भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 579, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 579

५५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उन्हें दूरसे सुनायी दी। तब उन्होंने भी जोरसे बोलकर उत्तर दिया। बालकोंकी आवाज सुनकर उनके पिता सरोवरके तटपर गये। वहाँ उन्हें जीवित देखकर उन सबको बड़ा हर्ष हुआ। फिर पिता आदिने पूछा—'तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हुई?' तब बालकोंने दुष्पण्यके उस दुष्कर्मका वृत्तान्त अपने बन्धुओंको कह सुनाया। यह बात जानकर पुरवासियोंने राजाको इसकी सूचना दी। राजाने पशुमान्‌को बुलाकर कहा—'पशुमन्! यह नगर बहुत-से बालकोंसे भरा-पूरा रहा है, किंतु तुम्हारे दुरात्मा पुत्रने इसे प्रायः सूना कर दिया। अभी-अभी इन बालकोंको उसने जलमें डुबो दिया था, परंतु दैवयोगसे ये जीवित निकल आये हैं। बताओ, इस समय क्या करना चाहिये? मैं तुम्हींसे पूछता हूँ, क्योंकि तुम सदा धर्ममें तत्पर रहते हो।'

राजाके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ पशुमान्ने कहा—राजन्! जिसने सारे नगरको सूना कर दिया है, वह वधके ही योग्य है। इस विषयमें कुछ पूछनेकी बात ही नहीं है। यह अत्यन्त पापात्मा मेरा पुत्र नहीं, शत्रु ही है। जिसने इस नगरको बालकोंसे खाली कर दिया, उस दुष्टके उद्धारका मुझे कोई उपाय नहीं दिखायी देता। मैं सच कहता हूँ, इस दुष्टात्माको प्राणदण्ड दिया जाय। पशुमान्‌का यह वचन सुनकर समस्त पुरवासी पशुमान्‌की प्रशंसा करते हुए राजासे बोले—'महाराज! इस दुष्टको मारा न जाय अपितु चुपचाप नगरसे निकाल दिया जाय।' तब राजाने दुष्पण्यको बुलाकर कहा—'ओ दुष्टात्मन्! तू शीघ्र हमारे राज्यसे बाहर चला जा। यदि यहाँ रहेगा, तो मैं तेरा वध कर डालूँगा।' इस प्रकार डाँट बताकर राजाने दूतोंद्वारा उसे नगरसे निर्वासित कर दिया।

तदनन्तर दुष्पण्य भयभीत हो उस देशको छोड़कर मुनिमण्डलीसे युक्त वनमें चला गया। वहाँ जाकर भी उसने एक मुनिके बालकको जलमें डुबो दिया। कुछ बालक खेलनेके लिये गये हुए थे, उन्होंने उस बालकको मरा हुआ देख अत्यन्त दुःखी हो उसके पितासे यह समाचार कहा। तब उग्रश्रवाने बालकोंसे अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुनकर तपके प्रभावसे दुष्पण्यके चरित्रको जान लिया और उसे शाप देते हुए कहा—'अरे, तूने मेरे पुत्रको पानीमें फेंककर मार डाला है, इसलिये तेरी मृत्यु भी जलमें ही डूबनेसे होगी और मरनेके बाद तू दीर्घकालतक पिशाच बना रहेगा।' यह शाप सुनकर दुष्पण्यको बड़ा दुःख हुआ तथा वह उस वनको छोड़कर सिंह आदि क्रूर जन्तुओंसे युक्त दूसरे भयंकर वनमें चला गया। वहाँ बड़े जोरकी वर्षा और आँधी चलने लगी। दुष्पण्यने देखा एक मरे हुए हाथीका सूखा कंकाल पड़ा है। उस समय आँधी और प्रचण्ड वर्षाके कष्टको न सह सकनेके कारण वह उस हाथीके पेटकी गुफामें घुस गया।

फिर बड़ी भारी वर्षा हुई। जलका महान् प्रवाह हाथीके पेटमें भी भर गया। हाथीका शव उस महाप्रवाहमें बहते-बहते समुद्रमें चला गया। दुष्पण्य उस जलमें डूबकर क्षणभरमें प्राणहीन हो गया। मृत्युके बाद उसे पिशाचकी योनि मिली। भूख-प्याससे पीड़ित होकर वह भयानक रूपधारी पिशाच अनेक प्रकारके दुःख सहता हुआ गहन वनमें रहने लगा। एक वनसे दूसरे वनमें दौड़ता और कष्ट भोगता हुआ वह क्रमशः दण्डकारण्यमें आया। वहाँ उसने उच्चस्वरसे पुकार लगायी—'हे तपस्वी महात्माओ! आपलोग बड़े कृपालु और सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। मैं दुःखसे अत्यन्त पीड़ित हूँ। अतः मुझे अपनी दयादृष्टिसे अनुगृहीत करें। पूर्वकालमें मैं पाटलिपुत्र नगरमें पशुमान्‌का पुत्र दुष्पण्य नामक वैश्य था। उस समय मैंने बहुत-से बालकोंकी हत्या की। अब मैं पिशाचयोनिको प्राप्त हुआ हूँ। भूख-प्यास सहन करनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी है। अतः आपलोग कृपा करके मेरी रक्षा करें। तपोधनो! जिस प्रकार मैं पिशाचयोनिसे छूट जाऊँ वैसा प्रयत्न कीजिये।'

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