भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 568
  • ब्रह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५३९ ---|---

इस प्रकार स्तुति करते हुए महायोगी गालव मुनि धर्मपुष्करिणीके तटपर ध्यानमग्न होकर बैठे। इसी समय कोई भयंकर राक्षस क्षुधासे पीड़ित हो गालव मुनिको खा जानेके लिये वहाँ आया। उसने गालव मुनिको बड़े वेगसे पकड़ लिया। तब गालवजीने शरणागतरक्षक, दयासागर, चक्रपाणि भगवान् नारायणको बार-बार पुकारते हुए कहा—'प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। परेश! परमानन्द! शरणागतपालक! करुणासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। लक्ष्मीकान्त! हरे! विष्णो! वैकुण्ठ! गरुड़ध्वज! मेरी रक्षा कीजिये। दामोदर! जगन्नाथ! हिरण्यकशिपुमर्दन! प्रह्लादकी भाँति मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए अपने भक्त गालव मुनिके भयको जानकर चक्रपाणि भगवान् विष्णुने भक्तकी रक्षाके लिये अपने चक्रको प्रेरित किया। भगवान्‌का भेजा हुआ वह चक्र धर्मपुष्करिणीके तटपर बड़े वेगसे आया। सुदर्शनचक्रको आया देख राक्षस वहाँसे भागा। किंतु ज्वालामालाओंसे मण्डित उस चक्रने भागते हुए राक्षसका मस्तक सहसा धड़से अलग कर दिया!

तब गालवजीने सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की—सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाका व्रत लेनेवाले चक्र! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् नारायणके करकमलोंको विभूषित करनेवाले तुम सुदर्शनको नमस्कार है। महान् गर्जना करनेवाले सुदर्शन! तुम युद्धमें असुरोंका संहार करनेमें प्रवीण हो, भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले तुम्हें नमस्कार है। मैं भयसे उद्विग्न हूँ, तुम समस्त कल्मषोंसे मेरी रक्षा करो। स्वामिन्! प्रभो! सुदर्शन! तुम सदा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जगत्‌के हितके लिये इस तीर्थमें निवास करो।

महर्षि गालवके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुके उस चक्रने अपने सौहार्दसे उन्हे प्रसन्न करते हुए-से कहा—गालवजी! यह महापुण्यमय, परम उत्तम धर्मतीर्थ है। मैं इसमें सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये सदैव निवास करूँगा। तुम सदा भगवान् विष्णुके भक्त बने रहोगे। मेरे निवाससे यह धर्मपुष्करिणी अब चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इस मुक्तिदायक चक्रतीर्थमें निवास करेंगे, उनके कुलमें पैदा हुए सभी पुरुष पापरहित होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जायँगे। गालव! जो लोग यहाँ पितरोंके लिये पिण्ड देते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और उनके पितर भी यहाँ तृप्त होते हैं।

यों कहकर भगवान् विष्णुका वह चक्र गालव मुनिके देखते-देखते सहसा उस पापनाशिनी धर्मपुष्करिणीमें समा गया। तबसे धर्मतीर्थकी चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्धि हुई। यह प्रसंग मैंने तुम सब लोगोंको सुनाया। जो मनुष्य धर्मतीर्थ, उग्र समाधियोगमें स्थित गालव मुनि तथा सुदर्शनचक्रका एक बार स्मरण करता है, वह कभी पापका भागी नहीं होता।


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सेतुबन्धन आरम्भ करनेकी बात तथा सेतुयात्राका क्रम एवं विधान

श्रीसूतजी कहते हैं— मुनीश्वरो! जहाँ जानकी-वल्लभ रघुकुलशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने नौ पत्थरोंकी स्थापना करके पहले-पहल समुद्रमें सेतु बाँधा था, वहींपर देवीपत्तन् नामक नगर है। उसीके एक किनारेपर चक्रतीर्थ है।

भगवान् श्रीरामने शुभ मुहूर्तमें अच्छे दिनको देवीपत्तन्‌से कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने प्रारम्भमें गणेशजीकी पूजा करके महादेवजीकी आज्ञा ले अपने हाथसे प्रसन्नतापूर्वक नौ प्रस्तरोंकी स्थापना की। इस प्रकार उनके द्वारा सेतुबन्धनका कार्य प्रारम्भ होनेपर वानरलोग पर्वत, शाखायुक्त वृक्ष, शिलाखण्ड, काष्ठसमूह और तृणराशि एकत्र