संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
संलग्न रहते थे। उन्होंने वहाँ स्नान करनेके लिये उत्तम तीर्थका निर्माण किया। शंखसे निर्मित होनेके कारण उसे शंखतीर्थ कहते हैं। उसमें स्नान करनेसे माता-पिता और गुरुसे द्रोह करनेवाले पापी तथा अन्य कृतघ्न भी मुक्त हो जाते हैं। इस कारण कृतघ्न मनुष्योंको इस तीर्थका अवश्य सेवन करना चाहिये। जो माता-पिताका पालन नहीं करता और गुरुदक्षिणा नहीं देता, वह कृतघ्नताको प्राप्त होता है। स्वयं ही चितामें जल मरना उसका प्रायश्चित्त है। परंतु इस शंखतीर्थमें स्नानमात्रसे ही उस कृतघ्नताका भी प्रायश्चित्त हो जाता है।
शंखतीर्थमें स्नान करके मनुष्य क्रमशः यमुना, गंगा और गया आदि तीर्थोंकी यात्रा करे। ये तीनों तीर्थ मनुष्योंके महापातकोंका नाश करनेवाले, परम पवित्र हैं और समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा समस्त विघ्नों तथा रोगोंका निवारण हो जाता है। ये तीर्थ अज्ञानका नाश और ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। पूर्वकालमें महाराज जानश्रुतिने इन्हीं तीर्थोंमें स्नान करके द्विजश्रेष्ठ रैक्वसे उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था।
महर्षि रैक्व पहले गन्धमादन पर्वतपर रहकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या करते थे। वे जन्मसे ही पंगु थे। अतः गन्धमादन पर्वतपर जो-जो तीर्थ हैं, वे उन्हींकी यात्रा करते थे; क्योंकि वे सब समीपवर्ती थे। पैदल न चल सकनेके कारण वे गाड़ीसे ही उन तीर्थोंमें जाते थे। इसीलिये गाड़ीवाले रैक्वके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने तपस्यासे अपना शरीर सुखा डाला था। उनके उस शरीरमें खाज हो गयी थी, जिसे वे दिन-रात खुजलाते रहते थे। फिर भी उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। एक दिन उनके मनमें ऐसा विचार हुआ कि 'मैं यमुना, गंगा और गया—इन तीनों पवित्र तीर्थोंमें स्नान करूँ; परंतु मैं तो जन्मसे ही पंगु हूँ, अतः मेरे लिये वहाँका स्नान दुर्लभ है। गाड़ीसे इतनी दूरकी यात्रा नहीं की जा सकती। तब इस समय मैं क्या करूँ?' इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए महाबुद्धिमान् रैक्वने तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका निश्चय किया। उन्होंने सोचा—'मेरा तपोबल दुर्धर्ष एवं असह्य है, उसीके द्वारा मैं यहाँ उक्त तीर्थोंका आवाहन करूँगा।' मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वे पूर्वाभिमुख बैठे, मन-इन्द्रियोंको संयममें रखकर तीन बार आचमन किया और एक क्षणतक ध्यानमें लगे रहे। उनके मन्त्रके प्रभावसे महानदी यमुना, गंगा और पापनाशिनी गया—तीनों भूमि फोड़कर सहसा पातालसे प्रकट हुईं और मानव-शरीर धारणकर गाड़ीवाले रैक्वके समीप आ उन्हें प्रसन्न करती हुई प्रसन्नतापूर्वक बोलीं—'रैक्व ! तुम्हारा कल्याण हो, इस ध्यानसे निवृत्त होओ। तुम्हारे मन्त्रसे आकृष्ट हो हम तीनों यहाँ उपस्थित हुई हैं।'
उनका यह वचन सुनकर महामुनि रैक्व ध्यानसे निवृत्त हुए और उन्हें अपने सामने उपस्थित देखा। तब उन्होंने उन तीनोंका पूजन करके कहा—'हे यमुने ! हे देवि गंगे ! और हे पापनाशिनी गये ! तुम तीनों गन्धमादन पर्वतपर वहीं निवास करो, जहाँ भूमि फोड़कर यहाँ प्रकट हुई हो। वे स्थान तुम्हारे नामसे पवित्र तीर्थ हो जायँ।' तब वे तीनों देवियाँ 'तथास्तु' कहकर सहसा अन्तर्धान हो गयीं। तबसे ये तीनों तीर्थ भूतलमें मनुष्योंद्वारा उन्हींके नामसे पुकारे जाते हैं। जहाँ भूमि फोड़कर यमुना निकली, उसी स्थानको लोग 'यमुनातीर्थ' कहते हैं, जहाँ पृथ्वीके छिद्रसे सहसा गंगाका प्रादुर्भाव हुआ, वह स्थान लोकमें पापनाशक 'गंगातीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ और जहाँ गयाका प्रादुर्भाव हुआ, वह भूमि-विवर 'गयातीर्थ' कहलाता है। इस प्रकार वे तीनों तीर्थ बड़े पवित्र हैं। जो मनुष्य इन उत्तम तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके अज्ञानका नाश और ज्ञानका उदय होता है। रैक्व मुनि अपने मन्त्रद्वारा आकर्षित किये हुए उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करते हुए समय व्यतीत करने लगे।
इसी समय महाराज जानश्रुति इस भूतलपर
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५३
राज्य करते थे। वे राजर्षि पुत्रके पौत्र थे और एकमात्र धर्मके आचरणमें ही संलग्न रहते थे। याचकोंको श्रद्धापूर्वक अन्न आदि देते थे। अतः मुनिलोग उन्हें लोकमें 'श्रद्धादेय' कहते थे। भूखे याचकोंकी तृप्तिके लिये उस अन्न-धन-सम्पन्न राजाके यहाँ नाना प्रकारके वचन कहे जाते थे, इसलिये सब याचकोंने उनका नाम 'बहुवाक्य' रख दिया था। जनश्रुतके पुत्र महाबली जानश्रुतिको अतिथि बहुत प्रिय थे। इसलिये वे बहुत दान करनेके कारण 'बहुदायी' के नामसे प्रसिद्ध हुए। नगरोंमें, राज्यमें, गाँवों और जंगलोंमें, चौराहोंपर तथा सभी बड़े-बड़े मार्गोंमें उनकी ओरसे खाने-पीनेकी बहुत सामग्री प्रस्तुत रहती थी। अतिथियोंकी तृप्तिके लिये वे अन्न, पान, दाल, साग आदि उत्तम भोजनकी व्यवस्था रखते थे। उस पौत्रायण राजाके गुणोंसे महाभाग देवर्षि बहुत सन्तुष्ट हुए। उन सबके मनमें राजाके ऊपर कृपा करनेकी इच्छा हुई। एक दिन राजा जानश्रुति गरमीकी रातमें अपने महलके भीतर खिड़कीके पास सो रहे थे। उसी समय देवर्षिगण हंसका रूप धारण करके एक पंक्तिमें आकाशमार्गसे उड़ते हुए आये और राजाके ऊपर होकर जाने लगे। उस समय बड़े वेगसे उड़ते हुए एक हंसने आगे जानेवाले हंसको सम्बोधित करके राजाको सुनाते हुए उपहासपूर्वक कहा—'भल्लाक्ष! अरे ओ भल्लाक्ष! क्या आगे-आगे जाता हुआ तू अन्धोंकी नाईं देखता नहीं है कि आगे पूजनीय राजा जानश्रुति विराजमान हैं? यदि तू उन राजर्षिको लाँघकर ऊपर जायगा, तो उनका तेज इस समय तुझे जलाकर भस्म कर डालेगा।' ऐसा कहते हुए उस हंसको आगे जानेवाले हंसने उत्तर दिया—'अहो! तुम तो बड़े ज्ञानी हो, विद्वानोंके द्वारा भी प्रशंसनीय हो, तथापि इस तुच्छ मनुष्यकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हो? यह धर्मोंके रहस्यको नहीं जानता, जैसा कि ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ गाड़ीवाले रैक्व मुनि जानते हैं। इस राजाका तेज उनके समान नहीं है। रैक्वकी पुण्यराशियोंकी इयत्ता (संख्या) नहीं हो सकती। पृथ्वीके धूलिकण गिने जा सकते हैं, आकाशके नक्षत्र भी गणनामें आ सकते हैं, परंतु रैक्व मुनिके महामेरु-सदृश पुण्यपुंजोंकी गणना नहीं की जा सकती। राजा जानश्रुतिमें तो वैसा धर्म ही नहीं है, फिर वह ज्ञान-वैभव कहाँसे हो सकता है। अतः इस तुच्छ मनुष्यकी चर्चा छोड़कर उसी गाड़ीवाले रैक्व मुनिकी प्रशंसा करो। उन्होंने जन्मसे पंगु होकर भी स्नान करनेकी इच्छासे मन्त्रद्वारा यमुना, गंगा और गयाको भी अपने आश्रमके समीप बुला लिया है।'
आगे जानेवाला हंस जब ऐसा कहकर चुप हो गया, तब वे हंसरूपधारी देवर्षि पुनः ब्रह्मलोकको चले गये। तदनन्तर पौत्रायण राजा जानश्रुति रैक्व मुनिको उन्नतिकी चरम सीमापर पहुँचे हुए सुनकर बहुत उदास हो गये और बारंबार लंबी साँस खींचते हुए विचार करने लगे—'उस हंसने रैक्वको ऊँचा बताते हुए मुझे तुच्छ कहा था। अहो! रैक्वकी कैसी महिमा है? अब मैं संसार तथा समूचे राज्यको छोड़कर गाड़ीवाले महात्मा रैक्वकी शरणमें जाता हूँ। वे कृपानिधान मुनि अपनी शरणमें आये हुए मुझे अपनाकर आत्मज्ञानका उपदेश देंगे।' रात्रि बीतनेपर महाराज जानश्रुतिने सारथीको बुलाकर कहा—'सूत! तुम तीव्रगामी रथपर आरूढ़ हो शीघ्र जाओ और महर्षियोंके आश्रमों, पवित्र वनों, एकान्त प्रदेशों, सत्पुरुषोंके निवासस्थानों, तीर्थों, नदी-तटों तथा अन्यान्य स्थानोंमें, जहाँ मुनीश्वर लोग रहते हैं, योगीश्वर रैक्वका पता लगाओ। वे जन्मसे पंगु हैं, गाड़ीपर बैठे रहते हैं, सब धर्मोंके एकमात्र आश्रय हैं और ब्रह्मज्ञानकी निधि हैं। मेरी प्रसन्नताके लिये उनका शीघ्र अन्वेषण करके पुनः मेरे पास लौट आओ।'
'बहुत अच्छा' कहकर सारथी वेगवान् रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। उसने ब्रह्मज्ञानी
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रैकव मुनिकी सर्वत्र खोज की। अनेकों स्थानोंमें ढूँढ़नेके पश्चात् वह क्रमशः महर्षियोंसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ खोजते-खोजते उसने मुनीश्वर रैकवको देखा, जो गाड़ीपर बैठकर अपनी खाज खुजला रहे थे। वे कलारहित अद्वैत ब्रह्मके चिन्तनमें संलग्न थे। गाड़ीसहित उस महामुनिको देखकर सारथीने पहचान लिया कि यही रैकव हैं। तब उनके पास जाकर उसने प्रणाम किया और उनके समीप बैठकर विनयपूर्वक पूछा—'ब्रह्मन्! क्या आप ही गाड़ीवाले रैकव नामसे विख्यात हैं?' मुनि बोले—'हाँ, मैं ही गाड़ीवाला रैकव हूँ।' मुनिका यह वचन सुनकर सारथी गन्धमादन पर्वतसे लौटा और राजाके पास पहुँचकर उसने सब समाचार निवेदन किया। तब राजा जानश्रुति छः सौ गौएँ, धन और स्वर्णमुद्राओंका भार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ अपने साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक रैकव मुनिके समीप चले। वहाँ पहुँचकर राजाने रैकवसे कहा—'भगवन्! मेरी दी हुई ये सब वस्तुएँ स्वीकार कीजिये। इन सबको लेकर मेरे लिये अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश कीजिये।' तब गाड़ीवाले रैकवने राजा जानश्रुतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'राजन्! ये गौएँ, यह सोनेका भार और यह रथ सब तुम्हारे ही पास रहें, मैं तो बहुत कल्पोंतक जीवित रहनेवाला हूँ। इस धनके द्वारा मेरा कौन-सा लाभ होगा?'
