संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५१
पिशाचका यह वचन सुनकर तपस्वी मुनियोंने महर्षि अगस्त्यजीसे कहा—'भगवन्! इस पिशाचके उद्धारका कोई उपाय बतलावें।' तब अगस्त्यजीने अपने प्रिय शिष्य सुतीक्ष्णको बुलाकर कहा—'वत्स सुतीक्ष्ण! तुम शीघ्र गन्धमादन पर्वतपर चले जाओ। वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला महान् अग्नितीर्थ है। महामते! इस पिशाचके उद्धारके उद्देश्यसे तुम उस तीर्थमें स्नान करो।' अगस्त्यजीके ऐसा कहनेपर सुतीक्ष्णजी गन्धमादन पर्वतपर गये और अग्नितीर्थमें जाकर पिशाचके लिये स्नानका संकल्प करके वहाँ उन्होंने तीन दिनतक नियमपूर्वक स्नान किया। फिर रामनाथ आदि तीर्थोंका सेवन और स्नान करके श्रेष्ठ ब्राह्मण सुतीक्ष्णजी अपने आश्रमपर लौट आये। उस तीर्थमें स्नानके प्रभावसे वह पिशाच शीघ्र ही दिव्य देहको प्राप्त हुआ और सुतीक्ष्ण, अगस्त्य तथा अन्य तपोधनोंको बार-बार प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चला गया।
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चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ और यमुना, गंगा एवं गयातीर्थकी महिमा—राजा जानश्रुतिको रैक्वके उपदेशसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति
अग्नितीर्थमें स्नान करके शुद्धात्मा पुरुष सब पातकोंका नाश करनेवाले चक्रतीर्थकी यात्रा करे। जिस-जिस कामनाके उद्देश्यसे मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करता है, उस-उसको वह प्राप्त कर लेता है। पूर्वकालमें कठोर नियमोंका पालन करनेवाले 'अहिर्बुध्न्य' नामक तपस्वी महर्षि इस गन्धमादन तीर्थमें सुदर्शनचक्रकी उपासना करते थे। वहाँ तपस्या करते हुए मुनिको भयानक-रूपधारी राक्षस सताते और उनकी तपस्यामें विघ्न डाला करते थे। तब भक्तकी रक्षा करनेके लिये सुदर्शन चक्रने आकर बाधा देनेवाले उन समस्त राक्षसोंको लीलापूर्वक मार डाला। भक्तकी प्रार्थनासे वह चक्र उसी तीर्थमें रहने लगा। तभीसे उसका नाम चक्रतीर्थ हो गया। उस तीर्थमें स्नान करनेपर सुदर्शन चक्रके प्रसादसे राक्षस और पिशाच आदिकी पीड़ा कभी नहीं होती।
श्यामलापुरमें हरिहर नामक एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे एक दिन वनमें गये। वहाँ एक वनवासी व्याध मनोरंजनके लिये लक्ष्य-भेदन कर रहा था। हरिहर बाबा उसके बाणोंके लक्ष्यमें आ गये और उनके दोनों पैर कट गये। तब मुनियोंकी प्रेरणासे वे गन्धमादन पर्वतपर पहुँचाये गये और वहाँ इस तीर्थमें स्नान करनेपर उनके दोनों पैर पुनः ज्यों-के-त्यों हो गये। तबसे यह पुण्यतीर्थ मुनितीर्थ कहलाता था। आगे चलकर चक्रके नामसे यह चक्रतीर्थ कहलाने लगा। जिनके हाथ, पैर या अन्य कोई अंग कट गये हों, वे उस कटे हुए अंगकी पूर्तिके लिये सर्वमनोरथदायक इस चक्रतीर्थका सेवन करें। इस प्रकार यह चक्रतीर्थका प्रभाव बतलाया गया।
चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य शिवतीर्थको जाय, जहाँ स्नान करनेसे कोटि-कोटि महापातक नष्ट हो जाते हैं। महापातकोंके संसर्गसे होनेवाले पाप भी उसी क्षण दूर हो जाते हैं। शिवतीर्थ महान् दुःखों और नरकके क्लेशोंका निवारण करनेवाला है तथा स्वर्ग और मोक्षको देनेवाला है।
शिवतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् अपने पापसमुदायकी शान्तिके लिये शंखतीर्थकी यात्रा करे, जिसमें स्नान करनेमात्रसे कृतघ्न पुरुष भी पापमुक्त हो जाता है। पूर्वकालमें गन्धमादन पर्वतपर शंख नामक मुनि निवास करते थे। वे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए तपस्यामें