भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 557, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 557

५२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इसके उत्तरमें वीर मत्तगजेन्द्रका शुभ सूचक स्थान है। उनके सामने जो सरोवर है, उसमें स्नान करके जो निश्चितरूपसे वहाँ निवास करता है, वह पूर्ण सिद्धिको पाता है। अयोध्याकी रक्षा करनेवाले वीर मत्तगजेन्द्र समस्त कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले हैं। उसके पश्चिम भागमें परम पुरुषार्थी वीर पिण्डारकका स्थान है। सरयूके जलमें स्नान करके वीर पिण्डारककी पूजा करे। वे पापियोंको मोहनेवाले और पुण्यात्माओंको सदा सद्बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं। पिण्डारकके पश्चिम भागमें विघ्नेश्वर (गणेश)-जीकी पूजा करे। उनके दर्शन करनेसे मनुष्योंको लेशमात्र विघ्नका भी सामना नहीं करना पड़ता।

विघ्नेशसे ईशान कोणमें श्रीरामजन्म-स्थान है। इसे ‘जन्म-स्थान’ कहते हैं। यह मोक्षादि फलोंकी सिद्धि करनेवाला है। विघ्नेशसे पूर्व, वशिष्ठसे उत्तर तथा लोमशसे पश्चिम भागमें जन्मस्थान तीर्थ माना गया है। उसका दर्शन करके मनुष्य गर्भवासपर विजय पा लेता है। रामनवमीके दिन व्रत करनेवाला मनुष्य स्नान और दानके प्रभावसे जन्म-मृत्युके बन्धनसे छूट जाता है। आश्रममें निवास करनेवाले तपस्वी पुरुषोंको जो फल प्राप्त होता है, सहस्रों राजसूय और प्रतिवर्ष अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, जन्मस्थानमें नियममें स्थित पुरुषके दर्शनसे तथा माता, पिता और गुरुकी भक्ति करनेवाले सत्पुरुषोंके दर्शनसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वही सब फल जन्मभूमिके दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। सरयूका दर्शन करके भी मनुष्य उस फलको पा लेता है। एक निमेष या आधे निमेष भी किया हुआ श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान मनुष्योंके संसार-बन्धनके कारणभूत अज्ञानका निश्चय ही नाश करनेवाला है। जहाँ कहीं भी रहकर जो मनसे अयोध्याजीका स्मरण करता है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होती। सरयू नदी सदा मोक्ष देनेवाली है। यह जलरूपसे साक्षात् परब्रह्म है। यहाँ कर्मका भोग नहीं करना पड़ता। इसमें स्नान करनेसे मनुष्य श्रीरामरूप हो जाता है। पशु, पक्षी, मृग तथा अन्य जो पापयोनि प्राणी हैं, वे सभी मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, जैसा कि श्रीरामचन्द्रजीका वचन है। सत्यतीर्थ, क्षमातीर्थ, इन्द्रियनिग्रहतीर्थ, सर्वभूतदयातीर्थ, सत्यवादितातीर्थ, ज्ञानतीर्थ और तपस्तीर्थ—ये सात मानसतीर्थ कहे गये हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दया करनारूप जो तीर्थ है, उसमें मनकी विशेष शुद्धि होती है। केवल जलसे शरीरको पवित्र कर लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिस पुरुषका मन भलीभाँति शुद्ध है, उसीने वास्तवमें तीर्थस्नान किया है*। भूमिपर वर्तमान जो तीर्थ हैं उनकी पवित्रताका कारण यह है। जैसे शरीरके कोई अंग मध्यम और कोई उत्तम माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर भी कुछ प्रदेश अत्यन्त पवित्र होते हैं। इसलिये भौम और मानस दोनों प्रकारके तीर्थोंमें निवास करना चाहिये। जो दोनोंमें स्नान करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है। जलचर जीव जलमें ही जन्म लेते और जलमें ही मरते हैं, परंतु वे स्वर्गमें नहीं जाते; क्योंकि उनका मन अशुद्ध होता है और वे मलिन होते हैं। विषयोंमें निरन्तर राग होना मनका मल कहलाता है। उन्हीं विषयोंमें जब


* सत्यतीर्थं क्षमातीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थानां सत्यवादिता ॥
ज्ञानतीर्थं तपस्तीर्थं कथितं तीर्थसप्तकम् । सर्वभूतदयातीर्थे विशुद्धिर्मनसो भवेत् ॥
न तोयपूतदेहस्य स्नानमित्यभिधीयते । स स्नातो यस्य वै पुंसः सुविशुद्धं मनो मतम् ॥
(स्क० पु०, वै० अ० मा० १०। ४६-४८)

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