रैकवका यह वचन सुनकर जानश्रुतिने कहा—ब्रह्मन्! आपके द्वारा उपदेश किये जानेवाले ब्रह्मज्ञानका मूल्य नहीं है। आप ये गाय, धन और रथ ग्रहण करें या न करें, किंतु मुझे निष्कल अद्वैत ब्रह्मज्ञानका उपदेश अवश्य दें।
रैकव बोले—जिसका संसारमें वैराग्य हो और जिसके पुण्य-पापरूप प्रारब्धका विनाश हो जाय, वही ज्ञानके उपदेशका भागी है। यद्यपि तुम्हें संसारसे वैराग्य हो गया है तथापि अभी तुम्हारे पुण्य-पापोंका विनाश नहीं हुआ है। यहाँपर तीन पवित्र तीर्थ हैं, जो समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले हैं। उनके नाम हैं—यमुनातीर्थ, गंगातीर्थ और गयातीर्थ। इन तीनोंमें तुम शीघ्र स्नान करो। इससे तुम्हारे सब प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जायगा और अन्तःकरण शुद्ध होगा। तब मैं तुमको ज्ञानका उपदेश करूँगा।'
रैकव मुनिके ऐसा कहनेपर राजाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उन्होंने शीघ्रतापूर्वक तीनों तीर्थोंमें स्नान किया। उस स्नानमात्रसे उनका चित्त शुद्ध हो गया। तब वे अपने गुरु रैकव मुनिके पास आये। रैकवने जानश्रुतिको कृपापूर्वक ज्ञानका उपदेश दिया। उपदेश प्राप्त होनेपर राजा अबाधित अनुभवसे सम्पन्न हो योगी रैकवके प्रसादसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये।
कोटितीर्थकी महिमा — भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, कंसवध तथा श्रीकृष्णका कोटितीर्थमें स्नान
श्रीसूतजी कहते हैं—यमुना, गंगा और गया तीर्थमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करके 'कोटितीर्थ' की यात्रा करे। वह महापुण्यमय तीर्थ सब लोकोंमें विख्यात है। दुःस्वप्न, महापातक और बड़े-बड़े विघ्नोंका नाश करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणको मारकर गन्धमादन पर्वतपर लोकानुग्रहके लिये एक शिवलिंगकी स्थापना की। उस लिंगका अभिषेक करनेके लिये वे शुद्ध जल ढूँढ़ने लगे। किंतु वैसा जल उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। तब रघुनाथजीने मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करते हुए धनुषकी कोटिसे शीघ्र ही पृथ्वीको विदीर्ण किया। श्रीरामके धनुषकी वह कोटि रसातलतक पहुँच गयी। फिर उन्होंने धनुषको
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पृथ्वीसे ऊपर निकाला। तब उसी मार्गसे पातालगंगा बाहर निकल आयीं। उसी जलसे श्रीरामचन्द्रजीने शिवलिंगका अभिषेक किया। श्रीरामचन्द्रजीकी धनुषकी कोटिसे उस तीर्थका निर्माण हुआ था, इसलिये वह तीनों लोकोंमें ‘कोटितीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ। गन्धमादन पर्वतपर जो-जो तीर्थ हैं, उन सबमें पहले स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य अवशिष्ट पापोंसे छूटनेके लिये कोटितीर्थमें स्नान करे। अन्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे भी जो पापसमुदाय नहीं नष्ट होता, वह अनेक कोटि जन्मोंका उपार्जित तथा शरीरकी हड्डियोंमें स्थित पापपुंज कोटितीर्थमें स्नान करनेसे पूर्णतः नष्ट हो जाता है। यदि कोई स्वेच्छानुसार कहीं जा रहा हो या तीर्थयात्रा करता हो और मार्गमें उसे कोई तीर्थ या देवालय मिल जाय, तो उसको देख या सुनकर भी जो मोहवश उसका सेवन नहीं करता, वह मनुष्य अधम है—ऐसा महर्षियोंका वचन है। इसलिये सेतुको जानेवाला पुरुष यदि वहाँके अन्य तीर्थोंमें स्नान नहीं करता, तो वह तीर्थोल्लंघनके दोषसे ब्राह्मणोंद्वारा बाहर कर देने योग्य है। अतः चक्रतीर्थ आदिमें अवश्य स्नान करना चाहिये। इन तीर्थोंमें स्नान करनेके पश्चात् शेष पापोंसे छुटकारा पानेके लिये मनुष्योंको कोटितीर्थमें स्नान करना चाहिये। पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजी उसमें स्नान करके उसी क्षण पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो वानरों तथा लक्ष्मण और सीताके साथ अयोध्याको चल दिये थे। अतः उन्हींकी भाँति कोटितीर्थमें स्नान करके शेष पापसे छूटा हुआ मनुष्य उसी क्षण वहाँ लौट आवे। यह श्रेष्ठ तीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध है। श्रीरामचन्द्रजीने भगवान् रामेश्वरका अभिषेक करनेके लिये उसका निर्माण किया था। साक्षात् भगवती गंगा उसमें निवास करती हैं तथा तारकब्रह्म श्रीरामने वहाँ स्नान किया है। उस कोटितीर्थकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है।
यदुवंशमें वसुदेव नामसे विख्यात एक क्षत्रिय थे, जो शूरसेनके पुत्र थे। उन्हीं दिनों भोजकुलमें देवककी एक पुत्री थी, जो देवकीके नामसे विख्यात थी। वसुदेवजी देवकीसे विवाह करके रथपर आरूढ़ हो अपने निवासस्थानको चले। उस समय उग्रसेनका पुत्र कंस वसुदेवका सारथि बनकर रथ हाँकने लगा। इतनेमें ही बहिन और बहनोईको ले जानेवाले कंसको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा—'शत्रुदमन कंस! जिस देवकीको तुम लिये जा रहे हो, उसका आठवाँ गर्भ तुम्हारा घातक होगा।' यह दिव्यवाणी सुनकर कंसने तलवार खींच ली और बहिनको मार डालनेका प्रयत्न किया। यह देख वसुदेवजीने कहा—'कंस! इससे जो सन्तानें पैदा होंगी, उन सबको मैं तुम्हें सौंप दूँगा। यह तुम्हारी बहिन है, इसको मत मारो। इससे तो तुम्हें कोई भय नहीं है।' यह सुनकर कंसने देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया और वसुदेव-देवकीके साथ अपने घरको लौटा। कंस बड़ा दुष्टात्मा था। उसने बहिन और बहनोई दोनोंके पैरोंमें बेड़ी डालकर कारागारमें कैद कर लिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर देवकीने वसुदेवजीसे क्रमशः छः पुत्रोंको जन्म दिया। उन सबको वसुदेवने कंसको अर्पित कर दिया और कंसने उनका वध कर डाला। इस प्रकार देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले छः पुत्रोंके मारे जानेपर सातवें गर्भके रूपमें साक्षात् भगवान् शेषने देवकीके उदरमें प्रवेश किया। उस समय भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मायादेवीने उस गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया। रोहिणी उन दिनों नन्दगोपके घरमें निवास करती थी। लोगोंमें यह बात फैल गयी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया। तदनन्तर स्वयं भगवान् विष्णुने आठवाँ गर्भ होकर देवकीकी कुक्षिमें प्रवेश किया। दस महीने बीत जानेपर अविनाशी भगवान् श्रीहरि
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देवकीके उदरसे प्रकट हुए, जो कृष्ण नामसे विख्यात हुए। जन्मके समय वे शंख, चक्र, गदा और खड्गसे सुशोभित चतुर्भुजरूपमें दृष्टिगोचर हुए। उनके मस्तकपर किरीट और गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी। वे माता-पिताके शोकका नाश करनेवाले थे। सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरिको देखकर वसुदेवजीने उनका स्तवन किया।
वसुदेवजी बोले—प्रभो! आप ही सम्पूर्ण विश्वके रूपमें विराजमान हैं। आप ही इस विश्वके पालक हैं, इसकी उत्पत्तिके स्थान भी आप ही हैं, यह सम्पूर्ण विश्व आपमें ही स्थित है। भगवन्! आप ही प्रकृति, महत्तत्त्व, विराट्, स्वराट् और सम्राट् सब कुछ हैं। इस प्रकार आपका तेज सम्पूर्ण जगत्का कारणभूत है, आपके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है। आप साक्षात् नारायण हैं। आपको नमस्कार है। आप शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। अत्यन्त मनोरम रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करनेवाले वसुदेवको और देवी देवकीको भी प्रसन्न करते हुए भगवान् श्रीहरिने कहा—'माता और पिताजी! आप दोनों भयभीत न हों, मैं कंसका वध करूँगा। नन्दगोपकी पत्नी यशोदाने एक पुत्रीको जन्म दिया है। वह सब लोकोंको मोहनेवाली मेरी माया ही है। आप मुझे ले जाकर यशोदाकी शय्यापर सुला दें और यशोदाकी पुत्रीको लाकर देवकीकी शय्यापर सुलावें।' भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वसुदेवजीने वैसा ही किया। देवकीकी शय्यापर सुलाते ही वह मायामयी पुत्री रोने लगी। बालकके रोनेकी ध्वनि सुनकर कंस व्याकुलचित्त होकर आया और सूतिकाघरमें घुसकर उसने कन्याको ले लिया। उसके मनमें तनिक भी लज्जा और दया नहीं थी। उसने उस बालिकाको ले जाकर पत्थरपर पटक दिया। उसके हाथसे छूटते ही वह बालिका आठ बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित महादेवीके रूपमें प्रकट हुई और कंसको पुकारकर अत्यन्त कुपित होकर बोली—'अरे पापात्मा कंस! ओ दुर्बुद्धे। रे मूर्ख! तेरे प्राणोंको हरनेवाला शत्रु कहीं-न-कहीं उत्पन्न हो गया है। अब तू अपनी मृत्युरूप उस शत्रुंकी खोज करता रह।' ऐसा कहकर देवी, जो मनुष्योंसे पूजा पाकर उनका अभीष्ट सिद्ध करनेवाली है, दिव्य स्थानोंमें चली गयी। देवीका वचन सुनकर कंस अत्यन्त व्याकुल हो उठा। उसने अपना प्राणान्त करनेवाले शत्रुको पीड़ा देनेके लिये तथा दूसरे-दूसरे बालकोंको भी सतानेके लिये पूतना आदि बालग्रहोंको भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भेजा। वे सभी बालग्रह नन्दके गोकुलमें गये और वहाँ श्रीकृष्णके हाथों मारे गये। तदनन्तर कुछ दिन और बीत जानेपर बलभद्र और श्रीकृष्ण गोकुलमें बढ़कर सयाने हो गये। उन्होंने अनेक प्रकारकी बालक्रीडाओंसे खेल किये। कुछ कालतक वे दोनों भाई बाँसुरी बजाते हुए बछड़े चराते रहे। कुछ वर्षोंतक गाय चराते रहे। उस समय वे वनमें गुंजा और तापिच्छके आभूषण धारण करते थे। इस प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण दीर्घकालतक गोकुलमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते रहे।
एक समय कंसने बलराम और श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरजीको गोकुलमें भेजा। अक्रूरजी कंसकी आज्ञासे जाकर उन दोनों भाइयोंको गोकुलसे मथुरा बुला ले आये। मथुरापुरी सुवर्णमय द्वारसे शोभा पा रही थी। बलराम और श्रीकृष्णको लाकर अक्रूरजी पुरीमें गये और कंससे मिलकर उसे सब समाचार बताया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने घरमें प्रवेश किया। तदनन्तर दूसरे दिन वसुदेवके दोनों पुत्र अपने प्रिय मित्र गोपबालकोंके साथ मथुरापुरीमें आये। नगरकी युवतियाँ उनके रूप-गुणकी प्रशंसा करतीं और वे उसे सुनते हुए आगे बढ़ते जाते थे। तदनन्तर, श्रीकृष्णने
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५७
