भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 570

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४१


प्रवेश किया और सब अंगोंसे सुशोभित एवं पवित्र रूपसे वे उस अग्निसे बाहर निकलीं, तब लोकरक्षाके लिये उन्होंने अपने नामसे एक उत्तम तीर्थ निर्माण किया तथा स्वयं भी उसमें स्नान किया। इसलिये उस तीर्थका नाम सीतासरोवर हुआ। उसमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है। विप्रवरो! उस तीर्थमें अवगाहन करके अनेक प्रकारके दान देकर एवं बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके मनुष्य परमेश्वरके परम धामको जाता है।

महापवित्र सीताकुण्डमें स्नान करके मनुष्य एकाग्रचित्त हो मंगलतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ भगवान् विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मीजी सदा निवास करती हैं। पूर्वकालमें मनोजव नामसे प्रसिद्ध एक चन्द्रवंशी राजा हो गये हैं। उन्होंने प्रतिवर्ष यज्ञोंद्वारा देवताओंको, अन्नराशिसे ब्राह्मणोंको तथा श्राद्धसे पितरोंको तृप्त किया। वे निरन्तर वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे। इस प्रकार राजा मनोजव धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते थे। उनके शासनकालमें उस राज्यमें एक भी शत्रु नहीं रह गया था, इससे राजाके मनमें अहंकार उत्पन्न हो गया। जहाँ अहंकार होता है, वहाँ लोभ, मद, काम, क्रोध, हिंसा तथा मोहमें डालनेवाली असूया—ये सभी प्रकट हो जाते हैं। और जिस पुरुषमें ये उत्पन्न होते हैं, वह पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्तियोंके साथ प्राणोंसे भी हाथ धो बैठता है। उस राजाके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं ब्राह्मणोंके गाँवोंमें कर लगाऊँगा। मनसे ऐसा निश्चय करके उसने वही किया। शिव और विष्णु आदि देवताओंके भी धन उसने ले लिये। अहंकारने उसकी विवेक-बुद्धिको नष्ट कर दिया था। इसलिये उसने ब्राह्मणोंके खेत छीन लिये थे। इस दुष्कर्मका परिणाम यह हुआ कि एक बलवान् शत्रुने आकर उसके नगरको घेर लिया। रणदेशके राजा गोलभ ही उसके शत्रु बन बैठे। गोलभने चतुरंगिणी सेनाके साथ आक्रमण किया। दुरात्मा मनोजवका गोलभके साथ छः महीनेतक युद्ध चलता रहा। अन्तमें गोलभकी जीत हुई। मनोजव पराजित होकर राज्यसे वंचित हो गया। उसने अपनी स्त्री और पुत्रके साथ वनका आश्रय लिया। गोलभ उस राज्यका पालन करते हुए दीर्घकालतक मनोजवपुरमें टिके रहे। इधर एक दिन मनोजवका बालक पुत्र क्षुधासे पीड़ित हो माता-पितासे खानेके लिये अन्न माँगने लगा—'पिताजी! मुझे खानेको दो। मा! मुझे भोजन दो, बहुत भूख लगी है।' पुत्रका यह करुणाजनक वचन सुनकर माता-पिता शोकसे पीड़ित हो सहसा मूर्च्छित हो गये। कुछ चेत होनेपर राजाने अपनी स्त्रीसे कहा—'सुमित्रे! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरी क्या गति होगी? मेरा यह पुत्र भूखसे पीड़ित होकर थोड़ी ही देरमें मर जायगा। हाय! मैंने ब्राह्मणोंके खेत छीन लिये, विष्णु और शिव आदि देवताओंके धनका हरण कर लिया। इस प्रकार दुष्कर्मकी अधिकताके कारण ही गोलभने मुझे परास्त किया है। मेरे पास अन्नका एक दाना भी नहीं है। मैं निर्धन हूँ, दुःखी हूँ और स्वयं भी भूखा-प्यासा हूँ। इस समय इस भूखे बालकको कैसे अन्न दूँगा?'

इस प्रकार विलाप करता हुआ राजा मनोजव अत्यन्त खिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। सुमित्रा पतिको इस प्रकार गिरा हुआ देख उसे हृदयसे लगाकर विलाप करने लगी। उसी समय मुनिवर पराशरजी स्वेच्छासे घूमते हुए वहाँ आ गये। उन्हें देखकर पतिव्रता सुमित्राने पुत्रसहित उठकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। पराशरजीने सुमित्राको आश्वासन देते हुए पूछा—'सुन्दरी! तुम कौन हो? यह कौन तुम्हारे आगे पड़ा हुआ है और यह बालक कौन है?'

पतिव्रता सुमित्रा बोलीं—मुनिश्रेष्ठ! ये मेरे