भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • ब्रह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५३९ ---|---

इस प्रकार स्तुति करते हुए महायोगी गालव मुनि धर्मपुष्करिणीके तटपर ध्यानमग्न होकर बैठे। इसी समय कोई भयंकर राक्षस क्षुधासे पीड़ित हो गालव मुनिको खा जानेके लिये वहाँ आया। उसने गालव मुनिको बड़े वेगसे पकड़ लिया। तब गालवजीने शरणागतरक्षक, दयासागर, चक्रपाणि भगवान् नारायणको बार-बार पुकारते हुए कहा—'प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। परेश! परमानन्द! शरणागतपालक! करुणासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। लक्ष्मीकान्त! हरे! विष्णो! वैकुण्ठ! गरुड़ध्वज! मेरी रक्षा कीजिये। दामोदर! जगन्नाथ! हिरण्यकशिपुमर्दन! प्रह्लादकी भाँति मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए अपने भक्त गालव मुनिके भयको जानकर चक्रपाणि भगवान् विष्णुने भक्तकी रक्षाके लिये अपने चक्रको प्रेरित किया। भगवान्‌का भेजा हुआ वह चक्र धर्मपुष्करिणीके तटपर बड़े वेगसे आया। सुदर्शनचक्रको आया देख राक्षस वहाँसे भागा। किंतु ज्वालामालाओंसे मण्डित उस चक्रने भागते हुए राक्षसका मस्तक सहसा धड़से अलग कर दिया!

तब गालवजीने सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की—सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाका व्रत लेनेवाले चक्र! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् नारायणके करकमलोंको विभूषित करनेवाले तुम सुदर्शनको नमस्कार है। महान् गर्जना करनेवाले सुदर्शन! तुम युद्धमें असुरोंका संहार करनेमें प्रवीण हो, भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले तुम्हें नमस्कार है। मैं भयसे उद्विग्न हूँ, तुम समस्त कल्मषोंसे मेरी रक्षा करो। स्वामिन्! प्रभो! सुदर्शन! तुम सदा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जगत्‌के हितके लिये इस तीर्थमें निवास करो।

महर्षि गालवके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुके उस चक्रने अपने सौहार्दसे उन्हे प्रसन्न करते हुए-से कहा—गालवजी! यह महापुण्यमय, परम उत्तम धर्मतीर्थ है। मैं इसमें सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये सदैव निवास करूँगा। तुम सदा भगवान् विष्णुके भक्त बने रहोगे। मेरे निवाससे यह धर्मपुष्करिणी अब चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इस मुक्तिदायक चक्रतीर्थमें निवास करेंगे, उनके कुलमें पैदा हुए सभी पुरुष पापरहित होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जायँगे। गालव! जो लोग यहाँ पितरोंके लिये पिण्ड देते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और उनके पितर भी यहाँ तृप्त होते हैं।

यों कहकर भगवान् विष्णुका वह चक्र गालव मुनिके देखते-देखते सहसा उस पापनाशिनी धर्मपुष्करिणीमें समा गया। तबसे धर्मतीर्थकी चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्धि हुई। यह प्रसंग मैंने तुम सब लोगोंको सुनाया। जो मनुष्य धर्मतीर्थ, उग्र समाधियोगमें स्थित गालव मुनि तथा सुदर्शनचक्रका एक बार स्मरण करता है, वह कभी पापका भागी नहीं होता।


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सेतुबन्धन आरम्भ करनेकी बात तथा सेतुयात्राका क्रम एवं विधान

श्रीसूतजी कहते हैं— मुनीश्वरो! जहाँ जानकी-वल्लभ रघुकुलशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने नौ पत्थरोंकी स्थापना करके पहले-पहल समुद्रमें सेतु बाँधा था, वहींपर देवीपत्तन् नामक नगर है। उसीके एक किनारेपर चक्रतीर्थ है।

भगवान् श्रीरामने शुभ मुहूर्तमें अच्छे दिनको देवीपत्तन्‌से कार्य प्रारम्भ किया। उन्होंने प्रारम्भमें गणेशजीकी पूजा करके महादेवजीकी आज्ञा ले अपने हाथसे प्रसन्नतापूर्वक नौ प्रस्तरोंकी स्थापना की। इस प्रकार उनके द्वारा सेतुबन्धनका कार्य प्रारम्भ होनेपर वानरलोग पर्वत, शाखायुक्त वृक्ष, शिलाखण्ड, काष्ठसमूह और तृणराशि एकत्र

५४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


करके लाने लगे। नलने उन सबको लेकर महासागरमें सेतु निर्माण किया। उन्होंने पाँच ही दिनमें लंकाके समीपतक पुल बाँध दिया। उसकी लंबाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी। इस प्रकार नलके द्वारा वह पापनाशक पुण्यमय सेतु तैयार किया गया। देवीपुरके निकट जो नौ पत्थर गड़े हैं, वे ही सेतुके मूल हैं। मनुष्य वहाँ अपने पापकी शुद्धिके लिये स्नान करे। फिर चक्रतीर्थमें स्नान करके सेतुके स्वामी श्रीहरिका पूजन करे। देवीपत्तनसे लेकर जो सेतु बाँधा गया है, उसके कारण वह यथार्थरूपसे सेतुमूल कहलाता है। सेतुका पश्चिम किनारा दर्भशयनतीर्थ कहा गया है और पूर्व किनारा देवीपत्तन। ये दोनों ही सेतुके मूल हैं। दोनोंको ही परम पवित्र, पुण्यजनक एवं पापनाशक कहा गया है। जो मनुष्य जिस मार्गसे जिस (पूर्व या पश्चिम) सेतुमूलको जायँ, वे उसी मार्गसे उस मोक्षदायक सेतुमूलमें स्नान करके फिर चक्रतीर्थमें स्नान करें। तत्पश्चात् संकल्पपूर्वक सेतुबन्धतीर्थको जायँ। प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका हृदयमें ध्यान करते हुए सबसे पहले सेतुको नमस्कार करें। सेतुवन्दनका मन्त्र इस प्रकार है—

रघुवीरपदन्यासपवित्रीकृतपांसवे ।
दशकण्ठशिरश्छेदहेतवे सेतवे नमः ॥
केतवे रामचन्द्रस्य मोक्षमार्गैकहेतवे।
सीताया मानसाम्भोजभानवे सेतवे नमः ॥

'श्रीरघुवीरके चरण रखनेसे जिसकी धूलि परम पवित्र हो गयी है, जो दशग्रीव रावणके शिरश्छेदका एकमात्र हेतु है, उस सेतुको नमस्कार है। जो मोक्षमार्गका प्रधान हेतु तथा श्रीरामचन्द्रजीके सुयशको फहरानेवाला केतु (ध्वज) है और सीताजीके हृदयकमलको विकसित करनेके लिये सूर्यदेवके समान है, उस सेतुको नमस्कार है।'

इस मन्त्रसे सेतुको साष्टांग प्रणाम करके परम शक्तिशाली वेतालवरद नामक तीर्थको जायँ। जो मनुष्य चक्रतीर्थके दक्षिण भागमें स्थित इस वेतालवरद नामक तीर्थमें कभी स्नान करते हैं, वे जीवन्मुक्त होते हैं। यहाँ संकल्पपूर्वक स्नान करके पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वेतालवरदमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य धीरे-धीरे गन्धमादन पर्वतको जाय। वह पर्वत समुद्रमें सेतुके रूपमें विद्यमान है। उस सेतुरूप गन्धमादनपर्वतकी इस प्रकार प्रार्थना करे— 'परमपुण्यमय गन्धमादनपर्वत ! तुम्हें सब देवता नमस्कार करते हैं। विष्णु आदि देवता भी तुम्हारा सेवन करते हैं। नगश्रेष्ठ ! उसी तुम्हारे शिखरपर मैं पैरोंसे चलूँगा, मेरे चरणोंसे तुम्हारे ऊपर आघात होगा। मुझ पापात्माके अपराधको कृपापूर्वक क्षमा करो और तुम्हारे शिखरपर निवास करनेवाले भगवान् शंकरका मुझे दर्शन कराओ।' इस प्रकार प्रार्थना करके उस श्रेष्ठ पर्वतपर धीरे-धीरे पैर रखते हुए चले। वहाँ समुद्रमें स्नान करके गन्धमादन पर्वतपर मनुष्य यदि सरसोंभर भी पिण्डदान करे, तो उससे प्रलयकालतक पितर तृप्त रहते हैं। तत्पश्चात् वहाँ सब तीर्थोंमें उत्तम, जो पापविनाशन नामक महातीर्थ है, उसका दर्शन करनेके लिये जाय। वहाँ पहुँचकर शरीरके मलोंका नाश करनेवाले उस तीर्थमें स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वैकुण्ठधाममें जाता है।


सीतासरोवर और मंगलतीर्थका माहात्म्य, राजा मनोजवकी कथा

श्रीसूतजी कहते हैं— सब पापोंका नाश करनेवाले पापनाशनतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य यम-नियमका पालन करते हुए सीतासरोवरमें स्नान करनेके लिये जाय। श्रीरामचन्द्रजीको अपने सतीत्वका विश्वास दिलानेके लिये जब जनकनन्दिनी सीताने सम्पूर्ण देवताओंके समीप प्रज्वलित अग्निमें

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४१


प्रवेश किया और सब अंगोंसे सुशोभित एवं पवित्र रूपसे वे उस अग्निसे बाहर निकलीं, तब लोकरक्षाके लिये उन्होंने अपने नामसे एक उत्तम तीर्थ निर्माण किया तथा स्वयं भी उसमें स्नान किया। इसलिये उस तीर्थका नाम सीतासरोवर हुआ। उसमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है। विप्रवरो! उस तीर्थमें अवगाहन करके अनेक प्रकारके दान देकर एवं बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके मनुष्य परमेश्वरके परम धामको जाता है।

