भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 566
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५३७ ---|---

इस शरीरका अन्त होनेपर तुम्हें मेरे स्वरूपकी प्राप्ति होगी। मुनिश्रेष्ठ! तुम इसी पवित्र आश्रमपर निवास करो। यह धर्मपुष्करिणी पुण्यमयी एवं पापनाशिनी है। इसके किनारे तप करनेवाला मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होता है। पूर्वकालमें धर्मराजने यहाँ आकर दक्षिण समुद्रके तटपर महादेवजीका चिन्तन करते हुए तपस्या की थी। इसीसे यह धर्मपुष्करणीके नामसे प्रसिद्ध है। धर्मराजकी तपस्यासे प्रसन्न हो शूलपाणि भगवान् महेश्वर अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए प्रकट हुए। तब धर्मने उनकी इस प्रकार स्तुति की—‘मैं जगत्के स्वामी ॐकारस्वरूप ईश्वरको नमस्कार करता हूँ। समस्त देवता जिनके स्वरूप हैं, जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, जिनके नेत्र भयंकर हैं, उन विश्वरूप ऊर्ध्वरेता भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण जगत्के आधार, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी हैं, योगीश्वर जिनको सदा प्रणाम करते हैं, उन पुष्टिवर्द्धक भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन भगवान् महादेवको नमस्कार है। जिनके कण्ठमें नील चिह्न है, जो समस्त पशुओं (जीवों) के पालन करनेवाले पति हैं, उन भगवान् महेश्वरको बार-बार नमस्कार है। समस्त पापोंका नाश करनेवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है। समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाले महेश्वरको नमस्कार है। रुद्रदेवको नमस्कार है। सर्पोंको प्रश्रय देनेवाले शिवको नमस्कार है। उत्कृष्ट चित्तवाले प्रचेता (वरुण) रूप शम्भुको नमस्कार है। हाथोंमें पिनाक और त्रिशूल धारण करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। चैतन्यरूप शिवको नमस्कार है। पुष्टिपालक महेश्वरको नमस्कार है। समस्त क्षेत्रों (शरीरों) के स्वामी भगवान् पंचानन शिवको नमस्कार है।’

इस प्रकार स्तुति करनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने कहा—महामते धर्म! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे वर माँगो।

धर्मने कहा—पार्वतीपते! मैं सदा आपका वाहन होऊँ।

शिवजीने कहा—धर्म! तुम सदैव मनुष्योंसे पूजित हो, तुम मेरे वाहन बनो। तुम्हारा सेवन करनेवाले मनुष्योंकी मुझमें सदैव भक्ती बनी रहेगी और तुमने दक्षिण समुद्रके तटपर जो तीर्थ बनाया है, वह धर्मपुष्करिणीके नामसे प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार उस धर्मतीर्थके लिये वर देकर भगवान् शंकर वृषभरूपधारी धर्मपर आरूढ़ हो कैलास पर्वतपर चले गये। महर्षि गालव! तुम भी इस धर्मपुष्करिणीके किनारे तपस्या करते हुए तबतक निवास करो, जबतक कि तुम्हारे शरीरका अन्त न हो जाय।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तब मुनिश्रेष्ठ गालव धर्मपुष्करिणीके तटपर भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो निवास करने लगे। किसी समय माघ मासमें शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास करके उन्होंने रात्रिमें जागरण किया और दूसरे दिन द्वादशीको धर्मपुष्करिणीके जलमें स्नान करके सन्ध्या-वन्दनपूर्वक नित्य कर्मोंका अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी पूजा सम्पन्न करके उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया—

गालव बोले—सहस्रों मस्तक धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, श्रीकृष्ण तथा कल्किरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जो प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले और समस्त प्राणियोंके आधार हैं, उन आधारशून्य वासुदेव भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्वज्ञ, सबके कर्ता, सच्चिदानन्द-स्वरूप, तर्कके अविषय एवं नामनिर्देशसे रहित हैं, उन भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ।

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