बलरामके साथ धनुषशालामें जाकर दृढ़ प्रत्यंचावाले बड़े भारी धनुषको देखा और सब रक्षकोंको दूर भगाकर लीलापूर्वक उस धनुषको हाथमें ले लिया। फिर जब प्रत्यंचा चढ़ानेके लिये उसे झुकाया, तब बीचसे टूटकर उसके दो टुकड़े हो गये। धनुष टूटनेका शब्द सुनकर वहाँ आये हुए बलवान् रक्षकोंको मारनेके लिये उन दोनों महाबली बन्धुओंने धनुषके दोनों टुकड़े उठा लिये और उन्हींसे सबको मार गिराया। तत्पश्चात् रंगशालाके द्वारपर खड़े हुए कुवलयापीड नामक हाथीको मारकर महान् बल और पराक्रमसे युक्त बलराम तथा श्रीकृष्णने उसके दोनों दाँत उखाड़ लिये और उन्हें हाथसे पकड़कर कन्धेपर रखे हुए क्षणभरमें वे रंगभूमिमें जा पहुँचे। वहाँ उन दोनोंने चाणूर, मुष्टिक, बल तथा दूसरे-दूसरे प्रमुख पहलवानोंको मारकर परम धामको पहुँचा दिया। फिर दोनों भाई शीघ्र ही उछलकर ऊँचे मंचपर चढ़ गये। वहाँ कंस एक ऊँचे आसनपर बैठा हुआ था। उसे तिनकेके समान समझकर वे उसके समीप इस प्रकार स्थित हुए, जैसे दो सिंह तुच्छ मृगके पास खड़े हों। तदनन्तर श्रीकृष्णने मंचपर बैठे हुए कंसके पैर पकड़कर उसे खींच लिया और बड़े वेगसे आकाशमें घुमाया। इतनेमें ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। तब प्राणरहित कंसको उन्होंने धरतीपर गिरा दिया। फिर बलरामजीने भी कंसके आठ भाइयोंको मुक्कोंसे ही मार गिराया। इस प्रकार कंसको मारकर श्रीकृष्णने अत्यन्त दुःख भोगनेवाले अपने माता-पिताको कारागारके बन्धनसे मुक्त किया और अन्य सब लोगोंको भी बलराम तथा श्रीकृष्णने आश्वासन दिया। श्रीकृष्णके द्वारा कंस मारा गया, यह समाचार सुनकर वसुदेवके अन्य बन्धु-बान्धव, जो पहले कंसके द्वारा पीड़ित होकर अन्यत्र चले गये थे, मथुरापुरीमें लौट आये। भगवान् श्रीकृष्णने मथुराके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित किया।
तत्पश्चात् एक दिन भगवान् श्रीकृष्णने दर्शनके लिये अपने पास आये हुए नारदादि मुनियोंसे इस प्रकार पूछा— 'ब्राह्मणो! मैंने अत्यन्त पापात्मा कंसका वध किया है, पर वह कंस मेरा मामा था। शास्त्रोंके ज्ञाता विद्वान् मामाके वधमें दोष बताते हैं; अतः उस दोषके निवारणके लिये आपलोग मुझे कोई प्रायश्चित्त बतलाइये।' यह सुनकर नारदजीने अद्भुत पराक्रमी श्रीकृष्णसे मधुर वाणीमें भक्ति एवं प्रेमके साथ कहा— 'यदुनन्दन! आप नित्य, शुद्ध, बुद्ध एवं मुक्त सच्चिदानन्दस्वरूप सनातन परमात्मा हैं, आपके लिये पुण्य अथवा पाप नहीं है। तथापि गरुड़ध्वज ! आपको लोकशिक्षाके लिये विधिपूर्वक प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिये। माधव! गन्धमादन पर्वतपर जो परम पुण्यमय रामसेतु है, वहाँ पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित किया हुआ रामेश्वर नामक शिवलिंग है। उसके अभिषेकके लिये जलकी आवश्यकता होनेपर श्रीरघुनाथजीने धनुषकी कोटिसे पृथ्वीको भेदकर एक तीर्थ प्रकट किया था, जो कोटितीर्थके नामसे विख्यात है। वह धर्मके लिये हितकर और पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। आप उसीमें स्नान करें। कोटितीर्थका स्नान ब्रह्महत्या आदिका भी निवारण करनेवाला है।'
नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण रामसेतुपर गये और कुछ दिनोंमें कोटितीर्थमें स्नान एवं अनेक प्रकारके दान करके रामेश्वरकी सेवा-पूजा करनेके पश्चात् मथुरापुरीमें लौट आये। कोटितीर्थका ऐसा ही पुण्यमय प्रभाव है। ब्राह्मणो! इस तीर्थमें स्नान करनेसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवता भी प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार यह कोटितीर्थका माहात्म्य बतलाया गया, जिसका श्रवण करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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५५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सर्वतीर्थ तथा धनुष्कोटि तीर्थोंकी महिमा
श्रीसूतजी कहते हैं—तदनन्तर मनुष्य सर्वतीर्थकी यात्रा करे। पूर्वकालमें सुचरित नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे, जो सदा ही नियमोंमें संलग्न रहते थे। उनका जन्म भृगुवंशमें हुआ था। वे जन्मके ही अन्धे थे, फिर बुढ़ापेने आकर उनको और भी आतुर बना दिया। नेत्र न होनेके कारण वे तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ थे। उनके मनमें सभी तीर्थोंमें स्नान करनेकी इच्छा होती थी। वे महामुनि दक्षिण समुद्रके तटपर पुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर गये और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या करने लगे। वे तीनों समय इन्द्रियसंयमपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करते थे। तीनों समय स्नान और अतिथियोंका सत्कार उनकी दिनचर्याका अंग बन गया था। वे भस्मद्वारा त्रिपुण्ड्र लगाते और जाबालोपनिषद्में बतायी हुई रीतिसे रुद्राक्षकी माला धारण करते थे। इस प्रकार ब्राह्मणने दस वर्षोंतक उग्र तपस्या की। इससे भगवान् चन्द्रशेखर बहुत प्रसन्न हुए और सुचरित मुनिके आगे प्रकट हुए। वे महान् वृषभ नन्दीपर आरूढ़ हो भूतसमुदायसे घिरे हुए थे। उनके आधे शरीरमें भगवती गिरिराजनन्दिनी विद्यमान थीं। वे अपने दिव्य प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाओंको अन्धकारशून्य किये देते थे। उनका सब अंग विभूतियोंसे उज्ज्वल दिखायी देता था। वे जटाभारसे शोभा पा रहे थे। भगवान् शिवने अपने स्वरूपका दर्शन करानेके लिये उन्हें दो नेत्र प्रदान किये। तब सुचरितने परमेश्वर शिवका दर्शन करके प्रसन्नचित्त हो इस प्रकार स्तुति की।
सुचरित बोले—देव महेश्वर ! आपकी जय हो। कल्याणकारी धूर्जटे ! आपकी जय हो। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनीय देव ! आप त्रिपुरासुरके विनाशक तथा कालके भी काल हैं, आपकी जय हो। भगवती उमाके स्वामी महादेव ! आपकी जय हो। कामदेवका विनाश करनेवाले निर्मल परमेश्वर ! आपकी जय हो। शिव ! आप संसाररोगका निवारण करनेवाले वैद्य, सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक तथा अविनाशी देवता हैं, आपकी जय हो। त्रिलोचन ! आपने भक्तोंकी रक्षाका व्रत ग्रहण किया है, आपको नमस्कार है। व्योमकेश ! आपको नमस्कार है। करुणाविग्रह ! आपकी जय हो। नीलकण्ठ ! आपको नमस्कार है। आप संसारबन्धनसे छुड़ानेवाले हैं, आपकी जय हो। महेश्वर ! परमानन्दस्वरूप ! आपको नमस्कार है। गंगाधर ! आपको नमस्कार है। विश्वेश्वर ! सुखस्वरूप अविनाशी देव ! आपको नमस्कार है। आप भगवान् वासुदेव हैं। शम्भो ! आपको नमस्कार है। आप शर्व, उग्र, भर्ग एवं कैलाशपतिको नमस्कार है। करुणासिन्धो ! अपनी कृपादृष्टिसे देखकर मेरी रक्षा कीजिये। भगवान् हर ! मेरे चरित्रकी ओर न देखकर अपनी दयासे ही मेरा उद्धार कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् उमानाथने
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५९
सुचरित मुनिसे कहा—'मुने! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।' तब मुनिने दयानिधान शिवजीसे कहा—'भगवन्! चन्द्रशेखर! वृद्धावस्थाके कारण मेरा शरीर बहुत ढीला हो गया है, इसलिये मैं कहीं भी जानेमें असमर्थ हूँ। तथापि सब तीर्थोंमें स्नान करनेकी मेरी इच्छा है। अतः सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, उसकी प्राप्तिका साधन मुझे भी बताइये।'
महादेवजी बोले—श्रीरामचन्द्रजीके सेतुसे पवित्र हुए इस गन्धमादन पर्वतपर मैं सम्पूर्ण तीर्थोंका आवाहन करूँगा।
यों कहकर महादेवजीने मुनिकी प्रसन्नताके लिये वहाँ सब तीर्थोंका आवाहन किया और सुचरितसे इस प्रकार कहा—'मुने! यहाँ सब तीर्थोंका निवास होनेसे इसका नाम 'सर्वतीर्थ' होगा। यह सर्वतीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होगा। अतः शीघ्र मुक्ति पानेके लिये इस तीर्थमें स्नान करो। यह काम, मोह, भय, क्रोध, लोभ और रोग आदिका नाशक, तत्काल मोक्षकी प्राप्तिका साधन, जन्म-मृत्यु आदि ग्राहसमूहोंसे भरे हुए संसारसमुद्रसे पार उतारनेवाला तथा कुम्भीपाक आदि समस्त नरकोंकी आग बुझा देनेवाला है।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सुचरितने उनके समीप ही सर्वतीर्थमें स्नान किया। स्नान करके जब वे जलसे बाहर निकले, तब सब मनुष्योंने देखा, उनके शरीरमें वृद्धावस्थाकी झुर्रियाँ नहीं रह गयी हैं और वे अत्यन्त सुन्दर तरुण हो गये हैं।
तदनन्तर महादेवजीने कहा—'सुचरित! तुम इस तीर्थके किनारे रहते हुए मुझ मुक्तिदाता शिवका स्मरण करते हुए सदा इसीमें स्नान करो, अन्य देशके तीर्थोंमें मत जाओ। अन्तमें इस तीर्थके माहात्म्यसे तुम मुझे अवश्य प्राप्त कर लोगे। दूसरे मनुष्य भी जो इस तीर्थमें स्नान करेंगे, वे मुझे प्राप्त कर लेंगे।
ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद सुचरित मुनि बहुत समयतक सर्वतीर्थके किनारे टिके रहे। वे मनको संयममें रखते हुए सदा उसी तीर्थमें स्नान करते थे। देहावसान होनेपर उन्होंने सब बन्धनोंसे मुक्त हो भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार यहाँ सर्वतीर्थके माहात्म्यका वर्णन किया गया। जो मनुष्य इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
अत्यन्त पावन सर्वतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश करनेवाली धनुष्कोटिमें स्नान करनेके लिये जाय। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो लोग धनुष्कोटिका दर्शन, उसमें स्नान अथवा उसकी चर्चा करते हैं, वे अट्ठाईस भेदोंवाले नरकमें कभी नहीं पड़ते। मनुष्योंको तुलापुरुषके दानसे जो फल मिलता है, वही धनुष्कोटिमें गोता लगानेसे भी मिल जाता है। एक सहस्र गोदान करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वह धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारोंमेंसे मनुष्य जिस-जिस पुरुषार्थकी इच्छा करता है, उस-उसको धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे तत्क्षण प्राप्त कर लेता है। धनुष्कोटितीर्थ सब पातकोंका नाशक, अद्वैत ज्ञान देनेवाला, भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला, अभीष्ट मनोरथोंका दाता तथा अज्ञान दूर करनेवाला है। उसके होते भी मनुष्य उस तीर्थको छोड़कर अन्यत्र रमता रहता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! उस तीर्थका नाम धनुष्तीर्थ कैसे हुआ?
