भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 583, कुल 1406 में से

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रैकव मुनिकी सर्वत्र खोज की। अनेकों स्थानोंमें ढूँढ़नेके पश्चात् वह क्रमशः महर्षियोंसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ खोजते-खोजते उसने मुनीश्वर रैकवको देखा, जो गाड़ीपर बैठकर अपनी खाज खुजला रहे थे। वे कलारहित अद्वैत ब्रह्मके चिन्तनमें संलग्न थे। गाड़ीसहित उस महामुनिको देखकर सारथीने पहचान लिया कि यही रैकव हैं। तब उनके पास जाकर उसने प्रणाम किया और उनके समीप बैठकर विनयपूर्वक पूछा—'ब्रह्मन्! क्या आप ही गाड़ीवाले रैकव नामसे विख्यात हैं?' मुनि बोले—'हाँ, मैं ही गाड़ीवाला रैकव हूँ।' मुनिका यह वचन सुनकर सारथी गन्धमादन पर्वतसे लौटा और राजाके पास पहुँचकर उसने सब समाचार निवेदन किया। तब राजा जानश्रुति छः सौ गौएँ, धन और स्वर्णमुद्राओंका भार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ अपने साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक रैकव मुनिके समीप चले। वहाँ पहुँचकर राजाने रैकवसे कहा—'भगवन्! मेरी दी हुई ये सब वस्तुएँ स्वीकार कीजिये। इन सबको लेकर मेरे लिये अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश कीजिये।' तब गाड़ीवाले रैकवने राजा जानश्रुतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'राजन्! ये गौएँ, यह सोनेका भार और यह रथ सब तुम्हारे ही पास रहें, मैं तो बहुत कल्पोंतक जीवित रहनेवाला हूँ। इस धनके द्वारा मेरा कौन-सा लाभ होगा?'

रैकवका यह वचन सुनकर जानश्रुतिने कहा—ब्रह्मन्! आपके द्वारा उपदेश किये जानेवाले ब्रह्मज्ञानका मूल्य नहीं है। आप ये गाय, धन और रथ ग्रहण करें या न करें, किंतु मुझे निष्कल अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश अवश्य दें।

रैकव बोले—जिसका संसारमें वैराग्य हो और जिसके पुण्य-पापरूप प्रारब्धका विनाश हो जाय, वही ज्ञानके उपदेशका भागी है। यद्यपि तुम्हें संसारसे वैराग्य हो गया है तथापि अभी तुम्हारे पुण्य-पापोंका विनाश नहीं हुआ है। यहाँपर तीन पवित्र तीर्थ हैं, जो समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले हैं। उनके नाम हैं—यमुनातीर्थ, गंगातीर्थ और गयातीर्थ। इन तीनोंमें तुम शीघ्र स्नान करो। इससे तुम्हारे सब प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जायगा और अन्तःकरण शुद्ध होगा। तब मैं तुमको ज्ञानका उपदेश करूँगा।'

रैकव मुनिके ऐसा कहनेपर राजाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उन्होंने शीघ्रतापूर्वक तीनों तीर्थोंमें स्नान किया। उस स्नानमात्रसे उनका चित्त शुद्ध हो गया। तब वे अपने गुरु रैकव मुनिके पास आये। रैकवने जानश्रुतिको कृपापूर्वक ज्ञानका उपदेश दिया। उपदेश प्राप्त होनेपर राजा अबाधित अनुभवसे सम्पन्न हो योगी रैकवके प्रसादसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये।


कोटितीर्थकी महिमा — भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, कंसवध तथा श्रीकृष्णका कोटितीर्थमें स्नान

श्रीसूतजी कहते हैं—यमुना, गंगा और गया तीर्थमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करके 'कोटितीर्थ' की यात्रा करे। वह महापुण्यमय तीर्थ सब लोकोंमें विख्यात है। दुःस्वप्न, महापातक और बड़े-बड़े विघ्नोंका नाश करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणको मारकर गन्धमादन पर्वतपर लोकानुग्रहके लिये एक शिवलिंगकी स्थापना की। उस लिंगका अभिषेक करनेके लिये वे शुद्ध जल ढूँढ़ने लगे। किंतु वैसा जल उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। तब रघुनाथजीने मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करते हुए धनुषकी कोटिसे शीघ्र ही पृथ्वीको विदीर्ण किया। श्रीरामके धनुषकी वह कोटि रसातलतक पहुँच गयी। फिर उन्होंने धनुषको

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