महापवित्र सीताकुण्डमें स्नान करके मनुष्य एकाग्रचित्त हो मंगलतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ भगवान् विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मीजी सदा निवास करती हैं। पूर्वकालमें मनोजव नामसे प्रसिद्ध एक चन्द्रवंशी राजा हो गये हैं। उन्होंने प्रतिवर्ष यज्ञोंद्वारा देवताओंको, अन्नराशिसे ब्राह्मणोंको तथा श्राद्धसे पितरोंको तृप्त किया। वे निरन्तर वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे। इस प्रकार राजा मनोजव धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते थे। उनके शासनकालमें उस राज्यमें एक भी शत्रु नहीं रह गया था, इससे राजाके मनमें अहंकार उत्पन्न हो गया। जहाँ अहंकार होता है, वहाँ लोभ, मद, काम, क्रोध, हिंसा तथा मोहमें डालनेवाली असूया—ये सभी प्रकट हो जाते हैं। और जिस पुरुषमें ये उत्पन्न होते हैं, वह पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्तियोंके साथ प्राणोंसे भी हाथ धो बैठता है। उस राजाके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं ब्राह्मणोंके गाँवोंमें कर लगाऊँगा। मनसे ऐसा निश्चय करके उसने वही किया। शिव और विष्णु आदि देवताओंके भी धन उसने ले लिये। अहंकारने उसकी विवेक-बुद्धिको नष्ट कर दिया था। इसलिये उसने ब्राह्मणोंके खेत छीन लिये थे। इस दुष्कर्मका परिणाम यह हुआ कि एक बलवान् शत्रुने आकर उसके नगरको घेर लिया। रणदेशके राजा गोलभ ही उसके शत्रु बन बैठे। गोलभने चतुरंगिणी सेनाके साथ आक्रमण किया। दुरात्मा मनोजवका गोलभके साथ छः महीनेतक युद्ध चलता रहा। अन्तमें गोलभकी जीत हुई। मनोजव पराजित होकर राज्यसे वंचित हो गया। उसने अपनी स्त्री और पुत्रके साथ वनका आश्रय लिया। गोलभ उस राज्यका पालन करते हुए दीर्घकालतक मनोजवपुरमें टिके रहे। इधर एक दिन मनोजवका बालक पुत्र क्षुधासे पीड़ित हो माता-पितासे खानेके लिये अन्न माँगने लगा—'पिताजी! मुझे खानेको दो। मा! मुझे भोजन दो, बहुत भूख लगी है।' पुत्रका यह करुणाजनक वचन सुनकर माता-पिता शोकसे पीड़ित हो सहसा मूर्च्छित हो गये। कुछ चेत होनेपर राजाने अपनी स्त्रीसे कहा—'सुमित्रे! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरी क्या गति होगी? मेरा यह पुत्र भूखसे पीड़ित होकर थोड़ी ही देरमें मर जायगा। हाय! मैंने ब्राह्मणोंके खेत छीन लिये, विष्णु और शिव आदि देवताओंके धनका हरण कर लिया। इस प्रकार दुष्कर्मकी अधिकताके कारण ही गोलभने मुझे परास्त किया है। मेरे पास अन्नका एक दाना भी नहीं है। मैं निर्धन हूँ, दुःखी हूँ और स्वयं भी भूखा-प्यासा हूँ। इस समय इस भूखे बालकको कैसे अन्न दूँगा?'

इस प्रकार विलाप करता हुआ राजा मनोजव अत्यन्त खिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। सुमित्रा पतिको इस प्रकार गिरा हुआ देख उसे हृदयसे लगाकर विलाप करने लगी। उसी समय मुनिवर पराशरजी स्वेच्छासे घूमते हुए वहाँ आ गये। उन्हें देखकर पतिव्रता सुमित्राने पुत्रसहित उठकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। पराशरजीने सुमित्राको आश्वासन देते हुए पूछा—'सुन्दरी! तुम कौन हो? यह कौन तुम्हारे आगे पड़ा हुआ है और यह बालक कौन है?'

पतिव्रता सुमित्रा बोलीं—मुनिश्रेष्ठ! ये मेरे

रानी सुमित्राके द्वारा अपने पति और पुत्रकी दशाका वर्णन

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४३

पति हैं। हम दोनोंसे उत्पन्न यह चन्द्रकान्त हमारा पुत्र है। मेरे पतिदेव चन्द्रवंशी राजा मनोजव हैं। ये विक्रमाढ्यके पुत्र हैं। मैं इनकी पतिव्रता पत्नी सुमित्रा हूँ। गोलभने राजा मनोजवको युद्धमें परास्त किया है। ये राज्यसे भ्रष्ट हो अवलम्बशून्य होकर पत्नी और पुत्रके साथ इस भयंकर वनमें चले आये हैं। यहाँ मेरे भूखे पुत्रने हम दोनोंसे भोजन माँगा है। राजा अन्नहीन होनेके कारण पुत्रको क्षुधासे व्याकुल देख शोकसे मूर्च्छित हो गिर पड़े हैं।

रानीकी यह बात सुनकर दयालु पराशर मुनिने कहा—सुमित्रे! तुमको किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये। अब तुमलोगोंका अमंगल शीघ्र ही नष्ट हो जायगा। यों कहकर मन्त्र-जप करते हुए भगवान् शंकरका ध्यान करके पराशरजीने अपने हाथसे राजाका स्पर्श किया। महामुनिके हाथका स्पर्श पाते ही राजा मनोजव मूर्च्छा त्यागकर सहसा उठ बैठे और पराशर मुनिको प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'मुने! आज आपके चरणकमलोंके सेवनसे मेरी मूर्च्छा शीघ्र ही दूर हो गयी और मेरे सब पातकोंका भी नाश हो गया। जो पुण्यात्मा नहीं है, उसको आपका दर्शन कदापि नहीं हो सकता। मुझे शत्रुओंने अपने नगरसे बाहर निकाल दिया है। आप अपनी कृपादृष्टिसे देखकर मेरी रक्षा कीजिये।'

पराशरजी बोले—राजन्! तुम्हें शत्रुपर विजय पानेके लिये मैं एक उपाय बतलाता हूँ। परम पुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका परम पुण्यमय सेतु है, वहाँ सब ऐश्वर्योंको देनेवाला मंगलतीर्थ विद्यमान है। उस सरोवरमें सब लोगोंका उपकार करनेके लिये रघुनाथजी लक्ष्मीस्वरूपा सीताजीके साथ सदैव स्थित रहते हैं। तुम पुत्र और स्त्रीसहित वहाँ जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करो। उस तीर्थके प्रभावसे तुम्हें शीघ्र ही सब प्रकारके मंगलोंकी प्राप्ति होगी और युद्धमें शत्रुओंको जीतकर पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।

ऐसा कहकर राजा, रानी और बालक इन तीनोंके साथ पराशर मुनि मंगलतीर्थमें स्नानके उद्देश्यसे रामसेतुपर गये। वहाँ विधिपूर्वक संकल्प लेकर मुनिश्रेष्ठ पराशरने स्वयं स्नान किया और राजा आदिसे भी विधिपूर्वक स्नान करवाया। राजा, रानी और राजकुमारने वहाँ तीन महीनेतक नियमपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् मुनिने राजाको रामजीके एकाक्षर मन्त्रका, जो सब अनर्थोंका नाश करनेवाला है, उपदेश दिया। राजाने चालीस दिनोंतक विधिपूर्वक उस एकाक्षर मन्त्रका जप किया। इस प्रकार मन्त्र जपते हुए राजाके आगे एक सुदृढ़ धनुष प्रकट हुआ। दो अक्षय तरकश, सोनेकी मूठवाली दो तलवारें, एक ढाल, एक गदा, एक उत्तम मुशल, एक भयंकर शब्द करनेवाला शंख, एक घोड़ोंसे जुता हुआ रथ, सारथि, पताका, अग्निके समान प्रकाशमान सुवर्णमय कवच, हार, केयूर, मुकुट और वलय आदि आभूषण, सहस्रों दिव्य वस्त्र और दिव्य माला—ये सब वस्तुएँ उस तीर्थसे प्रकट हुईं। यह सब देखकर राजाने मुनिसे निवेदन किया। तब मुनिने तीर्थका जल लेकर उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसके द्वारा राजाका अभिषेक किया।

तदनन्तर राजा मनोजव कमर कसकर युद्धके लिये तैयार हुए। उन्होंने कवच, खड्ग, धनुष और बाण धारण किया। हार, केयूर, मुकुट और कंकण आदिसे विभूषित हो दिव्य वस्त्र धारणकर उस घोड़े जुते हुए रथपर बैठे। महामुनि पराशरने राजाको अंग, रहस्य, प्रयोग और उपसंहारकी विधिके साथ ब्रह्मास्त्र आदिका उपदेश दिया। राजाने रथसे उतरकर मुनिको प्रणाम किया और आशीर्वाद ले उनकी आज्ञा पाकर तथा उनकी परिक्रमा करके वे पत्नी और पुत्रके साथ विजयके लिये उस रथपर आरूढ़ हुए। नगरमें पहुँचकर राजाने शंख बजाया। शंखनाद

५४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुनकर गोलभ सेनाके साथ युद्धके लिये तुरंत ही बाहर निकला और मनोजवके साथ तीन दिनोंतक युद्ध करता रहा। चौथे दिन मनोजवने युद्धमें ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके सेनासहित गोलभको नष्ट कर दिया। उसके बाद स्त्री और पुत्रसहित नगरमें आकर राजा समूची पृथ्वीका पालन करने लगा। तबसे उसने कभी अहंकार नहीं किया। असूया आदि दोषोंको त्याग दिया। अहिंसा, इन्द्रियसंयम और धर्ममें सदा तत्पर रहने लगा। इस प्रकार सहस्रों वर्षोंतक राजाने पृथ्वीका पालन किया। फिर विरक्त होकर अपने पुत्रको राज्य दे वह गन्धमादनपर्वतपर मंगलतीर्थपर चला गया। वहाँ हृदयमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गया। तदनन्तर थोड़े ही समयमें शरीर त्यागकर मनोजवने उस तीर्थके माहात्म्यसे शिवलोकको प्रस्थान किया। उसकी पत्नी सुमित्रा भी उसके शरीरका आलिंगन करके चितापर आरूढ़ हो गयी और पतिलोकको प्राप्त हुई।

इसलिये मंगलतीर्थ सर्वथा प्रयत्न करके सेवन करने योग्य है। यह तीर्थ अतिशय सुन्दर एवं कल्याणमय है। मनुष्योंको सदा भोग और मोक्ष देनेवाला है। पापराशिरूपी तिनकों और रूईके ढेरको जलानेके लिये अग्निके समान है। इसका मोक्षके लिये सब लोग सेवन करो।

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एकान्तरामनाथ, ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड और अगस्त्यतीर्थका माहात्म्य

श्रीसूतजी कहते हैं— मंगल नामक महातीर्थमें स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य 'एकान्तरामनाथ' नामक उत्तम क्षेत्रमें जाय। वहाँ समस्त लोगोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे जगदीश्वर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सीता, लक्ष्मण तथा हनुमान् आदि वानरोंके साथ सदा निवास करते हैं। वहाँ 'अमृतवापिका' नामक एक पुण्यदायिनी पुष्करिणी है, जिसमें गोता लगानेवाले मनुष्योंको जरा और मृत्युका भय नहीं होता। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस अमृतवापीमें स्नान करता है, वह भगवान् शंकरके प्रसादसे अमृतत्वको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस तीर्थमें सावधान होकर तीन वर्षोंतक स्नान करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं।

ऋषियोंने पूछा— सूतजी! उस क्षेत्रका नाम 'एकान्तरामनाथ' कैसे हुआ?

