संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
देखे, बिना श्वास लिये और बिना आश्रयके रहे। वर्षा-ऋतुमें आकाशसे गिरती हुई पानीकी धाराका कष्ट सहन करते, सर्दीकी रातमें जलके भीतर खड़े रहते और गरमीके समय पंचाग्नि सेवन करते हुए भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर रहते थे। मुखसे अष्टाक्षर मन्त्रका* जप और हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वे महातेजस्वी गालव मुनि तपस्यामें संलग्न रहे। इस प्रकार कितने ही वर्ष बीतनेपर भगवान् लक्ष्मीपतिने उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान्ने अपने हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि धारण कर रखे थे, उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुशोभित थे, उनका तेज कोटि सूर्योंके समान था, वे गरुड़की पीठपर आरूढ़ थे, उनके सिरपर छत्र और पार्श्वभागमें डुलाये जाते हुए चवँरकी शोभा हो रही थी। वे हार, भुजबन्द, मुकुट और कड़े आदि आभूषणोंसे विभूषित थे, विष्वक्सेन तथा सुनन्द आदि पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े थे। भगवान् अपनी मन्द मुसकानसे त्रिभुवनके मनको मोहित किये लेते थे तथा अपनी दिव्य कान्तिसे समस्त पदार्थों एवं दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। कण्ठमें धारण की हुई कौस्तुभमणिसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।
उस समय उन पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुको देखकर महामुनि गालव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़ी भक्तिसे भगवान् जगदीश्वरका स्तवन किया—'शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नित्य शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है। भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हव्य-कव्यस्वरूप आप यज्ञपुरुषको नमस्कार है। जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले आप ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप त्रिमूर्तिको नमस्कार है। आप परमेश्वरको नमस्कार है। सर्वव्यापी प्रभुको नमस्कार है। जगत्की रचना करनेवाले आप लक्ष्मीपतिको नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रोंवाले आप भगवान्को नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो नाम और जाति आदि भेदोंसे रहित तथा समस्त दोषोंसे वर्जित हैं, समस्त संसारका भय दूर करनेवाले उन दैत्यविनाशक विष्णुको नमस्कार है। जो वेदान्तवेद्य परमेश्वर हैं, वैकुण्ठधाममें जिनका निवास है, जो ब्रह्माजीके पिता हैं, भक्तजनोंके दुःखोंका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन अमित पराक्रमी भगवान् नारायणको नमस्कार है। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले आप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले आप भगवान् नारायणको बार-बार नमस्कार है।'
इस प्रकार महात्मा गालवकी की हुई स्तुति सुनकर भगवान्ने प्रसन्न हो उन्हें चारों हाथोंसे खींचकर छातीसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक कहा—'गालव! मैं तुम्हारी तपस्या और इस स्तुतिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ तथा वर देनेके लिये आया हूँ।' गालवने कहा—'नारायण! रमानाथ! पीताम्बर! जगन्मय! जनार्दन! जगद्धाम! गोविन्द! नरकान्तक! मैं आपके दर्शनमात्रसे सर्वाधिक कृतार्थ हो गया। इससे अधिक दूसरा वर क्या हो सकता है। जिन्हें योगी नहीं देख पाते, कर्मठ लोग भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, उन्हीं परमात्माका आज मैं साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। इससे अधिक दूसरा वर क्या हो सकता है। जगत्पते! जनार्दन! मैं इतनेसे ही कृतार्थ हो गया। जिनके नामोंका स्मरण करनेमात्रसे महापातकी भी मुक्तिको प्राप्त होते हैं, उन्हीं भगवान् विष्णुको मैं यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। प्रभो! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो।'
भगवान् विष्णुने कहा—गालव! मुझमें तुम्हारी दृढ़ एवं निष्काम भक्ति हो। प्रारब्धके फलस्वरूप
* 'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र है।