संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 558, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| * वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * | ५२९ |
|---|
आसक्ति न रह जाय, तब उसे मनकी निर्मलता कहते हैं। यदि मनुष्य भावसे निर्मल है—उसके अन्तःकरणमें शुद्ध भाव है तो उसके लिये दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवा और वेदोंका अध्ययन—ये सभी तीर्थ हैं। इन्द्रियसमुदायको वशमें रखनेवाला पुरुष जहाँ निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर हैं। यह मानसतीर्थका लक्षण बतलाया गया, जिसमें स्नान करनेसे क्रियावान् पुरुषोंके सब कर्म सफल होते हैं।
बुद्धिमान् मनुष्य प्रातःकाल उठकर संगममें स्नान करे, फिर भगवान् विष्णुहरिका दर्शन करके ब्रह्मकुण्डमें स्नान करे। तत्पश्चात् चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् चक्रहरिका दर्शन करे। उसके बाद धर्महरिका दर्शन करके वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रत्येक एकादशीको यह यात्रा शुभकारक होती है।
बुद्धिमान् पुरुष प्रातःकाल उठकर स्वर्गद्वारके जलमें गोता लगावे। फिर नित्य कर्म करके अयोध्यापुरीका दर्शन करे। तत्पश्चात् पुनः सरयूका दर्शन करके वीर मत्तगजेन्द्र, वन्दीदेवी, शीतलादेवी और वटुकभैरवका दर्शन करे। उनके आगे सरोवरमें स्नानकर महाविद्याका दर्शन करे। तत्पश्चात् पिण्डारकका दर्शन करे। अष्टमी और चतुर्दशीको यह यात्रा फलवती होती है। अंगारक चतुर्थीको पूर्वोक्त देवताओंके साथ-साथ समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये विघ्नेशका भी दर्शन करे।
पूर्ववत् प्रातःकाल उठकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मकुण्डके जलमें स्नान करे। फिर विष्णु और विष्णुहरिका दर्शन करके मनुष्यके मन, वाणी और शरीरकी शुद्धि होती है। उसके बाद मन्त्रेश्वर और महाविद्याका दर्शन करे। तत्पश्चात् सब कामनाओंकी सिद्धिके लिये अयोध्याका दर्शन करके जितेन्द्रिय पुरुष स्वर्गद्वारमें वस्त्रसहित स्नान करे। उससे मनुष्यके अनेक जन्मोंके उपार्जित नाना प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये वस्त्रसहित स्नान अवश्य करे। यह यात्रा सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी है। जो प्रतिदिन इस प्रकार शुभ फल देनेवाली यात्रा करता है, उसकी सौ कोटि कल्पोंमें भी पुनरावृत्ति नहीं होती। अयोध्यापुरी सर्वोत्तम स्थान है। यह भगवान् विष्णुके चक्रपर प्रतिष्ठित है।
सूतजी कहते हैं— जो मनुष्य पवित्रचित्त होकर अयोध्याके इस अनुपम माहात्म्यका पाठ करता है अथवा जो श्रद्धासे इसको सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। अतः मनुष्योंको सदा यत्नपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये। ब्राह्मणों तथा भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणके लिये सुवर्ण आदि देना चाहिये। पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस माहात्म्यको सुनकर पुत्र पाता है और धर्मार्थीको धर्मकी प्राप्ति होती है। जो श्रेष्ठ मनुष्य अति विस्तृत विधानके साथ वर्णित इस धर्मयुक्त आदिक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह लक्ष्मीसे सनाथ होकर संसारमें सब उत्तम भोगोंको भोगनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके लोकमें निवास करता है।
श्रीअयोध्या-माहात्म्य सम्पूर्ण।
~~ ० ~~
वैष्णवखण्ड समाप्त
~~ ० ~~