भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 598
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६९

रहेंगे, तबतक हमारा स्वर्गलोकमें निवास होगा। पितरोंको तृप्ति देनेवाले भाद्रपदमास एवं आश्विन-मास प्राप्त होनेपर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इससे उसके पितृकुल और मातृकुलके पितर तृप्तिको प्राप्त होते हैं। आश्विन कृष्णा सप्तमीसे लेकर अमावास्यातक मनुष्य प्रतिदिन तीन-तीन ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। द्वादशीसे लेकर अमावास्यातक तो अवश्य ही ऐसा करे। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको इस प्रकार भोजन करावे, जिससे उन्हें पूर्णतः तृप्ति हो। उस ब्राह्मणकी तृप्तिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तृप्त होते हैं। अग्निष्वात्त आदि पितर, इन्द्र आदि देवता और अधिक कहाँतक कहें, तीनों लोक भी तृप्त होते हैं। मनुष्य महालय पार्वणविधिसे श्राद्ध करे। महालय श्राद्धमें पितृकुलके पितरोंकी ही भाँति मातृकुलके मातामहादि पितरोंको भी प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जैसे आगे चलनेवाले बैलोंके बिना गाड़ी रास्तेमें आगे नहीं बढ़ती, उसी प्रकार पितृयज्ञ भी बिना दक्षिणाके सफल नहीं होता। अतः कल्याणकी सिद्धिके लिये महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। यदि माता-पिताके क्षयाहके दिन एक-उद्दिष्ट श्राद्ध भूलसे न किया गया हो तो भी महालय श्राद्ध अवश्य करे। यदि अपने पास शक्ति न हो तो दूसरोंसे धनकी याचना करके भी पितरोंका महालय श्राद्ध करे। पहले ब्राह्मणोंसे याचना करनी चाहिये। यदि उनसे धन-धान्य आदिकी प्राप्ति न हो तो महालय श्राद्ध करनेकी इच्छासे उत्तम क्षत्रियोंके यहाँ याचना करे। यदि क्षत्रिय भी देनेवाले न हों तो वैश्योंसे माँगे। यदि लोकमें वैश्य भी दाता न हों तो पितरोंकी तृप्तिके लिये भाद्रपदमासमें गोग्रास अर्पण करे। यदि भादों या आश्विनमासमें सूतक आदिके द्वारा श्राद्धमें विघ्न उपस्थित हो जाय, तो सूतकका समय निवृत्त होनेपर अगहनमासके भीतर किसी दिन भी पार्वण श्राद्ध कर लेना चाहिये। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह महालय श्राद्धके लिये नौ ब्राह्मणोंका वरण करे। एक ब्राह्मण पिताके लिये, एक पितामहके लिये और एक प्रपितामहके लिये वरण करे। इसी प्रकार मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामहके लिये भी एक-एक ब्राह्मणका वरण करे। दो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका वरण विश्वेदेवोंके लिये करे और एक वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण भगवान् विष्णुके लिये करना चाहिये। अथवा पितृवर्गके लिये एक, मातामह वर्गके लिये एक, विश्वेदेवोंके लिये एक और भगवान् विष्णुके लिये एक। इस प्रकार चार ब्राह्मणोंका महालय श्राद्धके लिये वरण करे। वे ब्राह्मण वेदज्ञ एवं सुशील होने चाहिये। जो खोटे स्वभाववाले ब्राह्मणोंका वरण करता है, वह श्राद्धका घातक है। भाद्रपद शुक्लपक्षमें अथवा विशेषतः आश्विन कृष्णपक्षमें महालय श्राद्ध करना चाहिये। जो श्रद्धापूर्वक इस प्रकार महालय श्राद्ध करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। महालय श्राद्ध नित्यकर्ममें गिना जाता है। अतः उसे न करनेपर बड़ा भारी पाप लगता है।'

'धर्मपुत्र युधिष्ठिर वनवासमें महालय श्राद्ध करनेसे ही दुःखके समुद्रसे पार हो धृतराष्ट्रपुत्रोंको मारकर युद्धमें विजयी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, कुत्स, गौतम, अंगिरा, काश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, अगस्त्य, पराशर, मृकण्ड तथा अन्यान्य मुनिवर विधिपूर्वक उत्तम महालय श्राद्धका अनुष्ठान करके ही अणिमा आदि आठों सिद्धियों, व्रतों और तपस्याओंके निवासस्थान बन गये। महालय श्राद्ध करनेसे ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ। अतः अपना कल्याण एवं अभ्युदय चाहनेवाले पुरुषको महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। तुम्हारे भीतर जिस भूतने प्रवेश किया था, वह पूर्वजन्ममें ब्राह्मण