भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 564

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५३५

तैयार किया, जो दस योजन चौड़ा और सौ योजन लंबा था। इस प्रकार सीतावल्लभ श्रीरामने विश्वकर्मापुत्र वानरराज नलके द्वारा इस सेतुका निर्माण कराया। उस सेतुपर पहुँचकर सम्पूर्ण पातकी मनुष्य सब प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। श्रीरामचन्द्रजीने लंकामें जानेकी इच्छासे वानरोंद्वारा उस पवित्र पापनाशक सेतुका जहाँ प्रारम्भ कराया, वह स्थान आगे चलकर लोगोंमें दर्भशयनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार समुद्रमें सेतुबन्धनकी कथा कही गयी। वहाँ अनेक पवित्र तीर्थ हैं, जिनमें चौबीस तीर्थ प्रधान हैं। वे सब सेतुपर ही स्थित हैं। पहला चक्रतीर्थ है, दूसरा वेतालवरदतीर्थ और तीसरा पापविनाशनतीर्थ है, जो सब लोकोंमें विख्यात है। उसके बाद सीतासरोवर नामक पुण्यतीर्थ है। तत्पश्चात् मंगलतीर्थ है। मंगलतीर्थके अनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाली अमृतवापिका है। फिर ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड, अगस्त्यतीर्थ, रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ, जयतीर्थ, लक्ष्मीतीर्थ, अग्नीतीर्थ, चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ, यामुनतीर्थ, गंगातीर्थ, गयातीर्थ, कोटितीर्थ, साध्यामृततीर्थ, मानसतीर्थ तथा धनुष्कोटितीर्थ है। विप्रवरो! ये सेतुके मध्यमें स्थित प्रधान-प्रधान तीर्थ बताये गये हैं, जो सब पापोंका अपहरण करनेवाले हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको पढ़ता और सुनता है, वह अनन्त विजय प्राप्त करता है तथा परलोकमें भी उसे पुनर्जन्मका क्लेश नहीं उठाना पड़ता।

o

चक्रतीर्थका माहात्म्य—गालवमुनि तथा धर्मकी तपस्याका वर्णन

ऋषि बोले—आपने पापनाशक सेतुपर स्थित जिन चौबीस तीर्थोंके नाम बताये हैं, उनमें सबसे पहले तीर्थका नाम चक्रतीर्थ कैसे हुआ?

श्रीसूतजीने कहा—विप्रवरो! चौबीस प्रधान तीर्थोंमें जो आदितीर्थ बताया गया है, वह सब लोकोंमें विख्यात है। उसकी चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई, यह बात बता रहा हूँ, सुनो। जो स्थान सेतुका मूल कहा गया है, वही दर्भशयनतीर्थ है। वहींपर महापातकोंका नाश करनेवाला चक्रतीर्थ है। पूर्वकालमें वहाँपर गालव नामसे प्रसिद्ध एक वैष्णव महात्मा रहते थे। वे दक्षिण समुद्रके तटपर हालास्यसे थोड़ी दूरपर फुल्लग्रामके समीप क्षीरसरोवरके निकट धर्मपुष्करिणीके किनारे बड़ी भारी तपस्या करते थे। उनका स्वभाव दयालु था, वे सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे और उन्होंने आहारका सर्वथा त्याग कर दिया था। वे सब प्राणियोंको अपने ही समान देखते हुए विषयकी स्पृहासे रहित, सब प्राणियोंके हितैषी, मनको वशमें रखनेवाले तथा सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे दूर थे। कुछ वर्षोंतक तो वे सूखे पत्ते चबाकर रहे, फिर कुछ समयतक उन्होंने केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् कुछ वर्षोंतक वे वायु पीकर रहे। इस प्रकार उन महामुनिने बड़ी कठोर तपस्या की। कितने ही वर्षोंतक वे बिना खाये, बिना किसीकी ओर