सूतजी बोले—समस्त लोकोंके लिये कण्टकरूप रावण जब युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और विभीषणको लंकाके राज्यपर स्थापित कर दिया गया, तब सीता, लक्ष्मण तथा सुग्रीव
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आदि वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी गन्धमादन पर्वतपर आये। वहाँ आनेपर धर्मज्ञ विभीषणने महात्मा रघुनाथजीसे हाथ जोड़कर प्रार्थना की— 'भगवन्! आपके बनाये हुए इस सेतुके मार्गसे सभी बलाभिमानी राजा आकर मेरी लंकापुरीको पीड़ित करेंगे। अतः आप अपनी धनुषकी कोटिसे इस सेतुको तोड़ डालिये।' विभीषणके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने धनुषकी कोटिसे उस पुलको तोड़ डाला। इसीलिये उस तीर्थका नाम धनुष्कोटि हो गया। श्रीरामके धनुषकी कोटिसे की हुई रेखाका जो दर्शन करता है, उसकी मुक्ति हो जाती है। नर्मदाके तटपर किया हुआ तप बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है, गंगातटपर मृत्यु हो तो वह मोक्षरूप फल देनेवाली है और कुरुक्षेत्रमें दिया हुआ दान ब्रह्महत्या आदि पापोंको शुद्ध करनेवाला है; किंतु धनुष्कोटिमें तप, मृत्यु अथवा दान कोई भी हो तो वह महापातकोंका नाश, मोक्षकी प्राप्ति और मनोरथकी सिद्धि करानेवाला होता है। मनुष्य तभीतक पातकों और उपपातकोंसे पीड़ित होता है, जबतक कि उसे मोक्षदायक धनुष्कोटिका दर्शन नहीं होता। धनुष्कोटिका दर्शन करनेवाले पुरुषके हृदयकी अज्ञानमयी ग्रन्थि कट जाती है, उसके सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त पापकर्मोंका क्षय हो जाता है। पृथ्वीपर दस कोटि सहस्र (एक खर्व) तीर्थ हैं। उन सबका निवास इस धनुष्कोटिमें है। धनुष्कोटिमें तपस्या करके देवता और महर्षि बड़ी-बड़ी सिद्धियोंको प्राप्त हुए हैं। जो मनुष्य उसमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ एक ब्राह्मणको भोजन कराता है, वह इहलोक और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा | शूद्र—कोई भी धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे निन्दित योनिमें जन्म नहीं लेता। जो मानव मकर राशिमें सूर्यके स्थित होनेपर माघ मासमें धनुष्कोटिमें स्नान करता है, वह गंगा आदि सब तीर्थोंमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त करता है। उसे अक्षय लोकोंकी तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। स्त्री अथवा पुरुषके जन्मसे लेकर जितने पाप हैं, वे सब माघ मासमें धनुष्कोटितीर्थमें स्नान करनेसे नाशको प्राप्त होते हैं। जो क्रोधको जीतकर प्रतिदिन एक समय भोजन करते हुए माघ मासमें धनुष्कोटिमें नहाता है, वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। शिवरात्रिमें निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर रातमें जागरण करे और प्रत्येक पहरमें रामेश्वर महादेवकी विशेष विधिपूर्वक पूजा करे। फिर दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर धनुष्कोटिमें गोता लगाकर अन्य तीर्थोंमें भी नियमपूर्वक रहकर स्नान करे। पुनः नित्यकर्म करके भगवान् रामेश्वरकी आराधना करे, ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अन्न भोजन करावे। उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार भूमि, गौ, तिल, धान्य और धन दान करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषके ऊपर प्रसन्न हो भगवान् रामेश्वर उसके सब पाप छुड़ा देते और उसे भोग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं। अतः मोक्ष चाहनेवाले पुरुषोंको माघ मासमें धनुष्कोटिमें अवश्य स्नान करना चाहिये। जो सूर्यनारायणके आधे उदयके समय धनुष्कोटिमें स्नान करता है, उसके वशमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता हो जाते हैं। जो मनुष्य चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय इस तीर्थमें स्नान करता है, वह सायुज्य मोक्षको पाता है। मुनिवरो! तुम सब कुछ छोड़कर भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले परम पवित्र धनुष्कोटिको जाओ। वहाँ जाकर पितरोंको पिण्डदान करो। क्योंकि वहाँ पिण्डदान करनेसे कल्पपर्यन्त
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६१
पितरोंकी तृप्ति होती है। सेतुमूल, धनुष्कोटि तथा गन्धमादन पर्वत ये देवनिर्मित तीनों स्थान ऋणसे छुटकारा दिलानेवाले कहे गये हैं। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके धनुष्कोटिका सेवन करना चाहिये। द्रोणाचार्यका पुत्र अश्वत्थामा धनुष्कोटिमें आकर यहाँ नियमपूर्वक स्नान करके सोते हुए बालकोंको मारनेके भयंकर पापसे क्षणभरमें मुक्त हो गया।
अश्वत्थामाके द्वारा सोते हुए पाण्डव योद्धाओंका वध तथा धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे उसका उद्धार
ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अश्वत्थामाने किस प्रकार सोते हुए मनुष्योंको मारनेका पाप किया और कैसे धनुष्कोटिमें स्नान करके वह पापमुक्त हो गया?
