भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 554

* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५२५

सदैव नमस्कार है। आप ओंकाररूप, वषट्कारस्वरूप और ज्ञानरूप हैं, आपको नमस्कार है। यज्ञ, यजमान, हविष्य तथा ऋत्विज सब कुछ आप हैं, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण रोगोंके नाशक, आत्मस्वरूप तथा कमलोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अत्यन्त कोमल और अतिशय तीक्ष्ण हैं, सम्पूर्ण देवताओंका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप यज्ञभोक्ता, भक्तरक्षक तथा प्रियस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप निरन्तर प्रकाश देनेवाले और समस्त लोकोंके हितकारी हैं, आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करनेवाला शरणागत भक्त हूँ। प्रभो! आज मुझपर प्रसन्न होइये।

इस प्रकार स्तुति करते हुए अपने भक्त राजा घोषपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो गये और भक्तका प्रिय करनेकी इच्छासे सहसा प्रकट होकर बोले— 'राजेन्द्र! तुमने जो यह स्तवन किया है, इसे जो मनुष्य पढ़ेंगे, उनपर प्रसन्न होकर मैं उनके सब मनोरथोंको पूर्ण करूँगा। यह स्थान आजसे इस पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगा। जो यहाँ स्नान करेगा, वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेगा। इस प्रकार वरदान देकर भगवान् सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। राजाने भगवान् सूर्यके शरीरसे प्रकट हुई दिव्य सूर्यमूर्ति लेकर वहाँ उसको स्थापित किया और स्वयं ही उसकी पूजा की। अतः राजा घोषके नामपर उस तीर्थका नाम घोषार्ककुण्ड हुआ।

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अयोध्याक्षेत्रके अन्य विविध तीर्थोंका वर्णन तथा वसिष्ठके मुखसे विभीषण आदिका अयोध्या-माहात्म्य-श्रवण

घोषार्कतीर्थसे पश्चिम दिशामें रतिकुण्ड नामक प्रसिद्ध तीर्थ है, जो सब पापोंको हरनेवाला है। उससे पश्चिम कुसुमायुधकुण्ड है, जो समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये प्रसिद्ध है। जो पति-पत्नी इन दोनों कुण्डोंमें स्नान करते हैं, वे रति और कामदेवके समान सुन्दर होते हैं। कुसुमायुधकुण्डसे पश्चिम दिशामें मन्त्रेश्वरतीर्थ है। उसमें स्नान करके जो भगवान् मन्त्रेश्वरका दर्शन करता है, वह परम गतिको पाता है। उसके उत्तर कुमुद और कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर है,जिसमें किये हुए स्नान और दान अनेक प्रकारके फल देनेवाले हैं। चैत्र शुक्ला चतुर्दशीको वहाँकी वार्षिक यात्रा उत्तम मानी गयी है। मन्त्रेश्वरकी महिमाका कोई भी भलीभाँति वर्णन नहीं कर सकता। सुगन्धित पुष्प, धूप, चन्दन आदि उपचारोंसे उनका प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले हैं। उनके पूजनसे मुक्ति हो जाती है। वहीं पूर्व दिशामें महारत्ननामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है। उसमें स्नान, दान और ब्राह्मण-पूजन करनेसे
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