संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 578, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४९
जनार्दन! आप जब-जब अवतार धारण करते हैं, तब-तब ये आपकी सहायिका होती हैं। जब आप भृगुनन्दन परशुरामके रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब ये धरणी नामसे प्रकट हुई थीं। इस समय आपके साथ ये जनकनन्दिनी सीताके रूपमें प्रकट हुई हैं और भविष्यमें जब आप श्रीकृष्ण अवतार लेंगे, तब ये रुक्मिणी होंगी। इसी प्रकार अन्यान्य अवतारोंमें भी ये आपकी सहायिका होती हैं। अतः रघुनन्दन! आप मेरे कहनेसे इन्हें आदरपूर्वक ग्रहण करें।'
अग्निका यह वचन सुनकर देवताओं और महर्षियोंने दशरथनन्दन श्रीराम तथा जनकनन्दिनी सीताकी बार-बार प्रशंसा की। श्रीरामचन्द्रजीने अग्निके साक्षी देनेसे परम निर्मल सती-साध्वी सीताको ग्रहण किया। जिस स्थानपर अग्निदेव प्रकट हुए, उसीको अग्नितीर्थ समझो। अग्निके प्रकट होनेसे ही उसका नाम अग्नितीर्थ हुआ। उस मोक्षदायक तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य उपवासपूर्वक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उन्हें वस्त्र और धन दे। ऐसा करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
पूर्वकालकी बात है, पाटलिपुत्रमें पशुमान् नामक एक वैश्य रहते थे। वे सदा धर्ममें तत्पर और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहा करते थे। सदा कृषि और गोरक्षा करते हुए पशुमान् बाजारकी गलियोंमें धर्मतः सुवर्ण आदिका विक्रय किया करते थे। उनके तीन स्त्रियाँ थीं, जो सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थीं। उन तीनों स्त्रियोंसे सुपुण्य आदि आठ पुत्र उत्पन्न हुए। वे जब पाँच वर्षके हो गये तब उन्हें कर्तव्यकी शिक्षा दी जाने लगी। वे धीरे-धीरे खेती, गोरक्षा और व्यापारका काम भलीभाँति सीख गये। सुपुण्य आदि सात पुत्र पिताकी बात सुनते और पशुमान् जो कहते उस कार्यको तत्काल पूरा करते थे। उन्होंने सोनेके कारबारमें भी अत्यन्त कुशलता प्राप्त कर ली।
किंतु वैश्यका आठवाँ पुत्र 'दुष्पण्य' बचपनसे ही खोटे मार्गपर चलने लगा। वह पिताकी बात नहीं सुनता था। दुष्पण्य बाल्यकालसे ही बालकोंको सताया करता था। पशुमान्ने उसे दुष्कर्मपरायण देखकर भी 'यह नादान है' ऐसा कहकर उसकी उपेक्षा कर दी। तदनन्तर वैश्यके आठों पुत्र युवावस्थाको प्राप्त हुए। आठवाँ पुत्र दुष्पण्य नगरके बालकोंको दोनों हाथोंमें पकड़ लेता और कुआँ, नदी या तालाबमें फेंक देता था। उसके इस दुश्चरित्रको कोई नहीं जानता था। जलमें उनका शव देखकर लोग उनका संस्कार करते थे। तब पुरवासियोंने आकर राजासे यह वृत्तान्त निवेदन किया। उनका वचन सुनकर राजाने ग्रामरक्षकोंको बुलाया और यह आज्ञा दी—'बालकोंकी मृत्युका क्या कारण है, इसका पता लगाओ।' ग्रामरक्षक बालकोंके मारे जानेके रहस्यका पता लगाने लगे। किंतु बहुत खोज करनेपर भी उन्हें उस बालघातकका पता नहीं लगा। वे डरते हुए राजाके पास गये और बोले—'महाराज! हम बहुत खोज करनेपर भी यह न जान सके कि कौन इस नगरमें रहकर निरन्तर बालकोंकी हत्या करता है।'
तदनन्तर किसी समय वह वैश्य-बालक अन्य पाँच बालकोंके साथ कमल निकालकर ले आनेके बहाने सरोवरके निकट गया। वहाँ उसने उन बालकोंको जबरदस्ती पकड़कर पानीमें डुबो दिया। वे बालक चीखते-चिल्लाते रहे तो भी उस क्रूरात्माने उन्हें कण्ठतक पानीमें ले जाकर डुबा दिया। उन सबको मरा हुआ जानकर दुष्पण्य शीघ्र अपने घरको चला गया। उन पाँचों बालकोंके पिता अपने पुत्रोंको नगरमें ढूँढ़ने लगे। वे पाँचों बालक अधिक छोटे नहीं थे। पानीमें डाल देनेपर भी वे मर न सके, धीरे-धीरे सरोवरके किनारे आ गये और वहीं घूमते रहे। इतनेमें ही अपने बन्धुओंद्वारा नाम ले-लेकर पुकारनेकी आवाज