श्रीसूतजी बोले— पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव, विभीषण, लक्ष्मण और मन्त्रज्ञ हनुमान् इन सबके साथ वानरोंद्वारा बाँधे हुए सेतुपर समुद्रके बीचमें एकान्त प्रदेशमें मन-ही-मन सीताका चिन्तन करते हुए कुछ सलाह करने लगे। उस समय समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंके साथ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसकी भयंकर ध्वनि बढ़ती ही चली जाती थी। इसलिये वे परस्परकी बातचीतको सुन नहीं पाते थे। तब श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रको बलपूर्वक काबूमें करके राक्षसोंको मारनेके विषयमें एकान्तमें उन सबके साथ परामर्श किया। इसीलिये उस क्षेत्रका नाम 'एकान्तरामनाथ' हो गया। उस स्थानपर आज भी समुद्रका जल निश्चल एवं शान्त दिखायी देता है। जो मनुष्य वहाँ जाकर अमृतवापीमें नियमपूर्वक स्नान करेंगे और श्रीराम आदिकी सेवामें तत्पर होंगे, वे सब मुक्तिको प्राप्त होंगे।

अमृतवापीमें स्नान और एकान्तरामनाथका सेवन करके जितेन्द्रिय मनुष्य ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके लिये जाय। गन्धमादनपर्वतपर सेतुके मध्यभागमें वह महातीर्थ ब्रह्मकुण्ड विद्यमान है। ब्रह्मकुण्डका दर्शन सब पापराशिका नाश करनेवाला है। वह लाखों ब्रह्महत्याओंका निवारण करनेवाला है। ब्रह्मकुण्डसे उत्पन्न हुए भस्मसे जो त्रिपुण्ड्र लगाते हैं, मोक्ष उनके हाथमें ही स्थित है। जो मनुष्य इस तीर्थमें आकर स्नान करते हैं, वे

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४५

अवश्य ही महादेवजीका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं। जो एक बार ब्रह्मकुण्डमें स्नान कर लेता है, उसके लिये मोक्षधामके द्वारके कपाट खुल जाते हैं। यह उत्तम कुण्ड देवता, मनुष्य और मुनीश्वरोंसे वन्दित, सबके संसार-बन्धनका नाश करनेवाला, शुभकारक, सर्वपापहारक तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है।

महापुण्यमय ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर मनुष्य हनुमत्कुण्डपर जाय। पूर्वकालमें समस्त राक्षसोंका वध हो जानेपर जब युद्ध समाप्त हो गया और श्रीरामचन्द्रजी आदि लंकासे लौटकर गन्धमादन पर्वतपर आ गये, तब पवनपुत्र हनुमान्‌जीने सब लोकोंका उपकार करनेके लिये अपने नामसे एक उत्तम तीर्थका निर्माण किया, जो सब तीर्थोंसे उत्तम है। उसमें स्नान करके मनुष्य सनातन शिवलोकको प्राप्त होते हैं। पूर्वकालमें धर्मसख नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करते थे। वे शत्रुविजयी, परम धार्मिक, प्रजापालनपरायण तथा नीतिमान् थे। उनके सौ पतिव्रता स्त्रियाँ थीं। किंतु उनसे कोई वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र नहीं हुआ। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रवरो! मैंने बहुत सोच-विचारकर सौ स्त्रियोंसे विवाह किया, उन सबके साथ रहते हुए मेरी वृद्धावस्था आ गयी। अतः आप बतावें किस उपायसे मेरे बहुत-से पुत्र होंगे? मेरी सौ स्त्रियोंमेंसे प्रत्येकको एक-एक गुणवान् पुत्र हो जाय, वह यत्न सोचिये। छोटा-बड़ा अथवा दुष्कर ही कर्म क्यों न हो, यदि उससे यह कार्य सिद्ध होनेवाला हो, तो उसे मैं अवश्य करूँगा।'

राजाके इस प्रकार पूछनेपर सब ऋत्विज् और पुरोहित एकत्र हो उनसे अपना निश्चय किया हुआ विचार प्रकट करते हुए बोले—'राजन्! कोई परम पवित्र गन्धमादन पर्वत है, जो दक्षिण समुद्रके बीच सेतुके रूपमें विद्यमान है। वहाँ लोकविख्यात हनुमत्कुण्ड है, जो बड़े भारी दुःखोंका नाश करनेवाला और स्वर्ग एवं मोक्षरूपी फल देनेवाला है। वह नरकोंके क्लेशका निवारण तथा दरिद्रताको दूर करनेवाला है। पुत्रहीन मनुष्योंको पुत्र और स्त्रीहीन पुरुषोंको स्त्री देनेवाला है। वहाँ संयमपूर्वक स्नान करके तुम एकाग्रचित्त हो उस तीर्थके तटपर पुत्रेष्टि यज्ञ करो। उससे तुम्हारी सौ स्त्रियोंमें प्रत्येकको एक-एक पुत्र प्राप्त हो सकता है।' यह सुनकर राजा धर्मसख अपनी स्त्रियों, मन्त्रियों, सेवकों और पुरोहितजीको साथ ले यज्ञकी आवश्यक सामग्रीसहित दक्षिणसमुद्रके किनारे गन्धमादन पर्वतपर गये। वहाँ हनुमत्कुण्डमें जाकर उन्होंने सैनिकोंके साथ स्नान किया। इस प्रकार वे उसके किनारे एक मासतक ठहरकर प्रतिदिन स्नान करते रहे। तत्पश्चात् वसन्त आनेपर चैत्र मासमें पुरोहितसहित राजाने पुत्रेष्टि यज्ञ प्रारम्भ किया। पुरोहित और ऋत्विजोंने विधिपूर्वक सब कर्म सम्पन्न किये। सपत्नीक राजाका जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब पुरोहितने हवनसे बचे हुए हविष्यको लेकर राजाकी सब स्त्रियोंको भोजन कराया। उसके बाद राजा धर्मसखने अपनी सौ पत्नियोंके साथ यज्ञान्तस्नान किया और ऋत्विजोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। इस प्रकार यज्ञ पूरा करके मन्त्री, परिवार और पत्नियोंके साथ वे धर्मात्मा राजा प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको लौट आये। कुछ समयमें जब दसवाँ मास व्यतीत हो गया, तब उन सौ स्त्रियोंने सौ गुणवान् पुत्रोंको जन्म दिया। ब्राह्मणो! जब वे सब पुत्र बढ़कर युवा हुए, तब राजाने उन्हें राज्य बाँटकर दे दिया और स्वयं अपनी स्त्रियोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर हनुमत्कुण्डके किनारे जाकर तपस्या करने लगे। भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए तपस्यामें तत्पर हुए राजाको जब वहाँ बहुत समय व्यतीत हो गया, तब एक दिन वे मृत्युको प्राप्त हुए। उनकी पत्नियोंने

५४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भी उन्हींका अनुसरण किया। राजाके ज्येष्ठ पुत्र सुचन्द्रने पिता-माताका दाहसंस्कार करके श्रद्धापूर्वक श्राद्धपर्यन्त सब कर्म किये। राजा पत्नियोंसहित वैकुण्ठलोकमें गये। सुचन्द्र आदि सब महातेजस्वी राजकुमार आपसमें ईर्ष्या-द्वेषका त्याग करके अपने-अपने राज्यका उपभोग करने लगे। अतः समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये मनुष्य हनुमान्‌जीके कुण्डमें स्नान करे।

हनुमत्कुण्डमें स्नान करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर अगस्त्यतीर्थमें जाय। साक्षात् अगस्त्यजीने इस तीर्थका निर्माण किया है। एक समयकी बात है, अगस्त्यजी दक्षिणके देशोंमें भ्रमण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर गये। वहाँ गन्धमादनका माहात्म्य जानकर महर्षि अगस्त्यने अपने नामसे यह महापुण्यमय तीर्थ बनाया। वे आज भी अपनी धर्मपत्नी लोपामुद्राके साथ वहाँ निवास करते हैं। उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होता।


रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ और जटातीर्थकी महिमा

**श्रीसूतजी कहते हैं—**अगस्त्यतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् सब पापोंसे मुक्त होनेके लिये परम पवित्र रामकुण्डको जाय। रघुनाथजीका वह पवित्र सरोवर पुण्यदायक तथा पापोंका अपहरण करनेवाला है। रामकुण्डके किनारे किया हुआ थोड़ी दक्षिणावाला यज्ञ भी पूर्ण फल देनेवाला होता है। इसी प्रकार स्वाध्याय और जप भी थोड़ा भी हो, तो वहाँ पूर्ण फलद होता है। रामकुण्डके किनारे मुट्ठीभर अन्न भी यदि वेदज्ञ ब्राह्मणको दिया जाय, तो वह अनन्तगुना फल देनेवाला होता है। विप्रवरो! मुनिवर अगस्त्यके शिष्य एक मुनि थे, जो अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते थे। उनका नाम सुतीक्ष्ण था। वे भगवान् श्रीरामके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए रामकुण्डके तटपर अत्यन्त दुष्कर तपस्या करने लगे। प्रतिदिन श्रीरामचन्द्रजीके षडक्षर मन्त्र* रूप मन्त्रराजका पाँच हजार जप करते थे। आलस्य छोड़कर रघुनाथसरोवरके जलमें स्नान करते, भिक्षाके अन्नका नियमपूर्वक आहार करते तथा क्रोधको काबूमें और इन्द्रियोंको वशमें रखते थे। इस प्रकार उनका बहुत समय व्यतीत हो गया। एक दिन सुतीक्ष्णजी सीतासहित श्रीरामका हृदयमें ध्यान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।

**सुतीक्ष्ण बोले—**जानकीनाथ! आपको नमस्कार है। विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाका व्रत लेनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार है। कौसल्यानन्दन! आपको नमस्कार है। विश्वामित्रजीके परमप्रिय! आपको प्रणाम है। शिवधनुषको भंग करनेवाले रघुवीर! आपको नमस्कार है। दशरथनन्दन विष्णो! आप परशुरामजीको जीतनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। समुद्रके गर्वको हरनेवाले और उसमें सेतुनिर्माण करनेवाले आपको प्रणाम है।

इस प्रकार सुतीक्ष्णजी श्रीरामचन्द्रजीमें चित्त लगाकर प्रतिदिन उनकी स्तुति करते हुए समय बिताते थे। सदा श्रीरामके षडक्षर मन्त्रका जप, उनकी स्तुति और रामकुण्डमें स्नान आदि करते हुए उनकी श्रीरामचन्द्रजीमें अत्यन्त निर्मल एवं निश्चल भक्ति हो गयी। उन्हें आत्मसाक्षात्कार करानेवाला अद्वैत विज्ञान प्राप्त हुआ और बिना पढ़े हुए ही तीनों वेदोंका ज्ञान हो गया। बिना सुनी हुई बातको भी जान लेना, दूसरेके शरीरमें प्रवेश करना, आकाशमें विचरण करना, समस्त कलाओंमें निपुण हो जाना, जो शास्त्र कभी


* 'ॐ रामाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र है।

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४७

नहीं सुने गये, उनका भी बिना गुरुके ही ज्ञान हो जाना, सब लोकोंमें बेरोक-टोक आना-जाना, इन्द्रियातीत विषयोंका भी साक्षात्कार होना, देवताओंसे वार्तालाप होना, चींटी आदि जन्तुओंकी भी बातें समझ लेना तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकोंमें भी चला जाना आदि जो योगियोंको प्राप्त होनेवाली एवं अन्यान्य दुर्लभ सिद्धियाँ हैं, वे सभी श्रीरामतीर्थके सेवनसे सुतीक्ष्णजीको प्राप्त हो गयीं। उस तीर्थका ऐसा ही प्रभाव है। वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके द्वारा बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वह अपमृत्युनिवारक, भोग-मोक्षदायक तथा नरकसम्बन्धी क्लेशोंको दूर करनेवाला है। वह तीर्थ सदा श्रीरामचन्द्रजीकी भक्ति देनेवाला तथा संसारबन्धनका नाश करनेवाला है। रामतीर्थके तटपर समस्त लोकोंपर अनुग्रहकी इच्छासे महान् शिवलिंग प्रकट हुआ है। उस तीर्थमें स्नान करके उक्त शिवलिंगका दर्शन करनेसे मनुष्योंको मोक्षतक प्राप्त हो जाता है, फिर अन्य विभूतियोंकी तो बात ही क्या है?