सूतजी बोले—ब्राह्मणो ! पहले पाण्डवोंका धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ राज्यके लिये युद्ध छिड़ा था। अनेक अक्षौहिणी सेनाओंसे युक्त उस महायुद्धमें लगातार दस दिनोंतक संग्राम करके शान्तनुनन्दन भीष्मजी मारे गये। पाँच दिन युद्ध करनेपर द्रोणाचार्य, दो दिनकी लड़ाईमें कर्ण और एक दिन युद्ध करके राजा शल्य मार डाले गये। अठारहवें दिनके युद्धमें जब दुर्योधनसे सामना हुआ, तब भीमने गदा मारकर उसकी जाँघ तोड़ डाली। इससे वह श्रेष्ठ राजा दुर्योधन धराशायी हो गया। तदनन्तर युद्धकी समाप्ति हो गयी। सब राजा अपनी-अपनी छावनीपर लौट जानेकी जल्दी करने लगे। सबने प्रसन्नतापूर्वक शिविरको प्रस्थान किया। धृष्टद्युम्न, शिखण्डी आदि समस्त सृंजयवंशी क्षत्रिय तथा अन्य राजा लोग भी अपने-अपने शिविरको लौट गये। श्रीकृष्ण और सात्यकिके साथ पाण्डव भी अपने शिविरमें चले गये। उस समय श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे कहा—'हमलोगोंको मंगलके लिये आजकी रातमें शिविरसे बाहर निवास करना चाहिये। तब श्रीकृष्ण और सात्यकिके साथ सब पाण्डव छावनीसे बाहर निकल गये। उन सबने ओघवती नदीके किनारे जाकर सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की।'
इधर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा सूर्यास्त होनेसे पहले दुर्योधनके पास गये। दुर्योधन रणभूमिमें धूलि-धूसरित होकर पड़ा था। उसका सारा वदन रक्तसे नहा गया था और वह धरतीपर पड़ा-पड़ा छटपटाता था। उसे उस अवस्थामें देखकर अश्वत्थामा आदि तीनोंको बड़ा शोक हुआ। राजा दुर्योधन भी उन सुहृदोंको देखकर शोकमग्न हो गया। तब अश्वत्थामा क्रोधसे प्रचण्ड अग्निकी भाँति जल उठा और इस प्रकार बोला—'राजन्! इन नीच शत्रुओंने छलसे मेरे पिताजीको रणभूमिमें गिरा दिया था, परंतु उसके कारण मुझे वैसा शोक नहीं हुआ, जितना कि आज तुम्हारे गिराये जानेपर हो रहा है। सुयोधन ! मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ, आज रातमें सृंजयोंसहित पाण्डवोंका श्रीकृष्णके देखते-देखते वध कर डालूँगा, मुझे आज्ञा दो।'
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर उसे स्वीकृति दे दी और कृपाचार्यसे कहा—'आचार्य! आप द्रोणपुत्रको कलशके जलसे सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कीजिये।' कृपाचार्यने ऐसा ही किया। सेनापतिके रूपमें अभिषिक्त होनेपर अश्वत्थामाने दुर्योधनको हृदयसे लगाया और कृपाचार्य तथा कृतवर्माके साथ तुरंत वहाँसे चल दिया। वे तीनों वीर दक्षिणकी ओर गये और सूर्यास्तसे पहले ही
५६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
शिविरके समीप पहुँच गये। वहाँ पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर वे तीनों विजयाभिलाषी योद्धा भयसे भाग चले। एक स्थानपर उन्होंने घोड़ोंको पानी पिलाया। पास ही अनेक शाखाओंसे युक्त सघन वटका वृक्ष था। वहाँ जाकर तीनों रथसे उतर गये और घोड़ोंको वहीं छोड़कर आचमन एवं सन्ध्योपासना की। तदनन्तर, अन्धकारसे व्याप्त भयानक रात्रि सब ओर फैल गयी। कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा शोकसे पीड़ित हो वटके समीप बैठ गये। कृतवर्मा और कृपाचार्यको तो नींद आ गयी, किंतु क्रोधसे कलुषितचित्त होनेके कारण अश्वत्थामाको निद्रा नहीं आती थी। वह सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचता रहा। उसने देखा, इस बरगदपर बहुत-से कौए रहते हैं और सब-के-सब भिन्न-भिन्न शाखाओंपर सुखपूर्वक सो गये हैं। इतनेमें ही वहाँ मास नामक पक्षी आया। वह बड़ा भयंकर था। मास बहुत शब्द करके उस वृक्षमें छिप गया और उछल-उछलकर सोये हुए कौओंको मारने लगा। थोड़ी ही देरमें कौओंके कटे हुए अंगोंसे उस वृक्षके सब ओरका भाग आच्छादित हो गया। इस प्रकार कौओंका अन्त करके वह उल्लू बहुत प्रसन्न हुआ।
अश्वत्थामाने उल्लूकी वह सारी करतूत रातमें देखी। फिर उसने भी मनमें यह निश्चय किया कि मैं भी इसी प्रकार रात्रिमें सोते हुए शत्रुओंका संहार करूँगा। उसने उल्लूके उस कुकृत्यको अपने लिये उपदेश माना और सोचा, सीधे मार्गसे युद्ध करके मैं पाण्डवोंको जीत नहीं सकूँगा, अतः छलसे ही उन्हें मारना चाहिये। ऐसा विचार करके अश्वत्थामाने सोते हुए कृपाचार्य और कृतवर्माको जगाया और इस प्रकार कहा— 'निर्दयी भीमने राजा दुर्योधनके सिरपर लात मारी है, अतः आज रातमें पाण्डवोंके शिविरमें जाकर हमलोग उन्हें सोतेमें ही अनेक अस्त्र-शस्त्रोंसे मार डालेंगे।' यह सुनकर कृपाचार्यने कहा—'सोते हुओंको मारना इस लोकमें धर्म नहीं है। इस कुकर्मका कहीं भी आदर नहीं होता। इसी प्रकार जो लोग शस्त्र, रथ और घोड़ोंको त्याग चुके हैं, उनको भी मारना धर्म नहीं है। हमलोग धृतराष्ट्र, पतिव्रता गान्धारी तथा विदुरजीसे पूछ लें और वे लोग जैसा कहें, वैसा करें।' तब अश्वत्थामा बोला—'मामाजी! पाण्डवोंने छलसे युद्धमें मेरे पिताको मारा है, उसी प्रकार मैं भी रातमें सोते हुए पाण्डवोंका वध करूँगा।'
ऐसा कहकर अश्वत्थामा घोड़े जुते हुए रथपर सवार हो क्रोधसे जलता हुआ पाण्डवोंकी ओर चल दिया। उसके पीछे-पीछे कृतवर्मा और कृपाचार्य भी गये। शिविरके द्वारपर पहुँचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा खड़ा हो गया। उसने रातमें ही कृपानिधान महादेवजीकी आराधना करके उनसे एक उज्ज्वल खड्ग प्राप्त किया। तत्पश्चात् कृतवर्मा और कृपाचार्य दोनोंको शिविरके द्वारपर ही खड़ा करके वह स्वयं भीतर घुस गया। उस समय द्रोणपुत्र अत्यन्त कुपित हो तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। धीरे-धीरे वह धृष्टद्युम्नके शिविरमें गया। वहाँ महायुद्धसे थके हुए धृष्टद्युम्न आदि वीर अपनी सेनाके साथ निश्चिन्त होकर सो रहे थे। अश्वत्थामाने उत्तम शय्यापर सोते हुए महाबली धृष्टद्युम्नको क्रोधपूर्वक लातसे मारा। उस आघातसे जगकर धृष्टद्युम्न शय्यासे उठने लगा। उसी समय द्रोणपुत्रने उसके बाल खींचकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया और उसकी छातीपर चढ़कर धनुषकी डोरीसे उसके गलेको कसकर बाँध दिया। बेचारा विवश होकर चीखता और छटपटाता रहा, किंतु अश्वत्थामाने उसे पशुकी तरह गला दबाकर मार डाला। उसने सब सैनिकोंको भी सोतेमें ही मार डाला। युधामन्यु
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और महापराक्रमी उत्तमौजाको, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको तथा युद्धसे बचे हुए सोमक नामवाले क्षत्रिय वीरोंको भी उसने मौतके घाट उतार दिया। शिखण्डी आदि बहुत-से क्षत्रिय वीरोंको अश्वत्थामाने तलवारसे काट डाला। उसके भयसे भागकर जो लोग दरवाजेसे निकले, उन सब सैनिकोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यने मृत्युका ग्रास बना दिया। इस प्रकार सारी सेनाके मारे जानेसे वह शिविर उसी प्रकार सूना हो गया, जैसे प्रलयकालमें तीनों लोक शून्य हो जाते हैं। तदनन्तर वे तीनों योद्धा पाण्डवोंसे भयभीत होकर शीघ्र गतिसे इधर-उधर निकल भागे।
अश्वत्थामा नर्मदाके मनोरम तटपर चला गया। वहाँ सहस्रों वेदवादी ऋषि परस्पर पुण्यकथाएँ कहते हुए उत्तम तपस्यामें संलग्न रहते थे। द्रोणाचार्यका पुत्र उन ऋषियोंके आश्रमोंमें गया। उसके प्रवेश करते ही ब्रह्मवादी मुनियोंने योगबलसे उसका दुश्चरित्र जान लिया और इस प्रकार कहा—'द्रोणपुत्र ! तू सोते हुए मनुष्योंको मारनेवाला पापी अधम ब्राह्मण है। तेरे दर्शनसे भी हमलोग निश्चय ही पतित हो जायँगे। तुझसे वार्तालाप करनेपर दस हजार ब्रह्महत्याओंका पाप लगेगा। अतः नराधम ! तू हमारे आश्रमोंसे दूर हो जा।'
उनके ऐसा कहनेपर अश्वत्थामा लज्जित हो उस मुनिसेवित आश्रमसे निकल गया। इसी प्रकार वह काशी आदि सभी पुण्यतीर्थोंमें गया; परंतु वहाँके महात्मा ब्राह्मणोंसे निन्दित होकर लौट आया और अन्तमें प्रायश्चित करनेकी इच्छासे भगवान् वेदव्यासजीकी शरणमें गया। महामुनि व्यासजी बदरिकारण्यमें विराजमान थे। उनके पास जाकर उसने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। तब व्यासजीने उससे कहा—'द्रोणकुमार ! तू शीघ्र मेरे आश्रमसे निकल जा। सोते हुओंको मारनेके पापसे तू महापातकी हो गया है। तेरे साथ बात करनेसे भी मुझे महान् पाप लगेगा।'
अश्वत्थामा बोला—भगवन्! सबसे निन्दित होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। यदि आप भी ऐसी बात कहते हैं तो दूसरा कौन मुझे शरण देनेवाला होगा? ब्रह्मन्! मुझपर कृपा कीजिये। क्योंकि साधुपुरुष दीनोंपर दया करनेवाले होते हैं। सोते हुए मनुष्योंको मारनेसे जो पाप हुआ है, उसकी शान्तिके लिये आप मुझे कोई प्रायश्चित्त बताइये। कारण कि आप सर्वज्ञ हैं।
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर व्यासजीने दीर्घकालतक सोच-विचारकर उससे कहा—इस पापकी शान्तिके लिये धर्मशास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। तथापि मैं उस दोषके निवारणके लिये एक उपाय बतलाता हूँ। दक्षिण समुद्रके तटपर जो परम पवित्र रामसेतु है, वह मोक्ष देनेवाला है। वहीं धनुष्कोटि नामसे विख्यात एक महान् तीर्थ है, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला और मनुष्योंको स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाला है। उसमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या आदि पाप भी शुद्ध हो जाते हैं। वह पवित्रोंमें सबसे अधिक पवित्र तथा तीर्थोंमें सबसे उत्तम है। दुःस्वप्न और नरकके क्लेशोंका नाशक तथा पुण्यजनक है। उस धनुष्कोटितीर्थमें जाकर तुम एक महीनेतक निरन्तर स्नान करो तो सोते हुओंको मारनेके पापसे शुद्ध हो जाओगे।
महर्षि व्यासके इस प्रकार कहनेपर अश्वत्थामा रामसेतुपर जाकर पुण्यदायिनी धनुष्कोटिमें पहुँचा। वहाँ उसने संकल्पपूर्वक एक मासतक निरन्तर स्नान किया। वह प्रतिदिन तीनों समय श्रीरामेश्वर शिवकी सेवामें रहता था। तदनन्तर तीसवें दिन जलमें स्नान करके उसने पंचाक्षर मन्त्रका जप और उपवास किया। फिर रातमें भगवान् रामेश्वरके समीप जागरण किया। दूसरे दिन पुनः संकल्पपूर्वक धनुष्कोटिमें स्नान करके उसने श्रीरामेश्वरकी भक्तिपूर्वक सेवा-पूजा की। तदनन्तर आनन्दके आँसू बहाता हुआ वह शिवजीके आगे नृत्य करने
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लगा। उस समय भगवान् शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गये। उनका दर्शन करके उसने भगवान् शिवका इस प्रकार स्तवन किया— 'देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। करुणाकर शंकर! विपत्ति-रूपी समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंको पार लगानेके लिये आपके चरणारविन्द जहाजरूप हैं। मृत्युंजय! त्रिलोचन! आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये।'
