भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 599
५७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। उसका नाम वेदनिधि था। वह महात्मा भरद्वाजका पुत्र तथा कुशस्थली ग्रामका निवासी था। उसने विधिपूर्वक महालय श्राद्धको नहीं किया, इसलिये पितरोंके शापसे वह वेताल हो गया। दुराचार! तुम भाद्रपदमास (आश्विन कृष्णपक्ष) में पितरोंकी तृप्तिके लिये षड्रस भोजन तैयार करके ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराओ। ऐसा करनेसे तुम्हें कभी दरिद्रता नहीं होगी और तुम सदा सुखी रहोगे। आजसे तुम कभी महापातकियोंसे संसर्ग न रखना, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। अब शीघ्रतापूर्वक अपने देशको चले जाओ।' | योगी दत्तात्रेय मुनिके इस प्रकार आज्ञा देनेपर दुराचार कृतार्थमनसे उन्हें प्रणाम करके अपने देशको चला गया और दत्तात्रेयजीके बताये हुए मार्गसे अपने वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा। उसने महापातकियोंका संसर्ग त्याग दिया। श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटितीर्थमें स्नान करनेकी महिमासे दुराचार देहान्त होनेपर परम मोक्षको प्राप्त हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुराचारके उद्धारकी पवित्र कथा कह सुनायी। इस प्रकार धनुष्कोटितीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।


क्षीरकुण्डकी उत्पत्ति और महिमा—महर्षि मुद्गलको भगवान् विष्णुका दर्शन

**श्रीसूतजी कहते हैं—**नैमिषारण्यनिवासियो! चक्रतीर्थसे लेकर धनुष्कोटिपर्यन्त चौबीस तीर्थोंका तुमसे वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो?

**मुनि बोले—**सूतजी! हमलोग क्षीरकुण्डका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, जिसके समीप पहले आपने चक्रतीर्थकी स्थिति बतलायी है।

**सूतजीने कहा—**मुनिवरो! परम पवित्र देवीपुरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर फुल्लग्रामके नामसे प्रसिद्ध बड़ा भारी स्थान है, जहाँसे प्रारम्भ करके श्रीरामचन्द्रजीने महासागरमें सेतु बाँधा है। वह फुल्लग्राम अतिशय पुण्यतम क्षेत्र है। वहाँपर महापातकोंका नाश करनेवाला क्षीरकुण्ड है, जो दर्शन, स्पर्श, ध्यान और कीर्तनसे भी मोक्ष देनेवाला है। प्राचीन कालमें दक्षिण समुद्रके तटपर अतिशय पवित्र फुल्लग्राममें वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले मुद्गल नामक मुनि निवास करते थे। उन्होंने भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाले एक उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञसे सन्तुष्ट होकर प्रसन्नात्मा भगवान् विष्णु उनके आगे प्रकट हुए। उनकी कान्ति श्याम मेघके समान थी। वे पीताम्बरसे सुशोभित थे। विनतानन्दन गरुड़की पीठपर बैठे हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। उनका दर्शन करके मुद्गल मुनि भक्ति एवं प्रेमसे विह्वल हो गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने कानोंको सुख देनेवाले मधुर शब्दोंमें भगवान् विष्णुका स्तवन किया।

**मुद्गल बोले—**पहले संसारके सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके रूपमें, तत्पश्चात् उसका पालन करनेवाले विष्णुके रूपमें, तदनन्तर जगत्‌का संहार करनेवाले रुद्ररूपमें आप भगवान् नारायणको मेरा नमस्कार है। मत्स्य और कच्छपरूप धारण करनेवाले आप सच्चिदानन्दमय प्रभुको प्रणाम है। वराह और नृसिंह्यरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन और परशुरामरूपधारी आप भगवान्‌को प्रणाम है। राम और बलरामके रूपमें आपको नमस्कार