तारकब्रह्म श्रीरामचन्द्रजीके तीर्थमें स्नान करनेके अनन्तर चित्तको एकाग्र करके श्रीलक्ष्मणजीके तीर्थमें जाय। उसमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हुआ मनुष्य निर्मल मुक्तिको प्राप्त होता है। लक्ष्मणतीर्थके तटपर जो उनके मन्त्रका जप करता है, वह सब शास्त्रोंका विद्वान् और चारों वेदोंका ज्ञाता होता है। उसके तटपर लक्ष्मणजीने महान् शिवलिंगकी स्थापना की है। जो उस तीर्थमें स्नान करके लक्ष्मणेश्वरका सेवन करता है, वह इस संसारमें दरिद्रता, रोग और संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

लक्ष्मणजीके महान् तीर्थमें स्नान करके अपने चित्तकी शुद्धिके लिये जटातीर्थमें जाना चाहिये। पूर्वकालमें साक्षात् भगवान् शंकरने गन्धमादन पर्वतपर सबके उपकारके लिये इस अज्ञाननाशक तीर्थको प्रकट किया है। रावणके मारे जानेपर धर्मात्मा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने जिस जलमें अपनी जटाको धोया था, वही जटातीर्थ कहलाता है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके अन्तःकरणकी शुद्धि हो जाती है। उससे ज्ञान होता है और उस ज्ञानसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वह अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूपसे स्थित होता है। पूर्वकालमें मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको प्रणाम करके शुकदेवजीने पूछा—'तात! जिससे अन्तःकरणकी शुद्धि, अज्ञानका नाश, ज्ञानका उदय और अन्तमें सनातन मुक्ति प्राप्त हो, वह उपाय मुझे बतलाइये।'

व्यासजी बोले—बेटा शुकदेव ! महापुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर जो रामसेतु है, वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला जटातीर्थ है। वह अविद्याकी ग्रन्थिको भेदन करनेवाला, अन्तःकरणको शुद्ध बनानेवाला तथा मनुष्योंके जन्म-मृत्यु आदि भयका नाश करनेवाला है। वहाँ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने अपनी जटा धोयी है और उस तीर्थको यह वरदान दिया है कि 'यज्ञ, ज्ञान, जप और उपवासके बिना ही केवल जटातीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्योंकी बुद्धि शुद्ध हो जायगी।'

शुक ! वरुणनन्दन भृगुने पूर्वकालमें अपने पितासे जब बुद्धिको शुद्ध करनेवाले शुभ एवं पावन उपायके विषयमें प्रश्न किया, तब वरुणने उन्हें जटातीर्थमें स्नान करनेकी सलाह दी। पिताके कहनेसे भृगुजी जटातीर्थमें गये और वहाँ स्नान करनेसे उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी। तत्पश्चात् वे अद्वैत बोध प्राप्त करके अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप पूर्णतम परमात्मरूपसे स्थित हुए। इसी प्रकार शिवजीके अंश दुर्वासा भी जटातीर्थमें स्नान करनेसे अन्तःशुद्धिको प्राप्त हो ब्रह्मानन्दमय हो गये। जो अपने अज्ञानका नाश चाहता है, वह सब पापोंका नाश करनेवाले पुण्यमय परम शुद्ध जटातीर्थमें स्नान करे। इसलिये तुम जटातीर्थमें जाओ और मनको शुद्ध करनेवाले उस पुण्यदायक तीर्थमें स्नान करो।

५४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पिताकी बात मानकर शुकदेवजी महापुण्यमय रामसेतुरूप गन्धमादन पर्वतपर गये और शुद्धिदायक जटातीर्थमें स्नान करनेकी इच्छासे संकल्प करके उसमें स्नान किया। इससे अन्तःशुद्धिको पाकर अज्ञानका नाश हो जानेपर वे अपने परमानन्द-स्वरूपको प्राप्त हो गये। दूसरे लोग भी, जो मनकी शुद्धि चाहते हैं, जटातीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करें। वेदोंके प्रवचनसे, पुण्यसे, यज्ञ, दान, तप और व्रतसे तथा उपवास, जप और योगसे भी मनुष्योंके मनकी शुद्धि होती है, किंतु परमपावन जटातीर्थमें स्नान कर लेनेपर इन पूर्वोक्त साधनोंके बिना भी निश्चितरूपसे मनकी शुद्धि हो जाती है। इस प्रकार यह जटातीर्थका माहात्म्य बतलाया गया।


लक्ष्मीतीर्थ और अग्‍नितीर्थका माहात्म्य—पिशाचयोनिको प्राप्त हुए दुष्पण्यका उद्धार

श्रीसूतजी कहते हैं—सब पातकोंका नाश करनेवाले जटातीर्थमें स्नान करके विशुद्ध चित्तवाला पुरुष लक्ष्मीतीर्थको जाय। जो-जो कामना मनमें रखकर मनुष्य लक्ष्मीतीर्थमें स्नान करता है, वह सब प्राप्त कर लेता है। लक्ष्मीतीर्थ बड़ी भारी दरिद्रताकी शान्ति करनेवाला, महान् धन-धान्यकी समृद्धि देनेवाला, बड़े-बड़े दुःखोंका नाश करनेवाला और महान् वैभवको बढ़ानेवाला है। वह स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला, महान् ऋणसे छुटकारा दिलानेवाला तथा श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करनेवाला है। ब्राह्मणो! इस प्रकार यह लक्ष्मीतीर्थका माहात्म्य बतलाया गया।

इस तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् अग्‍नितीर्थको जाय। वह महापुण्यमय और महापातकोंका विनाशक है। पूर्वकालमें रावणको उसकी सेनासहित मारकर तथा विभीषणको लंकाका राजा बनाकर दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी जब सीता और लक्ष्मणके साथ सेतुमार्गसे गन्धमादन पर्वतपर आये, तब लक्ष्मीतीर्थके किनारे ठहरकर उन्होंने देवताओं, ऋषियों और पितरोंके समीप वहाँ अग्निदेवका आवाहन किया। तब लक्ष्मीतीर्थसे कुछ दूरपर अग्निदेव महासागरसे ऊपर उठे और मानवरूपधारी श्रीरघुनाथजीको देखकर इस प्रकार बोले—'राम! राक्षसोंको भय देनेवाले महाबाहु श्रीराम! आपने जो रावणका वध किया है, वह जानकीजीके पातिव्रत्य धर्मके बलसे ही सम्भव हुआ है। यह बात सत्य है, सत्य है, सत्य है। ये साक्षात् जगन्माता लक्ष्मी हैं। इन्होंने लीलाके लिये मानव-शरीर धारण किया है। जब आप देवशरीरमें स्थित होते हैं, तब ये भी दिव्य देहसे आपकी सेवा करती हैं। आपने मानवशरीर धारण किया है, इसलिये ये भी मानवकन्याके रूपमें प्रकट हुई हैं। आप भगवान् विष्णुके शरीरके अनुरूप ही ये भी शरीर धारण कर लेती हैं। जगत्स्वामिन्! देवाधिदेव

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४९

जनार्दन! आप जब-जब अवतार धारण करते हैं, तब-तब ये आपकी सहायिका होती हैं। जब आप भृगुनन्दन परशुरामके रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब ये धरणी नामसे प्रकट हुई थीं। इस समय आपके साथ ये जनकनन्दिनी सीताके रूपमें प्रकट हुई हैं और भविष्यमें जब आप श्रीकृष्ण अवतार लेंगे, तब ये रुक्मिणी होंगी। इसी प्रकार अन्यान्य अवतारोंमें भी ये आपकी सहायिका होती हैं। अतः रघुनन्दन! आप मेरे कहनेसे इन्हें आदरपूर्वक ग्रहण करें।'

अग्निका यह वचन सुनकर देवताओं और महर्षियोंने दशरथनन्दन श्रीराम तथा जनकनन्दिनी सीताकी बार-बार प्रशंसा की। श्रीरामचन्द्रजीने अग्निके साक्षी देनेसे परम निर्मल सती-साध्वी सीताको ग्रहण किया। जिस स्थानपर अग्निदेव प्रकट हुए, उसीको अग्नितीर्थ समझो। अग्निके प्रकट होनेसे ही उसका नाम अग्नितीर्थ हुआ। उस मोक्षदायक तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य उपवासपूर्वक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उन्हें वस्त्र और धन दे। ऐसा करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

पूर्वकालकी बात है, पाटलिपुत्रमें पशुमान् नामक एक वैश्य रहते थे। वे सदा धर्ममें तत्पर और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहा करते थे। सदा कृषि और गोरक्षा करते हुए पशुमान् बाजारकी गलियोंमें धर्मतः सुवर्ण आदिका विक्रय किया करते थे। उनके तीन स्त्रियाँ थीं, जो सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थीं। उन तीनों स्त्रियोंसे सुपुण्य आदि आठ पुत्र उत्पन्न हुए। वे जब पाँच वर्षके हो गये तब उन्हें कर्तव्यकी शिक्षा दी जाने लगी। वे धीरे-धीरे खेती, गोरक्षा और व्यापारका काम भलीभाँति सीख गये। सुपुण्य आदि सात पुत्र पिताकी बात सुनते और पशुमान् जो कहते उस कार्यको तत्काल पूरा करते थे। उन्होंने सोनेके कारबारमें भी अत्यन्त कुशलता प्राप्त कर ली।

किंतु वैश्यका आठवाँ पुत्र 'दुष्पण्य' बचपनसे ही खोटे मार्गपर चलने लगा। वह पिताकी बात नहीं सुनता था। दुष्पण्य बाल्यकालसे ही बालकोंको सताया करता था। पशुमान्ने उसे दुष्कर्मपरायण देखकर भी 'यह नादान है' ऐसा कहकर उसकी उपेक्षा कर दी। तदनन्तर वैश्यके आठों पुत्र युवावस्थाको प्राप्त हुए। आठवाँ पुत्र दुष्पण्य नगरके बालकोंको दोनों हाथोंमें पकड़ लेता और कुआँ, नदी या तालाबमें फेंक देता था। उसके इस दुश्चरित्रको कोई नहीं जानता था। जलमें उनका शव देखकर लोग उनका संस्कार करते थे। तब पुरवासियोंने आकर राजासे यह वृत्तान्त निवेदन किया। उनका वचन सुनकर राजाने ग्रामरक्षकोंको बुलाया और यह आज्ञा दी—'बालकोंकी मृत्युका क्या कारण है, इसका पता लगाओ।' ग्रामरक्षक बालकोंके मारे जानेके रहस्यका पता लगाने लगे। किंतु बहुत खोज करनेपर भी उन्हें उस बालघातकका पता नहीं लगा। वे डरते हुए राजाके पास गये और बोले—'महाराज! हम बहुत खोज करनेपर भी यह न जान सके कि कौन इस नगरमें रहकर निरन्तर बालकोंकी हत्या करता है।'

