संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५३
राज्य करते थे। वे राजर्षि पुत्रके पौत्र थे और एकमात्र धर्मके आचरणमें ही संलग्न रहते थे। याचकोंको श्रद्धापूर्वक अन्न आदि देते थे। अतः मुनिलोग उन्हें लोकमें 'श्रद्धादेय' कहते थे। भूखे याचकोंकी तृप्तिके लिये उस अन्न-धन-सम्पन्न राजाके यहाँ नाना प्रकारके वचन कहे जाते थे, इसलिये सब याचकोंने उनका नाम 'बहुवाक्य' रख दिया था। जनश्रुतके पुत्र महाबली जानश्रुतिको अतिथि बहुत प्रिय थे। इसलिये वे बहुत दान करनेके कारण 'बहुदायी' के नामसे प्रसिद्ध हुए। नगरोंमें, राज्यमें, गाँवों और जंगलोंमें, चौराहोंपर तथा सभी बड़े-बड़े मार्गोंमें उनकी ओरसे खाने-पीनेकी बहुत सामग्री प्रस्तुत रहती थी। अतिथियोंकी तृप्तिके लिये वे अन्न, पान, दाल, साग आदि उत्तम भोजनकी व्यवस्था रखते थे। उस पौत्रायण राजाके गुणोंसे महाभाग देवर्षि बहुत सन्तुष्ट हुए। उन सबके मनमें राजाके ऊपर कृपा करनेकी इच्छा हुई। एक दिन राजा जानश्रुति गरमीकी रातमें अपने महलके भीतर खिड़कीके पास सो रहे थे। उसी समय देवर्षिगण हंसका रूप धारण करके एक पंक्तिमें आकाशमार्गसे उड़ते हुए आये और राजाके ऊपर होकर जाने लगे। उस समय बड़े वेगसे उड़ते हुए एक हंसने आगे जानेवाले हंसको सम्बोधित करके राजाको सुनाते हुए उपहासपूर्वक कहा—'भल्लाक्ष! अरे ओ भल्लाक्ष! क्या आगे-आगे जाता हुआ तू अन्धोंकी नाईं देखता नहीं है कि आगे पूजनीय राजा जानश्रुति विराजमान हैं? यदि तू उन राजर्षिको लाँघकर ऊपर जायगा, तो उनका तेज इस समय तुझे जलाकर भस्म कर डालेगा।' ऐसा कहते हुए उस हंसको आगे जानेवाले हंसने उत्तर दिया—'अहो! तुम तो बड़े ज्ञानी हो, विद्वानोंके द्वारा भी प्रशंसनीय हो, तथापि इस तुच्छ मनुष्यकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हो? यह धर्मोंके रहस्यको नहीं जानता, जैसा कि ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ गाड़ीवाले रैक्व मुनि जानते हैं। इस राजाका तेज उनके समान नहीं है। रैक्वकी पुण्यराशियोंकी इयत्ता (संख्या) नहीं हो सकती। पृथ्वीके धूलिकण गिने जा सकते हैं, आकाशके नक्षत्र भी गणनामें आ सकते हैं, परंतु रैक्व मुनिके महामेरु-सदृश पुण्यपुंजोंकी गणना नहीं की जा सकती। राजा जानश्रुतिमें तो वैसा धर्म ही नहीं है, फिर वह ज्ञान-वैभव कहाँसे हो सकता है। अतः इस तुच्छ मनुष्यकी चर्चा छोड़कर उसी गाड़ीवाले रैक्व मुनिकी प्रशंसा करो। उन्होंने जन्मसे पंगु होकर भी स्नान करनेकी इच्छासे मन्त्रद्वारा यमुना, गंगा और गयाको भी अपने आश्रमके समीप बुला लिया है।'
आगे जानेवाला हंस जब ऐसा कहकर चुप हो गया, तब वे हंसरूपधारी देवर्षि पुनः ब्रह्मलोकको चले गये। तदनन्तर पौत्रायण राजा जानश्रुति रैक्व मुनिको उन्नतिकी चरम सीमापर पहुँचे हुए सुनकर बहुत उदास हो गये और बारंबार लंबी साँस खींचते हुए विचार करने लगे—'उस हंसने रैक्वको ऊँचा बताते हुए मुझे तुच्छ कहा था। अहो! रैक्वकी कैसी महिमा है? अब मैं संसार तथा समूचे राज्यको छोड़कर गाड़ीवाले महात्मा रैक्वकी शरणमें जाता हूँ। वे कृपानिधान मुनि अपनी शरणमें आये हुए मुझे अपनाकर आत्मज्ञानका उपदेश देंगे।' रात्रि बीतनेपर महाराज जानश्रुतिने सारथीको बुलाकर कहा—'सूत! तुम तीव्रगामी रथपर आरूढ़ हो शीघ्र जाओ और महर्षियोंके आश्रमों, पवित्र वनों, एकान्त प्रदेशों, सत्पुरुषोंके निवासस्थानों, तीर्थों, नदी-तटों तथा अन्यान्य स्थानोंमें, जहाँ मुनीश्वर लोग रहते हैं, योगीश्वर रैक्वका पता लगाओ। वे जन्मसे पंगु हैं, गाड़ीपर बैठे रहते हैं, सब धर्मोंके एकमात्र आश्रय हैं और ब्रह्मज्ञानकी निधि हैं। मेरी प्रसन्नताके लिये उनका शीघ्र अन्वेषण करके पुनः मेरे पास लौट आओ।'
'बहुत अच्छा' कहकर सारथी वेगवान् रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। उसने ब्रह्मज्ञानी