। आप योगप्रिय, योगस्वरूप और योगज्ञ हैं, आपको


* महापद्मस्तथा पद्मः शंखो मकरकच्छपौ। मुकुन्दकुन्दनीलाश्च खर्वश्च निधयो नव॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० ७।५१)