तदनन्तर किसी समय वह वैश्य-बालक अन्य पाँच बालकोंके साथ कमल निकालकर ले आनेके बहाने सरोवरके निकट गया। वहाँ उसने उन बालकोंको जबरदस्ती पकड़कर पानीमें डुबो दिया। वे बालक चीखते-चिल्लाते रहे तो भी उस क्रूरात्माने उन्हें कण्ठतक पानीमें ले जाकर डुबा दिया। उन सबको मरा हुआ जानकर दुष्पण्य शीघ्र अपने घरको चला गया। उन पाँचों बालकोंके पिता अपने पुत्रोंको नगरमें ढूँढ़ने लगे। वे पाँचों बालक अधिक छोटे नहीं थे। पानीमें डाल देनेपर भी वे मर न सके, धीरे-धीरे सरोवरके किनारे आ गये और वहीं घूमते रहे। इतनेमें ही अपने बन्धुओंद्वारा नाम ले-लेकर पुकारनेकी आवाज

५५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उन्हें दूरसे सुनायी दी। तब उन्होंने भी जोरसे बोलकर उत्तर दिया। बालकोंकी आवाज सुनकर उनके पिता सरोवरके तटपर गये। वहाँ उन्हें जीवित देखकर उन सबको बड़ा हर्ष हुआ। फिर पिता आदिने पूछा—'तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हुई?' तब बालकोंने दुष्पण्यके उस दुष्कर्मका वृत्तान्त अपने बन्धुओंको कह सुनाया। यह बात जानकर पुरवासियोंने राजाको इसकी सूचना दी। राजाने पशुमान्‌को बुलाकर कहा—'पशुमन्! यह नगर बहुत-से बालकोंसे भरा-पूरा रहा है, किंतु तुम्हारे दुरात्मा पुत्रने इसे प्रायः सूना कर दिया। अभी-अभी इन बालकोंको उसने जलमें डुबो दिया था, परंतु दैवयोगसे ये जीवित निकल आये हैं। बताओ, इस समय क्या करना चाहिये? मैं तुम्हींसे पूछता हूँ, क्योंकि तुम सदा धर्ममें तत्पर रहते हो।'

राजाके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ पशुमान्ने कहा—राजन्! जिसने सारे नगरको सूना कर दिया है, वह वधके ही योग्य है। इस विषयमें कुछ पूछनेकी बात ही नहीं है। यह अत्यन्त पापात्मा मेरा पुत्र नहीं, शत्रु ही है। जिसने इस नगरको बालकोंसे खाली कर दिया, उस दुष्टके उद्धारका मुझे कोई उपाय नहीं दिखायी देता। मैं सच कहता हूँ, इस दुष्टात्माको प्राणदण्ड दिया जाय। पशुमान्‌का यह वचन सुनकर समस्त पुरवासी पशुमान्‌की प्रशंसा करते हुए राजासे बोले—'महाराज! इस दुष्टको मारा न जाय अपितु चुपचाप नगरसे निकाल दिया जाय।' तब राजाने दुष्पण्यको बुलाकर कहा—'ओ दुष्टात्मन्! तू शीघ्र हमारे राज्यसे बाहर चला जा। यदि यहाँ रहेगा, तो मैं तेरा वध कर डालूँगा।' इस प्रकार डाँट बताकर राजाने दूतोंद्वारा उसे नगरसे निर्वासित कर दिया।

तदनन्तर दुष्पण्य भयभीत हो उस देशको छोड़कर मुनिमण्डलीसे युक्त वनमें चला गया। वहाँ जाकर भी उसने एक मुनिके बालकको जलमें डुबो दिया। कुछ बालक खेलनेके लिये गये हुए थे, उन्होंने उस बालकको मरा हुआ देख अत्यन्त दुःखी हो उसके पितासे यह समाचार कहा। तब उग्रश्रवाने बालकोंसे अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुनकर तपके प्रभावसे दुष्पण्यके चरित्रको जान लिया और उसे शाप देते हुए कहा—'अरे, तूने मेरे पुत्रको पानीमें फेंककर मार डाला है, इसलिये तेरी मृत्यु भी जलमें ही डूबनेसे होगी और मरनेके बाद तू दीर्घकालतक पिशाच बना रहेगा।' यह शाप सुनकर दुष्पण्यको बड़ा दुःख हुआ तथा वह उस वनको छोड़कर सिंह आदि क्रूर जन्तुओंसे युक्त दूसरे भयंकर वनमें चला गया। वहाँ बड़े जोरकी वर्षा और आँधी चलने लगी। दुष्पण्यने देखा एक मरे हुए हाथीका सूखा कंकाल पड़ा है। उस समय आँधी और प्रचण्ड वर्षाके कष्टको न सह सकनेके कारण वह उस हाथीके पेटकी गुफामें घुस गया।

फिर बड़ी भारी वर्षा हुई। जलका महान् प्रवाह हाथीके पेटमें भी भर गया। हाथीका शव उस महाप्रवाहमें बहते-बहते समुद्रमें चला गया। दुष्पण्य उस जलमें डूबकर क्षणभरमें प्राणहीन हो गया। मृत्युके बाद उसे पिशाचकी योनि मिली। भूख-प्याससे पीड़ित होकर वह भयानक रूपधारी पिशाच अनेक प्रकारके दुःख सहता हुआ गहन वनमें रहने लगा। एक वनसे दूसरे वनमें दौड़ता और कष्ट भोगता हुआ वह क्रमशः दण्डकारण्यमें आया। वहाँ उसने उच्चस्वरसे पुकार लगायी—'हे तपस्वी महात्माओ! आपलोग बड़े कृपालु और सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। मैं दुःखसे अत्यन्त पीड़ित हूँ। अतः मुझे अपनी दयादृष्टिसे अनुगृहीत करें। पूर्वकालमें मैं पाटलिपुत्र नगरमें पशुमान्‌का पुत्र दुष्पण्य नामक वैश्य था। उस समय मैंने बहुत-से बालकोंकी हत्या की। अब मैं पिशाचयोनिको प्राप्त हुआ हूँ। भूख-प्यास सहन करनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी है। अतः आपलोग कृपा करके मेरी रक्षा करें। तपोधनो! जिस प्रकार मैं पिशाचयोनिसे छूट जाऊँ वैसा प्रयत्न कीजिये।'

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५१

पिशाचका यह वचन सुनकर तपस्वी मुनियोंने महर्षि अगस्त्यजीसे कहा—'भगवन्! इस पिशाचके उद्धारका कोई उपाय बतलावें।' तब अगस्त्यजीने अपने प्रिय शिष्य सुतीक्ष्णको बुलाकर कहा—'वत्स सुतीक्ष्ण! तुम शीघ्र गन्धमादन पर्वतपर चले जाओ। वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला महान् अग्नितीर्थ है। महामते! इस पिशाचके उद्धारके उद्देश्यसे तुम उस तीर्थमें स्नान करो।' अगस्त्यजीके ऐसा कहनेपर सुतीक्ष्णजी गन्धमादन पर्वतपर गये और अग्नितीर्थमें जाकर पिशाचके लिये स्नानका संकल्प करके वहाँ उन्होंने तीन दिनतक नियमपूर्वक स्नान किया। फिर रामनाथ आदि तीर्थोंका सेवन और स्नान करके श्रेष्ठ ब्राह्मण सुतीक्ष्णजी अपने आश्रमपर लौट आये। उस तीर्थमें स्नानके प्रभावसे वह पिशाच शीघ्र ही दिव्य देहको प्राप्त हुआ और सुतीक्ष्ण, अगस्त्य तथा अन्य तपोधनोंको बार-बार प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चला गया।

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चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ और यमुना, गंगा एवं गयातीर्थकी महिमा—राजा जानश्रुतिको रैक्वके उपदेशसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति

अग्नितीर्थमें स्नान करके शुद्धात्मा पुरुष सब पातकोंका नाश करनेवाले चक्रतीर्थकी यात्रा करे। जिस-जिस कामनाके उद्देश्यसे मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करता है, उस-उसको वह प्राप्त कर लेता है। पूर्वकालमें कठोर नियमोंका पालन करनेवाले 'अहिर्बुध्न्य' नामक तपस्वी महर्षि इस गन्धमादन तीर्थमें सुदर्शनचक्रकी उपासना करते थे। वहाँ तपस्या करते हुए मुनिको भयानक-रूपधारी राक्षस सताते और उनकी तपस्यामें विघ्न डाला करते थे। तब भक्तकी रक्षा करनेके लिये सुदर्शन चक्रने आकर बाधा देनेवाले उन समस्त राक्षसोंको लीलापूर्वक मार डाला। भक्तकी प्रार्थनासे वह चक्र उसी तीर्थमें रहने लगा। तभीसे उसका नाम चक्रतीर्थ हो गया। उस तीर्थमें स्नान करनेपर सुदर्शन चक्रके प्रसादसे राक्षस और पिशाच आदिकी पीड़ा कभी नहीं होती।

श्यामलापुरमें हरिहर नामक एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे एक दिन वनमें गये। वहाँ एक वनवासी व्याध मनोरंजनके लिये लक्ष्य-भेदन कर रहा था। हरिहर बाबा उसके बाणोंके लक्ष्यमें आ गये और उनके दोनों पैर कट गये। तब मुनियोंकी प्रेरणासे वे गन्धमादन पर्वतपर पहुँचाये गये और वहाँ इस तीर्थमें स्नान करनेपर उनके दोनों पैर पुनः ज्यों-के-त्यों हो गये। तबसे यह पुण्यतीर्थ मुनितीर्थ कहलाता था। आगे चलकर चक्रके नामसे यह चक्रतीर्थ कहलाने लगा। जिनके हाथ, पैर या अन्य कोई अंग कट गये हों, वे उस कटे हुए अंगकी पूर्तिके लिये सर्वमनोरथदायक इस चक्रतीर्थका सेवन करें। इस प्रकार यह चक्रतीर्थका प्रभाव बतलाया गया।

चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य शिवतीर्थको जाय, जहाँ स्नान करनेसे कोटि-कोटि महापातक नष्ट हो जाते हैं। महापातकोंके संसर्गसे होनेवाले पाप भी उसी क्षण दूर हो जाते हैं। शिवतीर्थ महान् दुःखों और नरकके क्लेशोंका निवारण करनेवाला है तथा स्वर्ग और मोक्षको देनेवाला है।

शिवतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् अपने पापसमुदायकी शान्तिके लिये शंखतीर्थकी यात्रा करे, जिसमें स्नान करनेमात्रसे कृतघ्न पुरुष भी पापमुक्त हो जाता है। पूर्वकालमें गन्धमादन पर्वतपर शंख नामक मुनि निवास करते थे। वे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए तपस्यामें

५५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

संलग्न रहते थे। उन्होंने वहाँ स्नान करनेके लिये उत्तम तीर्थका निर्माण किया। शंखसे निर्मित होनेके कारण उसे शंखतीर्थ कहते हैं। उसमें स्नान करनेसे माता-पिता और गुरुसे द्रोह करनेवाले पापी तथा अन्य कृतघ्न भी मुक्त हो जाते हैं। इस कारण कृतघ्न मनुष्योंको इस तीर्थका अवश्य सेवन करना चाहिये। जो माता-पिताका पालन नहीं करता और गुरुदक्षिणा नहीं देता, वह कृतघ्नताको प्राप्त होता है। स्वयं ही चितामें जल मरना उसका प्रायश्चित्त है। परंतु इस शंखतीर्थमें स्नानमात्रसे ही उस कृतघ्नताका भी प्रायश्चित्त हो जाता है।

शंखतीर्थमें स्नान करके मनुष्य क्रमशः यमुना, गंगा और गया आदि तीर्थोंकी यात्रा करे। ये तीनों तीर्थ मनुष्योंके महापातकोंका नाश करनेवाले, परम पवित्र हैं और समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा समस्त विघ्नों तथा रोगोंका निवारण हो जाता है। ये तीर्थ अज्ञानका नाश और ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। पूर्वकालमें महाराज जानश्रुतिने इन्हीं तीर्थोंमें स्नान करके द्विजश्रेष्ठ रैक्वसे उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था।

महर्षि रैक्व पहले गन्धमादन पर्वतपर रहकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या करते थे। वे जन्मसे ही पंगु थे। अतः गन्धमादन पर्वतपर जो-जो तीर्थ हैं, वे उन्हींकी यात्रा करते थे; क्योंकि वे सब समीपवर्ती थे। पैदल न चल सकनेके कारण वे गाड़ीसे ही उन तीर्थोंमें जाते थे। इसीलिये गाड़ीवाले रैक्वके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने तपस्यासे अपना शरीर सुखा डाला था। उनके उस शरीरमें खाज हो गयी थी, जिसे वे दिन-रात खुजलाते रहते थे। फिर भी उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। एक दिन उनके मनमें ऐसा विचार हुआ कि 'मैं यमुना, गंगा और गया—इन तीनों पवित्र तीर्थोंमें स्नान करूँ; परंतु मैं तो जन्मसे ही पंगु हूँ, अतः मेरे लिये वहाँका स्नान दुर्लभ है। गाड़ीसे इतनी दूरकी यात्रा नहीं की जा सकती। तब इस समय मैं क्या करूँ?' इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए महाबुद्धिमान् रैक्वने तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका निश्चय किया। उन्होंने सोचा—'मेरा तपोबल दुर्धर्ष एवं असह्य है, उसीके द्वारा मैं यहाँ उक्त तीर्थोंका आवाहन करूँगा।' मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वे पूर्वाभिमुख बैठे, मन-इन्द्रियोंको संयममें रखकर तीन बार आचमन किया और एक क्षणतक ध्यानमें लगे रहे। उनके मन्त्रके प्रभावसे महानदी यमुना, गंगा और पापनाशिनी गया—तीनों भूमि फोड़कर सहसा पातालसे प्रकट हुईं और मानव-शरीर धारणकर गाड़ीवाले रैक्वके समीप आ उन्हें प्रसन्न करती हुई प्रसन्नतापूर्वक बोलीं—'रैक्व ! तुम्हारा कल्याण हो, इस ध्यानसे निवृत्त होओ। तुम्हारे मन्त्रसे आकृष्ट हो हम तीनों यहाँ उपस्थित हुई हैं।'

उनका यह वचन सुनकर महामुनि रैक्व ध्यानसे निवृत्त हुए और उन्हें अपने सामने उपस्थित देखा। तब उन्होंने उन तीनोंका पूजन करके कहा—'हे यमुने ! हे देवि गंगे ! और हे पापनाशिनी गये ! तुम तीनों गन्धमादन पर्वतपर वहीं निवास करो, जहाँ भूमि फोड़कर यहाँ प्रकट हुई हो। वे स्थान तुम्हारे नामसे पवित्र तीर्थ हो जायँ।' तब वे तीनों देवियाँ 'तथास्तु' कहकर सहसा अन्तर्धान हो गयीं। तबसे ये तीनों तीर्थ भूतलमें मनुष्योंद्वारा उन्हींके नामसे पुकारे जाते हैं। जहाँ भूमि फोड़कर यमुना निकली, उसी स्थानको लोग 'यमुनातीर्थ' कहते हैं, जहाँ पृथ्वीके छिद्रसे सहसा गंगाका प्रादुर्भाव हुआ, वह स्थान लोकमें पापनाशक 'गंगातीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ और जहाँ गयाका प्रादुर्भाव हुआ, वह भूमि-विवर 'गयातीर्थ' कहलाता है। इस प्रकार वे तीनों तीर्थ बड़े पवित्र हैं। जो मनुष्य इन उत्तम तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके अज्ञानका नाश और ज्ञानका उदय होता है। रैक्व मुनि अपने मन्त्रद्वारा आकर्षित किये हुए उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करते हुए समय व्यतीत करने लगे।

इसी समय महाराज जानश्रुति इस भूतलपर

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५३

राज्य करते थे। वे राजर्षि पुत्रके पौत्र थे और एकमात्र धर्मके आचरणमें ही संलग्न रहते थे। याचकोंको श्रद्धापूर्वक अन्न आदि देते थे। अतः मुनिलोग उन्हें लोकमें 'श्रद्धादेय' कहते थे। भूखे याचकोंकी तृप्तिके लिये उस अन्न-धन-सम्पन्न राजाके यहाँ नाना प्रकारके वचन कहे जाते थे, इसलिये सब याचकोंने उनका नाम 'बहुवाक्य' रख दिया था। जनश्रुतके पुत्र महाबली जानश्रुतिको अतिथि बहुत प्रिय थे। इसलिये वे बहुत दान करनेके कारण 'बहुदायी' के नामसे प्रसिद्ध हुए। नगरोंमें, राज्यमें, गाँवों और जंगलोंमें, चौराहोंपर तथा सभी बड़े-बड़े मार्गोंमें उनकी ओरसे खाने-पीनेकी बहुत सामग्री प्रस्तुत रहती थी। अतिथियोंकी तृप्तिके लिये वे अन्न, पान, दाल, साग आदि उत्तम भोजनकी व्यवस्था रखते थे। उस पौत्रायण राजाके गुणोंसे महाभाग देवर्षि बहुत सन्तुष्ट हुए। उन सबके मनमें राजाके ऊपर कृपा करनेकी इच्छा हुई। एक दिन राजा जानश्रुति गरमीकी रातमें अपने महलके भीतर खिड़कीके पास सो रहे थे। उसी समय देवर्षिगण हंसका रूप धारण करके एक पंक्तिमें आकाशमार्गसे उड़ते हुए आये और राजाके ऊपर होकर जाने लगे। उस समय बड़े वेगसे उड़ते हुए एक हंसने आगे जानेवाले हंसको सम्बोधित करके राजाको सुनाते हुए उपहासपूर्वक कहा—'भल्लाक्ष! अरे ओ भल्लाक्ष! क्या आगे-आगे जाता हुआ तू अन्धोंकी नाईं देखता नहीं है कि आगे पूजनीय राजा जानश्रुति विराजमान हैं? यदि तू उन राजर्षिको लाँघकर ऊपर जायगा, तो उनका तेज इस समय तुझे जलाकर भस्म कर डालेगा।' ऐसा कहते हुए उस हंसको आगे जानेवाले हंसने उत्तर दिया—'अहो! तुम तो बड़े ज्ञानी हो, विद्वानोंके द्वारा भी प्रशंसनीय हो, तथापि इस तुच्छ मनुष्यकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हो? यह धर्मोंके रहस्यको नहीं जानता, जैसा कि ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ गाड़ीवाले रैक्व मुनि जानते हैं। इस राजाका तेज उनके समान नहीं है। रैक्वकी पुण्यराशियोंकी इयत्ता (संख्या) नहीं हो सकती। पृथ्वीके धूलिकण गिने जा सकते हैं, आकाशके नक्षत्र भी गणनामें आ सकते हैं, परंतु रैक्व मुनिके महामेरु-सदृश पुण्यपुंजोंकी गणना नहीं की जा सकती। राजा जानश्रुतिमें तो वैसा धर्म ही नहीं है, फिर वह ज्ञान-वैभव कहाँसे हो सकता है। अतः इस तुच्छ मनुष्यकी चर्चा छोड़कर उसी गाड़ीवाले रैक्व मुनिकी प्रशंसा करो। उन्होंने जन्मसे पंगु होकर भी स्नान करनेकी इच्छासे मन्त्रद्वारा यमुना, गंगा और गयाको भी अपने आश्रमके समीप बुला लिया है।'

आगे जानेवाला हंस जब ऐसा कहकर चुप हो गया, तब वे हंसरूपधारी देवर्षि पुनः ब्रह्मलोकको चले गये। तदनन्तर पौत्रायण राजा जानश्रुति रैक्व मुनिको उन्नतिकी चरम सीमापर पहुँचे हुए सुनकर बहुत उदास हो गये और बारंबार लंबी साँस खींचते हुए विचार करने लगे—'उस हंसने रैक्वको ऊँचा बताते हुए मुझे तुच्छ कहा था। अहो! रैक्वकी कैसी महिमा है? अब मैं संसार तथा समूचे राज्यको छोड़कर गाड़ीवाले महात्मा रैक्वकी शरणमें जाता हूँ। वे कृपानिधान मुनि अपनी शरणमें आये हुए मुझे अपनाकर आत्मज्ञानका उपदेश देंगे।' रात्रि बीतनेपर महाराज जानश्रुतिने सारथीको बुलाकर कहा—'सूत! तुम तीव्रगामी रथपर आरूढ़ हो शीघ्र जाओ और महर्षियोंके आश्रमों, पवित्र वनों, एकान्त प्रदेशों, सत्पुरुषोंके निवासस्थानों, तीर्थों, नदी-तटों तथा अन्यान्य स्थानोंमें, जहाँ मुनीश्वर लोग रहते हैं, योगीश्वर रैक्वका पता लगाओ। वे जन्मसे पंगु हैं, गाड़ीपर बैठे रहते हैं, सब धर्मोंके एकमात्र आश्रय हैं और ब्रह्मज्ञानकी निधि हैं। मेरी प्रसन्नताके लिये उनका शीघ्र अन्वेषण करके पुनः मेरे पास लौट आओ।'