इस प्रकार स्तुति करनेपर महादेवजी प्रसन्न हो अश्वत्थामासे बोले— 'द्रोणकुमार! सोते हुओंको मारनेके कारण जो तुम्हें पाप लगा था, वह धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो गया। अब तुम कोई वर माँगो।'
अश्वत्थामा बोला— 'महेश्वर! आज आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतार्थ हो गया। आपके चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो।' 'तथास्तु' कहकर देवदेव महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार पापरहित, शुद्ध एवं निर्मल हुए अश्वत्थामाको उस समयसे सभी महर्षियोंने ग्रहण किया।
धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुका पापसे उद्धार
सूतजी कहते हैं—पहलेकी बात है, बृहद्द्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक महाबली चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। वे समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। उन्होंने सत्रयागद्वारा इन्द्र आदि देवताओंका यजन किया। परम विद्वान् धर्मात्मा रैभ्यजी उनके पुरोहित थे। रैभ्यके दो पुत्र हुए, अर्वावसु और परावसु। वे दोनों छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् तथा श्रौत-स्मार्त कर्मोंके तत्त्वज्ञ थे। न्याय, मीमांसा, सांख्य, वेदान्त, वैशेषिक, योगशास्त्र और व्याकरणशास्त्रके मर्मज्ञ विद्वान् थे। मनु आदि धर्मशास्त्रोंके वे निष्णात पण्डित और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें चतुर थे। इन दोनों विद्वानोंको सत्रयागमें सहायता करनेके लिये राजा बृहद्द्युम्नने माँगा। पिताकी आज्ञा ले वे दोनों भाई बृहद्द्युम्नके सत्रमें गये। वे युगल अश्विनीकुमारोंकी भाँति परम सुन्दर दिखायी देते थे। रैभ्य मुनि जेठी पुत्रवधूके साथ स्वयं ही आश्रमपर रह गये थे।
उन दोनों बन्धुओंने वहाँ जाकर राजा बृहद्द्युम्नके यज्ञको बड़ी उत्तमतासे सम्पन्न कराया। जब वह यज्ञ होने लगा, तब राजाके बुलाये हुए सभी मुनि उस यज्ञको देखनेके लिये आये। उनको आया हुआ देख महाराज बृहद्द्युम्नने सबका आदरपूर्वक अर्घ्य आदिसे सत्कार किया। उसी समय आमन्त्रित हुए राजालोग आदरपूर्वक वह यज्ञोत्सव देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे चतुरंगिणी सेनाके साथ आये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इन चारों वर्णों तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन चारों आश्रमोंके लोग भी वहाँ जुटे हुए थे। श्रेष्ठ राजाने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया और सबको भोजनके लिये अन्न, घी आदि पदार्थ दिये। वस्त्र, सुवर्ण, हार एवं नाना प्रकारके रत्न भी भेंट किये। इस प्रकार राजा बृहद्द्युम्नने यज्ञमें पधारे हुए सभी अतिथियोंका सत्कार किया।
रैभ्यके पुत्र अर्वावसु और परावसुने यज्ञ आदि कर्मोंको बिना किसी भूलके विधिपूर्वक कराया। उन दोनों भाइयोंकी निपुणता देखकर वसिष्ठ आदि सभी महर्षियोंने उनकी प्रशंसा की। परावसु कुछ कर्म कराकर तृतीय सवनके अन्तमें सायंकालके समय घरका काम-काज देखनेके लिये चले गये। उस समय रैभ्य मुनि काला मृगचर्म ओढ़कर वनमें विचर रहे थे। उन्हें देखकर परावसुके मनमें मृगकी आशंका हुई। रात्रिमें निविड़ अन्धकारमें उनके नेत्र निद्रासे
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५६५ ---|--- भारी हो रहे थे। उन्होंने पिताको देखकर यह समझा कि यह कोई वनवासी मृग है, मुझे मारनेके लिये आ रहा है। ऐसा सोचकर उस सघन वनमें अपने शरीरकी रक्षा चाहनेवाले परावसुने मृगके धोखेसे अपने पिताको ही मार डाला। निकट जाकर उसने अपने मरे हुए पिताको पहचाना; फिर तो वह शोकमें डूब गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्यथासे व्याकुल हो उठीं। तत्पश्चात् परावसु पिताका दाहसंस्कार करके पुनः राजाके सत्रमें आ गये और अपने द्वारा जो पाप हो गया था, वह सब उन्होंने छोटे भाईको बताया। पिताको मरा हुआ सुन अर्वावसु शोकसे व्याकुल हो उठा। तब बड़े भाईने छोटेको यह आदेश दिया कि राजाका यह महान् यज्ञ आरम्भ हुआ है, तुम अभी बालक हो, तुममें इस यज्ञका भार सँभालनेकी शक्ति नहीं है। मैंने रातमें मृगकी आशंकासे पिताका ही वध कर डाला है, अतः उस ब्रह्महत्यासे मुक्त होनेके लिये प्रायश्चित्त भी करना चाहिये। तात! छोटे भैया! तुम्हीं मेरे लिये व्रत करो। मैं अकेला भी इस यज्ञका भार वहन करनेमें समर्थ हूँ।<br><br>बड़े भाईके ऐसा कहनेपर अर्वावसुने कहा—बड़े भैया! आपकी जैसी आज्ञा हो वैसा ही होगा। ऐसा कहकर वह यज्ञसे निकल गया और बड़े भाईने सब कर्मोंको कराया। छोटे भाईने बारह वर्षोंतक बड़े भाईके लिये ब्रह्महत्यानाशके लिये व्रत किया। तत्पश्चात् प्रसन्नतापूर्वक वह पुनः सत्रयज्ञमें आया। अपने भाईको आया देख ज्येष्ठने राजा बृहद्द्युम्नसे कहा—'राजन्! यह अर्वावसु ब्रह्महत्यारा है, इस समय आपके यज्ञमें आया है। नृपश्रेष्ठ! इसे शीघ्र ही इस यज्ञसे हटा दीजिये, अन्यथा सत्रयागके फलकी हानि होगी।' परावसुके ऐसा कहनेपर राजाने अपने सेवकोंद्वारा अर्वावसुको यज्ञसे निकाल दिया। वहाँके ब्राह्मण भी उसे धिक्कार दे रहे थे। | अर्वावसु यह सब सहन करके चुपचाप वनको चला गया और वहाँ ऐसी तपस्या की, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थी। उसके तपसे भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न हो सामने प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'अर्वावसो! तुम तपस्या, ब्रह्मचर्य, आचार, शास्त्रश्रवण तथा वेद-शास्त्र आदिकी शिक्षाकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ हो। परावसुने तुम्हें अपमानपूर्वक निकाला है तथापि क्षमायुक्त होकर तुम उसके प्रति क्रोध नहीं करते हो। तुम्हारे बड़े भाईने ही पिताको मारा है, तुमने नहीं; फिर भी तुमने भाईकी शुद्धिके लिये स्वयं ही ब्रह्महत्यानाशक व्रत किया है, इसलिये हम तुम्हें श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं।' ऐसा कहकर देवताओंने उसको ज्येष्ठ बना दिया। तत्पश्चात् इन्द्रादि देवताओंने सूर्यनारायणको आगे करके कहा—'अर्वावसो! तुम कोई वर माँगो।' उसने प्रार्थना की—'मेरे पिता जीवित हो जायें और उन्हें अपने मारे जानेकी स्मृति न हो।' देवताओंने कहा—'ऐसा ही होगा। इसके सिवा हम तुम्हें दूसरा वर भी देना चाहते हैं, माँगो।'<br><br>अर्वावसु बोला—मेरे भाईकी दुष्टता दूर हो। अर्वावसुकी यह बात सुनकर देवताओंने कहा—'परावसुने अपने ब्राह्मणपिताकी हत्या की है, अतः उसे महान् पाप लगा है। दूसरेके किये हुए पापकी दूसरे द्वारा किये गये प्रायश्चित्तसे निवृत्ति नहीं होती, विशेषतः पाँच महापातकोंके सम्बन्धमें ऐसी ही बात है। इस कारण तुम्हारे भाई परावसुका अभी पापसे उद्धार नहीं हुआ है।' देवताओंकी यह बात सुनकर अर्वावसुने कहा—'आपका कहना ठीक है तथापि आपलोगोंके माहात्म्य और प्रसादसे पिता और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले मेरे भाईका जिस प्रकार उद्धार हो, वह उपाय कृपापूर्वक आप बतावें।'<br><br>अर्वावसुका यह वचन सुनकर देवताओंने दीर्घकालतक विचार किया। फिर एक निश्चयपर
५६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पहुँचकर इस प्रकार कहा—'उस महापातकके निवारणका उपाय तुम्हें हम बता रहे हैं। दक्षिण समुद्रके तटपर जो परम पवित्र मोक्षदायक रामसेतु है, उसीपर धनुष्कोटि नामसे विख्यात एक परम उत्तम मुक्तिदायक तीर्थ है, जो ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्णकी चोरी, गुरुशय्यागमन तथा इन सबके संसर्गरूप महापातकोंका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य मनमें कोई कामना नहीं रखकर उसमें स्नान करता है, उसको वह तीर्थ मोक्षफल प्रदान करता है। वह दुःस्वप्नों तथा नरकके क्लेशोंका नाश करनेवाला एवं धन्य है। तुम्हारा ज्येष्ठ भाई परावसु यदि वहीं जाकर स्नान करे तो तत्काल ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकता है।' यों कहकर देवतालोग अपनी पुरीको चले गये।
तदनन्तर अर्वावसु अपने बड़े भाई परावसुको साथ ले श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटि नामक तीर्थमें गया। परावसुने पातकशुद्धिके लिये उस सेतुवर्ती तीर्थमें संकल्प करके अपने भाईके साथ नियमपूर्वक स्नान किया। स्नान करके जब वे उठे, तब आकाशवाणीने कहा—'परावसो! तुम्हारी पितृहत्या और ब्रह्महत्या नष्ट हो गयी।' तब छोटे भाईके साथ परावसुने श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और रामेश्वर महादेवको भक्तिभावसे मस्तक नवाकर दोनों भाई अपने पिताके आश्रमपर गये। वहाँ रैभ्य मुनि मरकर पुनः जीवित हो गये थे। उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंको आया देख मन-ही-मन बड़े सन्तोषका अनुभव किया और पुत्रोंके साथ वे आश्रमपर सुखपूर्वक रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुके पातकका नाश हो गया था। इसलिये सब मुनियोंने उन्हें स्वीकार किया।
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धनुष्कोटिकी महिमा; सियार, वानर तथा दुराचार ब्राह्मणकी कथा और महालय श्राद्धकी आवश्यकता
सूतजी कहते हैं— अब मैं धनुष्कोटिकी प्रशंसामें सियार और वानरके संवादका वर्णन करता हूँ। प्राचीन कालमें एक स्थानपर सियार और वानर रहते थे। दोनोंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे दोनों परस्पर मित्र थे। सियारका नाम रुद्रभूमिष्ठ था। एक समय वानरने शृगालको श्मशानभूमिमें देखकर पूर्वजन्मका स्मरण करते हुए पूछा—'सियार! तुमने पूर्वजन्ममें कौन-सा अत्यन्त भयंकर पाप किया था, जिससे तुम श्मशानभूमिमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दोंको खा रहे हो?' वानरके ऐसा पूछनेपर सियारने कहा—'वानर! मैं पूर्वजन्ममें वेदोंका पारंगत विद्वान् और समस्त कर्मकलापोंका ज्ञाता ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदशर्मा था। मैंने उस जन्ममें एक ब्राह्मणको धन देनेके लिये संकल्प करके भी वह धन उसे नहीं दिया, उसीसे सियार हुआ और अब इस प्रकारके अत्यन्त घृणित पदार्थोंको खाता हूँ। जो दुरात्मा देनेकी प्रतिज्ञा करके भी कोई वस्तु नहीं देते हैं, वे अत्यन्त घृणित सियारकी योनिको प्राप्त होते हैं। वानर! ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि वह वस्तु उसे न दी जाय, तो उसी क्षण उसके दस जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। इसलिये समझदार मनुष्यको उचित है कि वह देनेकी प्रतिज्ञा करनेपर उस वस्तुको अवश्य दे डाले।'
ऐसा कहकर सियारने वानरसे पूछा— तुमने क्या पाप किया था, जो वानर हो गये?
