संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करके लाने लगे। नलने उन सबको लेकर महासागरमें सेतु निर्माण किया। उन्होंने पाँच ही दिनमें लंकाके समीपतक पुल बाँध दिया। उसकी लंबाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी। इस प्रकार नलके द्वारा वह पापनाशक पुण्यमय सेतु तैयार किया गया। देवीपुरके निकट जो नौ पत्थर गड़े हैं, वे ही सेतुके मूल हैं। मनुष्य वहाँ अपने पापकी शुद्धिके लिये स्नान करे। फिर चक्रतीर्थमें स्नान करके सेतुके स्वामी श्रीहरिका पूजन करे। देवीपत्तनसे लेकर जो सेतु बाँधा गया है, उसके कारण वह यथार्थरूपसे सेतुमूल कहलाता है। सेतुका पश्चिम किनारा दर्भशयनतीर्थ कहा गया है और पूर्व किनारा देवीपत्तन। ये दोनों ही सेतुके मूल हैं। दोनोंको ही परम पवित्र, पुण्यजनक एवं पापनाशक कहा गया है। जो मनुष्य जिस मार्गसे जिस (पूर्व या पश्चिम) सेतुमूलको जायँ, वे उसी मार्गसे उस मोक्षदायक सेतुमूलमें स्नान करके फिर चक्रतीर्थमें स्नान करें। तत्पश्चात् संकल्पपूर्वक सेतुबन्धतीर्थको जायँ। प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका हृदयमें ध्यान करते हुए सबसे पहले सेतुको नमस्कार करें। सेतुवन्दनका मन्त्र इस प्रकार है—
रघुवीरपदन्यासपवित्रीकृतपांसवे ।
दशकण्ठशिरश्छेदहेतवे सेतवे नमः ॥
केतवे रामचन्द्रस्य मोक्षमार्गैकहेतवे।
सीताया मानसाम्भोजभानवे सेतवे नमः ॥
'श्रीरघुवीरके चरण रखनेसे जिसकी धूलि परम पवित्र हो गयी है, जो दशग्रीव रावणके शिरश्छेदका एकमात्र हेतु है, उस सेतुको नमस्कार है। जो मोक्षमार्गका प्रधान हेतु तथा श्रीरामचन्द्रजीके सुयशको फहरानेवाला केतु (ध्वज) है और सीताजीके हृदयकमलको विकसित करनेके लिये सूर्यदेवके समान है, उस सेतुको नमस्कार है।'
इस मन्त्रसे सेतुको साष्टांग प्रणाम करके परम शक्तिशाली वेतालवरद नामक तीर्थको जायँ। जो मनुष्य चक्रतीर्थके दक्षिण भागमें स्थित इस वेतालवरद नामक तीर्थमें कभी स्नान करते हैं, वे जीवन्मुक्त होते हैं। यहाँ संकल्पपूर्वक स्नान करके पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वेतालवरदमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य धीरे-धीरे गन्धमादन पर्वतको जाय। वह पर्वत समुद्रमें सेतुके रूपमें विद्यमान है। उस सेतुरूप गन्धमादनपर्वतकी इस प्रकार प्रार्थना करे— 'परमपुण्यमय गन्धमादनपर्वत ! तुम्हें सब देवता नमस्कार करते हैं। विष्णु आदि देवता भी तुम्हारा सेवन करते हैं। नगश्रेष्ठ ! उसी तुम्हारे शिखरपर मैं पैरोंसे चलूँगा, मेरे चरणोंसे तुम्हारे ऊपर आघात होगा। मुझ पापात्माके अपराधको कृपापूर्वक क्षमा करो और तुम्हारे शिखरपर निवास करनेवाले भगवान् शंकरका मुझे दर्शन कराओ।' इस प्रकार प्रार्थना करके उस श्रेष्ठ पर्वतपर धीरे-धीरे पैर रखते हुए चले। वहाँ समुद्रमें स्नान करके गन्धमादन पर्वतपर मनुष्य यदि सरसोंभर भी पिण्डदान करे, तो उससे प्रलयकालतक पितर तृप्त रहते हैं। तत्पश्चात् वहाँ सब तीर्थोंमें उत्तम, जो पापविनाशन नामक महातीर्थ है, उसका दर्शन करनेके लिये जाय। वहाँ पहुँचकर शरीरके मलोंका नाश करनेवाले उस तीर्थमें स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वैकुण्ठधाममें जाता है।
सीतासरोवर और मंगलतीर्थका माहात्म्य, राजा मनोजवकी कथा
श्रीसूतजी कहते हैं— सब पापोंका नाश करनेवाले पापनाशनतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य यम-नियमका पालन करते हुए सीतासरोवरमें स्नान करनेके लिये जाय। श्रीरामचन्द्रजीको अपने सतीत्वका विश्वास दिलानेके लिये जब जनकनन्दिनी सीताने सम्पूर्ण देवताओंके समीप प्रज्वलित अग्निमें