'बहुत अच्छा' कहकर सारथी वेगवान् रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। उसने ब्रह्मज्ञानी

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रैकव मुनिकी सर्वत्र खोज की। अनेकों स्थानोंमें ढूँढ़नेके पश्चात् वह क्रमशः महर्षियोंसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ खोजते-खोजते उसने मुनीश्वर रैकवको देखा, जो गाड़ीपर बैठकर अपनी खाज खुजला रहे थे। वे कलारहित अद्वैत ब्रह्मके चिन्तनमें संलग्न थे। गाड़ीसहित उस महामुनिको देखकर सारथीने पहचान लिया कि यही रैकव हैं। तब उनके पास जाकर उसने प्रणाम किया और उनके समीप बैठकर विनयपूर्वक पूछा—'ब्रह्मन्! क्या आप ही गाड़ीवाले रैकव नामसे विख्यात हैं?' मुनि बोले—'हाँ, मैं ही गाड़ीवाला रैकव हूँ।' मुनिका यह वचन सुनकर सारथी गन्धमादन पर्वतसे लौटा और राजाके पास पहुँचकर उसने सब समाचार निवेदन किया। तब राजा जानश्रुति छः सौ गौएँ, धन और स्वर्णमुद्राओंका भार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ अपने साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक रैकव मुनिके समीप चले। वहाँ पहुँचकर राजाने रैकवसे कहा—'भगवन्! मेरी दी हुई ये सब वस्तुएँ स्वीकार कीजिये। इन सबको लेकर मेरे लिये अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश कीजिये।' तब गाड़ीवाले रैकवने राजा जानश्रुतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'राजन्! ये गौएँ, यह सोनेका भार और यह रथ सब तुम्हारे ही पास रहें, मैं तो बहुत कल्पोंतक जीवित रहनेवाला हूँ। इस धनके द्वारा मेरा कौन-सा लाभ होगा?'

रैकवका यह वचन सुनकर जानश्रुतिने कहा—ब्रह्मन्! आपके द्वारा उपदेश किये जानेवाले ब्रह्मज्ञानका मूल्य नहीं है। आप ये गाय, धन और रथ ग्रहण करें या न करें, किंतु मुझे निष्कल अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश अवश्य दें।

रैकव बोले—जिसका संसारमें वैराग्य हो और जिसके पुण्य-पापरूप प्रारब्धका विनाश हो जाय, वही ज्ञानके उपदेशका भागी है। यद्यपि तुम्हें संसारसे वैराग्य हो गया है तथापि अभी तुम्हारे पुण्य-पापोंका विनाश नहीं हुआ है। यहाँपर तीन पवित्र तीर्थ हैं, जो समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले हैं। उनके नाम हैं—यमुनातीर्थ, गंगातीर्थ और गयातीर्थ। इन तीनोंमें तुम शीघ्र स्नान करो। इससे तुम्हारे सब प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जायगा और अन्तःकरण शुद्ध होगा। तब मैं तुमको ज्ञानका उपदेश करूँगा।'

रैकव मुनिके ऐसा कहनेपर राजाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उन्होंने शीघ्रतापूर्वक तीनों तीर्थोंमें स्नान किया। उस स्नानमात्रसे उनका चित्त शुद्ध हो गया। तब वे अपने गुरु रैकव मुनिके पास आये। रैकवने जानश्रुतिको कृपापूर्वक ज्ञानका उपदेश दिया। उपदेश प्राप्त होनेपर राजा अबाधित अनुभवसे सम्पन्न हो योगी रैकवके प्रसादसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये।


कोटितीर्थकी महिमा — भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, कंसवध तथा श्रीकृष्णका कोटितीर्थमें स्नान

श्रीसूतजी कहते हैं—यमुना, गंगा और गया तीर्थमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करके 'कोटितीर्थ' की यात्रा करे। वह महापुण्यमय तीर्थ सब लोकोंमें विख्यात है। दुःस्वप्न, महापातक और बड़े-बड़े विघ्नोंका नाश करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणको मारकर गन्धमादन पर्वतपर लोकानुग्रहके लिये एक शिवलिंगकी स्थापना की। उस लिंगका अभिषेक करनेके लिये वे शुद्ध जल ढूँढ़ने लगे। किंतु वैसा जल उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। तब रघुनाथजीने मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करते हुए धनुषकी कोटिसे शीघ्र ही पृथ्वीको विदीर्ण किया। श्रीरामके धनुषकी वह कोटि रसातलतक पहुँच गयी। फिर उन्होंने धनुषको

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५५

पृथ्वीसे ऊपर निकाला। तब उसी मार्गसे पातालगंगा बाहर निकल आयीं। उसी जलसे श्रीरामचन्द्रजीने शिवलिंगका अभिषेक किया। श्रीरामचन्द्रजीकी धनुषकी कोटिसे उस तीर्थका निर्माण हुआ था, इसलिये वह तीनों लोकोंमें ‘कोटितीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ। गन्धमादन पर्वतपर जो-जो तीर्थ हैं, उन सबमें पहले स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य अवशिष्ट पापोंसे छूटनेके लिये कोटितीर्थमें स्नान करे। अन्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे भी जो पापसमुदाय नहीं नष्ट होता, वह अनेक कोटि जन्मोंका उपार्जित तथा शरीरकी हड्डियोंमें स्थित पापपुंज कोटितीर्थमें स्नान करनेसे पूर्णतः नष्ट हो जाता है। यदि कोई स्वेच्छानुसार कहीं जा रहा हो या तीर्थयात्रा करता हो और मार्गमें उसे कोई तीर्थ या देवालय मिल जाय, तो उसको देख या सुनकर भी जो मोहवश उसका सेवन नहीं करता, वह मनुष्य अधम है—ऐसा महर्षियोंका वचन है। इसलिये सेतुको जानेवाला पुरुष यदि वहाँके अन्य तीर्थोंमें स्नान नहीं करता, तो वह तीर्थोल्लंघनके दोषसे ब्राह्मणोंद्वारा बाहर कर देने योग्य है। अतः चक्रतीर्थ आदिमें अवश्य स्नान करना चाहिये। इन तीर्थोंमें स्नान करनेके पश्चात् शेष पापोंसे छुटकारा पानेके लिये मनुष्योंको कोटितीर्थमें स्नान करना चाहिये। पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजी उसमें स्नान करके उसी क्षण पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो वानरों तथा लक्ष्मण और सीताके साथ अयोध्याको चल दिये थे। अतः उन्हींकी भाँति कोटितीर्थमें स्नान करके शेष पापसे छूटा हुआ मनुष्य उसी क्षण वहाँ लौट आवे। यह श्रेष्ठ तीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध है। श्रीरामचन्द्रजीने भगवान् रामेश्वरका अभिषेक करनेके लिये उसका निर्माण किया था। साक्षात् भगवती गंगा उसमें निवास करती हैं तथा तारकब्रह्म श्रीरामने वहाँ स्नान किया है। उस कोटितीर्थकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है।

यदुवंशमें वसुदेव नामसे विख्यात एक क्षत्रिय थे, जो शूरसेनके पुत्र थे। उन्हीं दिनों भोजकुलमें देवककी एक पुत्री थी, जो देवकीके नामसे विख्यात थी। वसुदेवजी देवकीसे विवाह करके रथपर आरूढ़ हो अपने निवासस्थानको चले। उस समय उग्रसेनका पुत्र कंस वसुदेवका सारथि बनकर रथ हाँकने लगा। इतनेमें ही बहिन और बहनोईको ले जानेवाले कंसको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा—'शत्रुदमन कंस! जिस देवकीको तुम लिये जा रहे हो, उसका आठवाँ गर्भ तुम्हारा घातक होगा।' यह दिव्यवाणी सुनकर कंसने तलवार खींच ली और बहिनको मार डालनेका प्रयत्न किया। यह देख वसुदेवजीने कहा—'कंस! इससे जो सन्तानें पैदा होंगी, उन सबको मैं तुम्हें सौंप दूँगा। यह तुम्हारी बहिन है, इसको मत मारो। इससे तो तुम्हें कोई भय नहीं है।' यह सुनकर कंसने देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया और वसुदेव-देवकीके साथ अपने घरको लौटा। कंस बड़ा दुष्टात्मा था। उसने बहिन और बहनोई दोनोंके पैरोंमें बेड़ी डालकर कारागारमें कैद कर लिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर देवकीने वसुदेवजीसे क्रमशः छः पुत्रोंको जन्म दिया। उन सबको वसुदेवने कंसको अर्पित कर दिया और कंसने उनका वध कर डाला। इस प्रकार देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले छः पुत्रोंके मारे जानेपर सातवें गर्भके रूपमें साक्षात् भगवान् शेषने देवकीके उदरमें प्रवेश किया। उस समय भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मायादेवीने उस गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया। रोहिणी उन दिनों नन्दगोपके घरमें निवास करती थी। लोगोंमें यह बात फैल गयी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया। तदनन्तर स्वयं भगवान् विष्णुने आठवाँ गर्भ होकर देवकीकी कुक्षिमें प्रवेश किया। दस महीने बीत जानेपर अविनाशी भगवान् श्रीहरि

५५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

देवकीके उदरसे प्रकट हुए, जो कृष्ण नामसे विख्यात हुए। जन्मके समय वे शंख, चक्र, गदा और खड्गसे सुशोभित चतुर्भुजरूपमें दृष्टिगोचर हुए। उनके मस्तकपर किरीट और गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी। वे माता-पिताके शोकका नाश करनेवाले थे। सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरिको देखकर वसुदेवजीने उनका स्तवन किया।