वानर बोला— पूर्वजन्ममें मैं भी ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदनाथ था। मेरे पिता विश्वनाथ नामसे विख्यात थे और मेरी माताका नाम कमलालया था। सियार! पूर्वजन्ममें भी हमारी तुम्हारी मित्रता
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६७
थी। तुम इस बातको नहीं जानते हो, परंतु पुण्यके गौरवसे मुझे उसका स्मरण है। पूर्वजन्ममें मैंने ब्राह्मणका साग चुरा लिया था, उसी पापसे मैं वानर हुआ हूँ। अतः ब्राह्मणका धन अपहरण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणका धन लेनेसे नरक होता है और नरक भोगनेके बाद वानरकी योनि मिलती है। ब्राह्मणका धन अपहरण करनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। विष तो केवल पीनेवालेको मारता है, किंतु ब्राह्मणका धन समूचे कुलको जला डालता है। ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे पापी मनुष्य कुम्भीपाक नामक नरकमें पकाया जाता है। पश्चात् शेष पापोंके फलस्वरूप वह वानर योनिको प्राप्त होता है। इसलिये ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये। उनके साथ सदा क्षमाका ही व्यवहार करना चाहिये। बालक, दरिद्र, कृपण तथा वेदशास्त्र आदिके ज्ञानसे शून्य ब्राह्मणोंका भी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्रोधमें आनेपर वे अग्निके समान भस्म कर देनेवाले हो जाते हैं। सियार ! कितने ही समयसे ऐसा कष्ट भोगते हुए हम दोनोंको इस पापसे छुड़ानेवाला कौन होगा ?
सियार और वानर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, इतनेमेंही दैवयोगसे अथवा पूर्वजन्मके किसी पुण्यवश वहाँ महातेजस्वी सिन्धुद्वीप नामक मुनि स्वेच्छानुसार घूमते हुए आ पहुँचे। वे रुद्राक्षकी मालासे विभूषित हो भगवान् शिवके नामोंका कीर्तन कर रहे थे। सियार और वानरने मुनिको देखकर प्रणाम किया तथा इस प्रकार पूछा—'भगवन् ! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं, अपनी कृपादृष्टिसे हमारी ओर देखिये और हम दोनोंकी रक्षा कीजिये। हमारी वानर और सियारकी योनि जिस उपायसे छूट जाय, उसे बतानेकी कृपा कीजिये। साधुपुरुष सदा किसी प्रकारकी अपेक्षा न रखते हुए अपनी कृपादृष्टिसे अनाथों, दीनों, अज्ञानियों, बालकों तथा रोगपीड़ित मनुष्योंकी रक्षा करते हैं।'
उन दोनोंके ऐसा कहनेपर महामुनि सिन्धुद्वीपने मन-ही-मन बहुत देरतक विचार किया और इस प्रकार कहा—'सियार और वानर ! तुम दोनोंके पापकी शान्तिके लिये मैं एक उपाय बताता हूँ। तुम दोनों दक्षिण समुद्रके तटपर श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटि तीर्थमें शीघ्र जाकर स्नान करो। ऐसा करनेसे पापसे मुक्त हो जाओगे।' सिन्धुद्वीपके इस वचनको सुनकर सियार और वानर बड़े प्रयाससे धनुष्कोटिमें गये और उसके जलमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोकमें चले गये। वहाँ उन्हें इन्द्रका आधा आसन प्राप्त हुआ।
गोदावरीके तटपर दुराचार नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहता था। वह बड़ा पापी और निर्दयतापूर्ण कर्म करनेवाला था। ब्रह्महत्यारे, शराबी, सुवर्णकी चोरी करनेवाले तथा गुरुपत्नीगामी महापातकियोंके संसर्गसे दूषित होकर वह सदा वैसे ही लोगोंके साथ निवास करता था। महापातकियोंके संसर्गदोषसे उस ब्राह्मणकी ब्राह्मणता पूर्णतः नष्ट हो गयी थी। ब्राह्मणतासे हीन उस दुराचार ब्राह्मणको एक महाभयंकर महाबलवान् वेतालने अपने अधीन कर लिया। वेतालके आवेशसे अत्यन्त पीड़ित एवं परवश होकर वह देश-देश और वन-वन घूमने लगा। घूमते-घूमते वह श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटिमें चला गया। वहाँ वेतालने प्रेरित करके उसे धनुष्कोटिके जलमें नहलाया। स्नान करके वह ज्यों ही जलसे निकला, वेतालने उसे छोड़ दिया। तब वह ब्राह्मण स्वस्थ होकर विचार करने लगा कि 'यह समुद्रके किनारे कौन-सा देश है? गोदावरीके तटपर निवास करनेवाला मैं यहाँ कैसे आ गया?' इसी चिन्तामें पड़ा हुआ वह धनुष्कोटिनिवासी योगिप्रवर महात्मा दत्तात्रेयके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—
५६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
'भगवान्! मैं नहीं जानता यह कौन-सा देश है? मेरा घर तो गोदावरीके किनारे है, मैं यहाँ कैसे आ पहुँचा। यह सब बतानेकी कृपा करें।' उसकी यह बात सुनकर महायोगी दत्तात्रेयने थोड़ी देरतक ध्यान करके कहा—'पहले महापातकियोंके संसर्गसे तुम्हारी ब्राह्मणता नष्ट हो गयी थी, इसलिये तुम्हें किसी वेतालने पकड़ लिया। उसीके आवेशसे विवश होकर तुम यहाँ आये हो। वेतालने तुम्हें धनुष्कोटिके जलमें नहलाया है। धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे ही तुम्हारा महापातकियोंके संसर्गका दोष सर्वथा नष्ट हो गया। जिस वेतालने तुम्हें पकड़ रखा था, वह पूर्वजन्ममें ब्राह्मण था। उसने आश्विनमासके कृष्ण पक्षमें पार्वणकी विधिसे पितरोंका हर्षपूर्वक महालय श्राद्ध नहीं किया। अतः पितरोंके शाप देनेसे वह वेतालभावको प्राप्त हुआ। इस धनुष्कोटिके दर्शनसे वह वेताल भी वेताल-योनिसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त हुआ है। जो मनुष्य आश्विनमासके कृष्णपक्षमें अत्यन्त लोभवश पितरोंके उद्देश्यसे महालय श्राद्ध नहीं करते, वे वेताल होते हैं। जो आश्विनमासके कृष्णपक्षमें महालय श्राद्धके अवसरपर अपनी शक्तिके अनुसार एक, दो या तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। भादों शुक्लपक्षसे लेकर मार्गशीर्षमासके अन्ततक तत्त्वदर्शी मुनियोंने महालय श्राद्धका समय बतलाया है। इसमें भी भादोंका शुक्लपक्ष विशिष्ट है और उसकी अपेक्षा भी आश्विनका कृष्णपक्ष अधिक उत्तम माना गया है। उस कृष्णपक्षमें प्रतिपदा तिथिको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय श्राद्ध करता है, उसके ऊपर सबको पवित्र करनेवाले भगवान् अग्निदेव प्रसन्न होते हैं। वह अग्निलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य द्वितीया तिथिमें महालय श्राद्ध करता है, उसके ऊपर गिरिजापति भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं और वह कैलाशको प्राप्त होता है। जो तृतीया तिथिमें भक्तिपूर्वक महालय श्राद्ध करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता अनुग्रह करते हैं। इसी प्रकार तृतीयासे लेकर चतुर्दशीतक महालय श्राद्धकी उत्तरोत्तर अधिक-से-अधिक महिमा है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अमावास्या तिथिमें महालय श्राद्ध करता है, उसके पितरोंको अनन्तकालतक तृप्ति बनी रहती है। स्वर्गलोकमें देवताओंको अमृत पीनेसे जो तृप्ति प्राप्त होती है, वैसी ही अनन्त तृप्ति पितरोंको अमावास्यामें महालय श्राद्ध करनेसे होती है। अमावास्या तिथि भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है। यह परम शान्त तिथि है। इसमें महालय श्राद्ध करके वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अमावास्याको श्राद्ध करनेवाला पुरुष प्रत्यगात्मा और ब्रह्मकी एकताको जानकर सायुज्य मोक्षको प्राप्त होता है।'
'भाद्रपदमास आनेपर देवस्वरूप पितर हर्षसे नाचने लगते हैं कि हमारे पुत्र हमलोगोंको तृप्तिके उद्देश्यसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करायेंगे। उस भोजनसे हमें अत्यन्त दारुण नरकका क्लेश नहीं भोगना पड़ेगा और जबतक चन्द्रमा तथा सूर्य बने
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६९
रहेंगे, तबतक हमारा स्वर्गलोकमें निवास होगा। पितरोंको तृप्ति देनेवाले भाद्रपदमास एवं आश्विन-मास प्राप्त होनेपर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इससे उसके पितृकुल और मातृकुलके पितर तृप्तिको प्राप्त होते हैं। आश्विन कृष्णा सप्तमीसे लेकर अमावास्यातक मनुष्य प्रतिदिन तीन-तीन ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। द्वादशीसे लेकर अमावास्यातक तो अवश्य ही ऐसा करे। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको इस प्रकार भोजन करावे, जिससे उन्हें पूर्णतः तृप्ति हो। उस ब्राह्मणकी तृप्तिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तृप्त होते हैं। अग्निष्वात्त आदि पितर, इन्द्र आदि देवता और अधिक कहाँतक कहें, तीनों लोक भी तृप्त होते हैं। मनुष्य महालय पार्वणविधिसे श्राद्ध करे। महालय श्राद्धमें पितृकुलके पितरोंकी ही भाँति मातृकुलके मातामहादि पितरोंको भी प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जैसे आगे चलनेवाले बैलोंके बिना गाड़ी रास्तेमें आगे नहीं बढ़ती, उसी प्रकार पितृयज्ञ भी बिना दक्षिणाके सफल नहीं होता। अतः कल्याणकी सिद्धिके लिये महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। यदि माता-पिताके क्षयाहके दिन एक-उद्दिष्ट श्राद्ध भूलसे न किया गया हो तो भी महालय श्राद्ध अवश्य करे। यदि अपने पास शक्ति न हो तो दूसरोंसे धनकी याचना करके भी पितरोंका महालय श्राद्ध करे। पहले ब्राह्मणोंसे याचना करनी चाहिये। यदि उनसे धन-धान्य आदिकी प्राप्ति न हो तो महालय श्राद्ध करनेकी इच्छासे उत्तम क्षत्रियोंके यहाँ याचना करे। यदि क्षत्रिय भी देनेवाले न हों तो वैश्योंसे माँगे। यदि लोकमें वैश्य भी दाता न हों तो पितरोंकी तृप्तिके लिये भाद्रपदमासमें गोग्रास अर्पण करे। यदि भादों या आश्विनमासमें सूतक आदिके द्वारा श्राद्धमें विघ्न उपस्थित हो जाय, तो सूतकका समय निवृत्त होनेपर अगहनमासके भीतर किसी दिन भी पार्वण श्राद्ध कर लेना चाहिये। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह महालय श्राद्धके लिये नौ ब्राह्मणोंका वरण करे। एक ब्राह्मण पिताके लिये, एक पितामहके लिये और एक प्रपितामहके लिये वरण करे। इसी प्रकार मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामहके लिये भी एक-एक ब्राह्मणका वरण करे। दो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका वरण विश्वेदेवोंके लिये करे और एक वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण भगवान् विष्णुके लिये करना चाहिये। अथवा पितृवर्गके लिये एक, मातामह वर्गके लिये एक, विश्वेदेवोंके लिये एक और भगवान् विष्णुके लिये एक। इस प्रकार चार ब्राह्मणोंका महालय श्राद्धके लिये वरण करे। वे ब्राह्मण वेदज्ञ एवं सुशील होने चाहिये। जो खोटे स्वभाववाले ब्राह्मणोंका वरण करता है, वह श्राद्धका घातक है। भाद्रपद शुक्लपक्षमें अथवा विशेषतः आश्विन कृष्णपक्षमें महालय श्राद्ध करना चाहिये। जो श्रद्धापूर्वक इस प्रकार महालय श्राद्ध करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। महालय श्राद्ध नित्यकर्ममें गिना जाता है। अतः उसे न करनेपर बड़ा भारी पाप लगता है।'
