संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संलग्न रहते थे। उन्होंने वहाँ स्नान करनेके लिये उत्तम तीर्थका निर्माण किया। शंखसे निर्मित होनेके कारण उसे शंखतीर्थ कहते हैं। उसमें स्नान करनेसे माता-पिता और गुरुसे द्रोह करनेवाले पापी तथा अन्य कृतघ्न भी मुक्त हो जाते हैं। इस कारण कृतघ्न मनुष्योंको इस तीर्थका अवश्य सेवन करना चाहिये। जो माता-पिताका पालन नहीं करता और गुरुदक्षिणा नहीं देता, वह कृतघ्नताको प्राप्त होता है। स्वयं ही चितामें जल मरना उसका प्रायश्चित्त है। परंतु इस शंखतीर्थमें स्नानमात्रसे ही उस कृतघ्नताका भी प्रायश्चित्त हो जाता है।
शंखतीर्थमें स्नान करके मनुष्य क्रमशः यमुना, गंगा और गया आदि तीर्थोंकी यात्रा करे। ये तीनों तीर्थ मनुष्योंके महापातकोंका नाश करनेवाले, परम पवित्र हैं और समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा समस्त विघ्नों तथा रोगोंका निवारण हो जाता है। ये तीर्थ अज्ञानका नाश और ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। पूर्वकालमें महाराज जानश्रुतिने इन्हीं तीर्थोंमें स्नान करके द्विजश्रेष्ठ रैक्वसे उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था।
महर्षि रैक्व पहले गन्धमादन पर्वतपर रहकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या करते थे। वे जन्मसे ही पंगु थे। अतः गन्धमादन पर्वतपर जो-जो तीर्थ हैं, वे उन्हींकी यात्रा करते थे; क्योंकि वे सब समीपवर्ती थे। पैदल न चल सकनेके कारण वे गाड़ीसे ही उन तीर्थोंमें जाते थे। इसीलिये गाड़ीवाले रैक्वके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने तपस्यासे अपना शरीर सुखा डाला था। उनके उस शरीरमें खाज हो गयी थी, जिसे वे दिन-रात खुजलाते रहते थे। फिर भी उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। एक दिन उनके मनमें ऐसा विचार हुआ कि 'मैं यमुना, गंगा और गया—इन तीनों पवित्र तीर्थोंमें स्नान करूँ; परंतु मैं तो जन्मसे ही पंगु हूँ, अतः मेरे लिये वहाँका स्नान दुर्लभ है। गाड़ीसे इतनी दूरकी यात्रा नहीं की जा सकती। तब इस समय मैं क्या करूँ?' इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए महाबुद्धिमान् रैक्वने तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका निश्चय किया। उन्होंने सोचा—'मेरा तपोबल दुर्धर्ष एवं असह्य है, उसीके द्वारा मैं यहाँ उक्त तीर्थोंका आवाहन करूँगा।' मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वे पूर्वाभिमुख बैठे, मन-इन्द्रियोंको संयममें रखकर तीन बार आचमन किया और एक क्षणतक ध्यानमें लगे रहे। उनके मन्त्रके प्रभावसे महानदी यमुना, गंगा और पापनाशिनी गया—तीनों भूमि फोड़कर सहसा पातालसे प्रकट हुईं और मानव-शरीर धारणकर गाड़ीवाले रैक्वके समीप आ उन्हें प्रसन्न करती हुई प्रसन्नतापूर्वक बोलीं—'रैक्व ! तुम्हारा कल्याण हो, इस ध्यानसे निवृत्त होओ। तुम्हारे मन्त्रसे आकृष्ट हो हम तीनों यहाँ उपस्थित हुई हैं।'
उनका यह वचन सुनकर महामुनि रैक्व ध्यानसे निवृत्त हुए और उन्हें अपने सामने उपस्थित देखा। तब उन्होंने उन तीनोंका पूजन करके कहा—'हे यमुने ! हे देवि गंगे ! और हे पापनाशिनी गये ! तुम तीनों गन्धमादन पर्वतपर वहीं निवास करो, जहाँ भूमि फोड़कर यहाँ प्रकट हुई हो। वे स्थान तुम्हारे नामसे पवित्र तीर्थ हो जायँ।' तब वे तीनों देवियाँ 'तथास्तु' कहकर सहसा अन्तर्धान हो गयीं। तबसे ये तीनों तीर्थ भूतलमें मनुष्योंद्वारा उन्हींके नामसे पुकारे जाते हैं। जहाँ भूमि फोड़कर यमुना निकली, उसी स्थानको लोग 'यमुनातीर्थ' कहते हैं, जहाँ पृथ्वीके छिद्रसे सहसा गंगाका प्रादुर्भाव हुआ, वह स्थान लोकमें पापनाशक 'गंगातीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ और जहाँ गयाका प्रादुर्भाव हुआ, वह भूमि-विवर 'गयातीर्थ' कहलाता है। इस प्रकार वे तीनों तीर्थ बड़े पवित्र हैं। जो मनुष्य इन उत्तम तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके अज्ञानका नाश और ज्ञानका उदय होता है। रैक्व मुनि अपने मन्त्रद्वारा आकर्षित किये हुए उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करते हुए समय व्यतीत करने लगे।
इसी समय महाराज जानश्रुति इस भूतलपर