वसुदेवजी बोले—प्रभो! आप ही सम्पूर्ण विश्वके रूपमें विराजमान हैं। आप ही इस विश्वके पालक हैं, इसकी उत्पत्तिके स्थान भी आप ही हैं, यह सम्पूर्ण विश्व आपमें ही स्थित है। भगवन्! आप ही प्रकृति, महत्तत्त्व, विराट्, स्वराट् और सम्राट् सब कुछ हैं। इस प्रकार आपका तेज सम्पूर्ण जगत्का कारणभूत है, आपके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है। आप साक्षात् नारायण हैं। आपको नमस्कार है। आप शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। अत्यन्त मनोरम रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करनेवाले वसुदेवको और देवी देवकीको भी प्रसन्न करते हुए भगवान् श्रीहरिने कहा—'माता और पिताजी! आप दोनों भयभीत न हों, मैं कंसका वध करूँगा। नन्दगोपकी पत्नी यशोदाने एक पुत्रीको जन्म दिया है। वह सब लोकोंको मोहनेवाली मेरी माया ही है। आप मुझे ले जाकर यशोदाकी शय्यापर सुला दें और यशोदाकी पुत्रीको लाकर देवकीकी शय्यापर सुलावें।' भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वसुदेवजीने वैसा ही किया। देवकीकी शय्यापर सुलाते ही वह मायामयी पुत्री रोने लगी। बालकके रोनेकी ध्वनि सुनकर कंस व्याकुलचित्त होकर आया और सूतिकाघरमें घुसकर उसने कन्याको ले लिया। उसके मनमें तनिक भी लज्जा और दया नहीं थी। उसने उस बालिकाको ले जाकर पत्थरपर पटक दिया। उसके हाथसे छूटते ही वह बालिका आठ बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित महादेवीके रूपमें प्रकट हुई और कंसको पुकारकर अत्यन्त कुपित होकर बोली—'अरे पापात्मा कंस! ओ दुर्बुद्धे। रे मूर्ख! तेरे प्राणोंको हरनेवाला शत्रु कहीं-न-कहीं उत्पन्न हो गया है। अब तू अपनी मृत्युरूप उस शत्रुंकी खोज करता रह।' ऐसा कहकर देवी, जो मनुष्योंसे पूजा पाकर उनका अभीष्ट सिद्ध करनेवाली है, दिव्य स्थानोंमें चली गयी। देवीका वचन सुनकर कंस अत्यन्त व्याकुल हो उठा। उसने अपना प्राणान्त करनेवाले शत्रुको पीड़ा देनेके लिये तथा दूसरे-दूसरे बालकोंको भी सतानेके लिये पूतना आदि बालग्रहोंको भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भेजा। वे सभी बालग्रह नन्दके गोकुलमें गये और वहाँ श्रीकृष्णके हाथों मारे गये। तदनन्तर कुछ दिन और बीत जानेपर बलभद्र और श्रीकृष्ण गोकुलमें बढ़कर सयाने हो गये। उन्होंने अनेक प्रकारकी बालक्रीडाओंसे खेल किये। कुछ कालतक वे दोनों भाई बाँसुरी बजाते हुए बछड़े चराते रहे। कुछ वर्षोंतक गाय चराते रहे। उस समय वे वनमें गुंजा और तापिच्छके आभूषण धारण करते थे। इस प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण दीर्घकालतक गोकुलमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते रहे।

एक समय कंसने बलराम और श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरजीको गोकुलमें भेजा। अक्रूरजी कंसकी आज्ञासे जाकर उन दोनों भाइयोंको गोकुलसे मथुरा बुला ले आये। मथुरापुरी सुवर्णमय द्वारसे शोभा पा रही थी। बलराम और श्रीकृष्णको लाकर अक्रूरजी पुरीमें गये और कंससे मिलकर उसे सब समाचार बताया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने घरमें प्रवेश किया। तदनन्तर दूसरे दिन वसुदेवके दोनों पुत्र अपने प्रिय मित्र गोपबालकोंके साथ मथुरापुरीमें आये। नगरकी युवतियाँ उनके रूप-गुणकी प्रशंसा करतीं और वे उसे सुनते हुए आगे बढ़ते जाते थे। तदनन्तर, श्रीकृष्णने

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५७

बलरामके साथ धनुषशालामें जाकर दृढ़ प्रत्यंचावाले बड़े भारी धनुषको देखा और सब रक्षकोंको दूर भगाकर लीलापूर्वक उस धनुषको हाथमें ले लिया। फिर जब प्रत्यंचा चढ़ानेके लिये उसे झुकाया, तब बीचसे टूटकर उसके दो टुकड़े हो गये। धनुष टूटनेका शब्द सुनकर वहाँ आये हुए बलवान् रक्षकोंको मारनेके लिये उन दोनों महाबली बन्धुओंने धनुषके दोनों टुकड़े उठा लिये और उन्हींसे सबको मार गिराया। तत्पश्चात् रंगशालाके द्वारपर खड़े हुए कुवलयापीड नामक हाथीको मारकर महान् बल और पराक्रमसे युक्त बलराम तथा श्रीकृष्णने उसके दोनों दाँत उखाड़ लिये और उन्हें हाथसे पकड़कर कन्धेपर रखे हुए क्षणभरमें वे रंगभूमिमें जा पहुँचे। वहाँ उन दोनोंने चाणूर, मुष्टिक, बल तथा दूसरे-दूसरे प्रमुख पहलवानोंको मारकर परम धामको पहुँचा दिया। फिर दोनों भाई शीघ्र ही उछलकर ऊँचे मंचपर चढ़ गये। वहाँ कंस एक ऊँचे आसनपर बैठा हुआ था। उसे तिनकेके समान समझकर वे उसके समीप इस प्रकार स्थित हुए, जैसे दो सिंह तुच्छ मृगके पास खड़े हों। तदनन्तर श्रीकृष्णने मंचपर बैठे हुए कंसके पैर पकड़कर उसे खींच लिया और बड़े वेगसे आकाशमें घुमाया। इतनेमें ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। तब प्राणरहित कंसको उन्होंने धरतीपर गिरा दिया। फिर बलरामजीने भी कंसके आठ भाइयोंको मुक्कोंसे ही मार गिराया। इस प्रकार कंसको मारकर श्रीकृष्णने अत्यन्त दुःख भोगनेवाले अपने माता-पिताको कारागारके बन्धनसे मुक्त किया और अन्य सब लोगोंको भी बलराम तथा श्रीकृष्णने आश्वासन दिया। श्रीकृष्णके द्वारा कंस मारा गया, यह समाचार सुनकर वसुदेवके अन्य बन्धु-बान्धव, जो पहले कंसके द्वारा पीड़ित होकर अन्यत्र चले गये थे, मथुरापुरीमें लौट आये। भगवान् श्रीकृष्णने मथुराके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित किया।

तत्पश्चात् एक दिन भगवान् श्रीकृष्णने दर्शनके लिये अपने पास आये हुए नारदादि मुनियोंसे इस प्रकार पूछा— 'ब्राह्मणो! मैंने अत्यन्त पापात्मा कंसका वध किया है, पर वह कंस मेरा मामा था। शास्त्रोंके ज्ञाता विद्वान् मामाके वधमें दोष बताते हैं; अतः उस दोषके निवारणके लिये आपलोग मुझे कोई प्रायश्चित्त बतलाइये।' यह सुनकर नारदजीने अद्भुत पराक्रमी श्रीकृष्णसे मधुर वाणीमें भक्ति एवं प्रेमके साथ कहा— 'यदुनन्दन! आप नित्य, शुद्ध, बुद्ध एवं मुक्त सच्चिदानन्दस्वरूप सनातन परमात्मा हैं, आपके लिये पुण्य अथवा पाप नहीं है। तथापि गरुड़ध्वज ! आपको लोकशिक्षाके लिये विधिपूर्वक प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिये। माधव! गन्धमादन पर्वतपर जो परम पुण्यमय रामसेतु है, वहाँ पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित किया हुआ रामेश्वर नामक शिवलिंग है। उसके अभिषेकके लिये जलकी आवश्यकता होनेपर श्रीरघुनाथजीने धनुषकी कोटिसे पृथ्वीको भेदकर एक तीर्थ प्रकट किया था, जो कोटितीर्थके नामसे विख्यात है। वह धर्मके लिये हितकर और पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। आप उसीमें स्नान करें। कोटितीर्थका स्नान ब्रह्महत्या आदिका भी निवारण करनेवाला है।'

नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण रामसेतुपर गये और कुछ दिनोंमें कोटितीर्थमें स्नान एवं अनेक प्रकारके दान करके रामेश्वरकी सेवा-पूजा करनेके पश्चात् मथुरापुरीमें लौट आये। कोटितीर्थका ऐसा ही पुण्यमय प्रभाव है। ब्राह्मणो! इस तीर्थमें स्नान करनेसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवता भी प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार यह कोटितीर्थका माहात्म्य बतलाया गया, जिसका श्रवण करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

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५५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सर्वतीर्थ तथा धनुष्कोटि तीर्थोंकी महिमा

श्रीसूतजी कहते हैं—तदनन्तर मनुष्य सर्वतीर्थकी यात्रा करे। पूर्वकालमें सुचरित नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे, जो सदा ही नियमोंमें संलग्न रहते थे। उनका जन्म भृगुवंशमें हुआ था। वे जन्मके ही अन्धे थे, फिर बुढ़ापेने आकर उनको और भी आतुर बना दिया। नेत्र न होनेके कारण वे तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ थे। उनके मनमें सभी तीर्थोंमें स्नान करनेकी इच्छा होती थी। वे महामुनि दक्षिण समुद्रके तटपर पुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर गये और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या करने लगे। वे तीनों समय इन्द्रियसंयमपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करते थे। तीनों समय स्नान और अतिथियोंका सत्कार उनकी दिनचर्याका अंग बन गया था। वे भस्मद्वारा त्रिपुण्ड्र लगाते और जाबालोपनिषद्में बतायी हुई रीतिसे रुद्राक्षकी माला धारण करते थे। इस प्रकार ब्राह्मणने दस वर्षोंतक उग्र तपस्या की। इससे भगवान् चन्द्रशेखर बहुत प्रसन्न हुए और सुचरित मुनिके आगे प्रकट हुए। वे महान् वृषभ नन्दीपर आरूढ़ हो भूतसमुदायसे घिरे हुए थे। उनके आधे शरीरमें भगवती गिरिराजनन्दिनी विद्यमान थीं। वे अपने दिव्य प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाओंको अन्धकारशून्य किये देते थे। उनका सब अंग विभूतियोंसे उज्ज्वल दिखायी देता था। वे जटाभारसे शोभा पा रहे थे। भगवान् शिवने अपने स्वरूपका दर्शन करानेके लिये उन्हें दो नेत्र प्रदान किये। तब सुचरितने परमेश्वर शिवका दर्शन करके प्रसन्नचित्त हो इस प्रकार स्तुति की।

सुचरित बोले—देव महेश्वर ! आपकी जय हो। कल्याणकारी धूर्जटे ! आपकी जय हो। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनीय देव ! आप त्रिपुरासुरके विनाशक तथा कालके भी काल हैं, आपकी जय हो। भगवती उमाके स्वामी महादेव ! आपकी जय हो। कामदेवका विनाश करनेवाले निर्मल परमेश्वर ! आपकी जय हो। शिव ! आप संसाररोगका निवारण करनेवाले वैद्य, सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक तथा अविनाशी देवता हैं, आपकी जय हो। त्रिलोचन ! आपने भक्तोंकी रक्षाका व्रत ग्रहण किया है, आपको नमस्कार है। व्योमकेश ! आपको नमस्कार है। करुणाविग्रह ! आपकी जय हो। नीलकण्ठ ! आपको नमस्कार है। आप संसारबन्धनसे छुड़ानेवाले हैं, आपकी जय हो। महेश्वर ! परमानन्दस्वरूप ! आपको नमस्कार है। गंगाधर ! आपको नमस्कार है। विश्वेश्वर ! सुखस्वरूप अविनाशी देव ! आपको नमस्कार है। आप भगवान् वासुदेव हैं। शम्भो ! आपको नमस्कार है। आप शर्व, उग्र, भर्ग एवं कैलाशपतिको नमस्कार है। करुणासिन्धो ! अपनी कृपादृष्टिसे देखकर मेरी रक्षा कीजिये। भगवान् हर ! मेरे चरित्रकी ओर न देखकर अपनी दयासे ही मेरा उद्धार कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् उमानाथने