'धर्मपुत्र युधिष्ठिर वनवासमें महालय श्राद्ध करनेसे ही दुःखके समुद्रसे पार हो धृतराष्ट्रपुत्रोंको मारकर युद्धमें विजयी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, कुत्स, गौतम, अंगिरा, काश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, अगस्त्य, पराशर, मृकण्ड तथा अन्यान्य मुनिवर विधिपूर्वक उत्तम महालय श्राद्धका अनुष्ठान करके ही अणिमा आदि आठों सिद्धियों, व्रतों और तपस्याओंके निवासस्थान बन गये। महालय श्राद्ध करनेसे ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ। अतः अपना कल्याण एवं अभ्युदय चाहनेवाले पुरुषको महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। तुम्हारे भीतर जिस भूतने प्रवेश किया था, वह पूर्वजन्ममें ब्राह्मण
| ५७० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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था। उसका नाम वेदनिधि था। वह महात्मा भरद्वाजका पुत्र तथा कुशस्थली ग्रामका निवासी था। उसने विधिपूर्वक महालय श्राद्धको नहीं किया, इसलिये पितरोंके शापसे वह वेताल हो गया। दुराचार! तुम भाद्रपदमास (आश्विन कृष्णपक्ष) में पितरोंकी तृप्तिके लिये षड्रस भोजन तैयार करके ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराओ। ऐसा करनेसे तुम्हें कभी दरिद्रता नहीं होगी और तुम सदा सुखी रहोगे। आजसे तुम कभी महापातकियोंसे संसर्ग न रखना, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। अब शीघ्रतापूर्वक अपने देशको चले जाओ।' | योगी दत्तात्रेय मुनिके इस प्रकार आज्ञा देनेपर दुराचार कृतार्थमनसे उन्हें प्रणाम करके अपने देशको चला गया और दत्तात्रेयजीके बताये हुए मार्गसे अपने वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा। उसने महापातकियोंका संसर्ग त्याग दिया। श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटितीर्थमें स्नान करनेकी महिमासे दुराचार देहान्त होनेपर परम मोक्षको प्राप्त हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुराचारके उद्धारकी पवित्र कथा कह सुनायी। इस प्रकार धनुष्कोटितीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।
क्षीरकुण्डकी उत्पत्ति और महिमा—महर्षि मुद्गलको भगवान् विष्णुका दर्शन
**श्रीसूतजी कहते हैं—**नैमिषारण्यनिवासियो! चक्रतीर्थसे लेकर धनुष्कोटिपर्यन्त चौबीस तीर्थोंका तुमसे वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो?
**मुनि बोले—**सूतजी! हमलोग क्षीरकुण्डका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, जिसके समीप पहले आपने चक्रतीर्थकी स्थिति बतलायी है।
**सूतजीने कहा—**मुनिवरो! परम पवित्र देवीपुरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर फुल्लग्रामके नामसे प्रसिद्ध बड़ा भारी स्थान है, जहाँसे प्रारम्भ करके श्रीरामचन्द्रजीने महासागरमें सेतु बाँधा है। वह फुल्लग्राम अतिशय पुण्यतम क्षेत्र है। वहाँपर महापातकोंका नाश करनेवाला क्षीरकुण्ड है, जो दर्शन, स्पर्श, ध्यान और कीर्तनसे भी मोक्ष देनेवाला है। प्राचीन कालमें दक्षिण समुद्रके तटपर अतिशय पवित्र फुल्लग्राममें वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले मुद्गल नामक मुनि निवास करते थे। उन्होंने भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाले एक उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञसे सन्तुष्ट होकर प्रसन्नात्मा भगवान् विष्णु उनके आगे प्रकट हुए। उनकी कान्ति श्याम मेघके समान थी। वे पीताम्बरसे सुशोभित थे। विनतानन्दन गरुड़की पीठपर बैठे हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। उनका दर्शन करके मुद्गल मुनि भक्ति एवं प्रेमसे विह्वल हो गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने कानोंको सुख देनेवाले मधुर शब्दोंमें भगवान् विष्णुका स्तवन किया।
**मुद्गल बोले—**पहले संसारके सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके रूपमें, तत्पश्चात् उसका पालन करनेवाले विष्णुके रूपमें, तदनन्तर जगत्का संहार करनेवाले रुद्ररूपमें आप भगवान् नारायणको मेरा नमस्कार है। मत्स्य और कच्छपरूप धारण करनेवाले आप सच्चिदानन्दमय प्रभुको प्रणाम है। वराह और नृसिंह्यरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन और परशुरामरूपधारी आप भगवान्को प्रणाम है। राम और बलरामके रूपमें आपको नमस्कार
- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७१
है। श्रीकृष्ण, कल्कि तथा विज्ञानात्मा बुद्धके रूपमें आपको नमस्कार है। करुणासिन्धो! नारायण! जगत्पते! आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं निर्लज्ज, कृपण, क्रूर, चुगलखोर, दम्भी, दुर्बल, परायी स्त्री, पराये धन और पराये क्षेत्रके लिये सदा लोलुप रहनेवाला तथा मनसे सबके दोषोंपर ही दृष्टि रखनेवाला हूँ। हरे! कृपया मेरी रक्षा कीजिये।
महर्षि मुद्गलके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात् भगवान् विष्णु मेघके समान गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले—मुद्गल! मैं तुम्हारे इस स्तोत्र और यज्ञसे बहुत प्रसन्न हूँ और प्रत्यक्षरूपसे हविष्यको भोग लगानेके लिये तुम्हारे यज्ञमें आया हूँ।
मुद्गलने कहा—हृषीकेश! मैं कृतार्थ हो गया। मेरी धर्मपत्नी भी धन्य-धन्य हो गयी। आज मेरा जन्म सफल हुआ। मेरी तपस्या सफल हुई; मेरा वंश, मेरे पुत्र, मेरा आश्रय और मेरा सब कुछ आज सफल हो गया। क्योंकि आप साक्षात् भगवान् विष्णु मेरी यज्ञशालामें हविष्य ग्रहण करनेके लिये पधारे हैं। योगपरायण योगी लोग अपने हृदयमें जिनकी खोज करते हैं, उन्हीं आप नारायणको मैं आज प्रत्यक्ष देख रहा हूँ।
ऐसा कहकर भगवान् विष्णुके लिये आसन दे मुनिने चन्दन और पुष्प आदि उपचारोंसे भगवान्को अर्घ्य दे उनका पूजन किया और उनके लिये प्रसन्नतापूर्वक पुरोडाश आदि हविष्य अर्पण किया। विश्वभावन भगवान् विष्णुने महर्षि मुद्गलके द्वारा समर्पित उस हविष्यको स्वयं हाथसे लेकर भोजन किया। भगवान् विष्णुके द्वारा उस हविष्यके भोजन करनेपर अग्निसहित सम्पूर्ण देवता तृप्त हो गये। इतना ही नहीं, ऋत्विज्, यजमान, वहाँके ब्राह्मण तथा जीवलोकमें जो कोई भी चराचर प्राणी थे, वे सब-के-सब तृप्त हो गये। सम्पूर्ण जगत् तृप्त हुआ। तदनन्तर भगवान् विष्णुने कहा—'सुव्रत! मैं प्रसन्न हूँ और वर देनेको उद्यत हूँ, अतः कोई वर माँगो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर महर्षि बोले—'प्रभो! आपने प्रत्यक्षरूपसे दर्शन देकर मेरे यज्ञमें हविष्यको भोग लगाया है। इतनेसे ही मैं कृतार्थ हो गया। इससे अधिक और क्या वर हो सकता है। तथापि भगवन्! 'आपमें निश्चल एवं निष्कपट भक्ति सदा बनी रहे' यह मेरा प्रथम वर है। माधव! मैं प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल आपके स्वरूपभूत अग्निकी तृप्ति एवं आपकी प्रीतिके लिये गायके दूधसे हवन करना चाहता हूँ, मेरी यह इच्छा पूर्ण हो—यह मेरे लिये दूसरा वर है।' मुद्गलजीके ऐसा कहनेपर भगवान् नारायणने अमृतभोजी देवता विश्वकर्मा शिल्पीको बुलाकर उनके द्वारा एक सुन्दर सरोवरका निर्माण करवाया। विश्वकर्माने उसे चारों ओरसे चहारदीवारी आदि लगाकर सब प्रकारसे सुशोभित कर दिया। उसके बाद भगवान्ने सुरभिको बुलाकर कहा—'सुरभे! ये मेरे भक्त मुद्गलजी प्रतिदिन मेरी प्रसन्नताके लिये दूधसे हवन करना चाहते हैं। अतः तुम मेरे आदेशसे नित्य सबेरे और सन्ध्याके समय यहाँ आकर इस सरोवरको दूधसे भर दिया करो।' सुरभिने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्की आज्ञा स्वीकार की। फिर भगवान्ने मुद्गलजीसे कहा—'ब्रह्मन्! इस सरोवरमें सदा सुरभिका दूध वर्तमान रहेगा। तुम उसके द्वारा प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल मेरी प्रसन्नताके लिये अग्निमें होम करो। इससे मैं तुमपर प्रसन्न रहूँगा और मेरी प्रसन्नतासे तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी। यह 'क्षीरसरोवर' नामसे विख्यात तीर्थ होगा। इसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके पाँच महापातक तथा अन्यान्य पाप तत्काल नष्ट हो जायेंगे। मुद्गल! तुम देहावसान होनेपर सब बन्धनोंसे मुक्त हो मुझे प्राप्त होओगे।'
यों कहकर भगवान् विष्णुने मुद्गलको हृदयसे