संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पिताकी बात मानकर शुकदेवजी महापुण्यमय रामसेतुरूप गन्धमादन पर्वतपर गये और शुद्धिदायक जटातीर्थमें स्नान करनेकी इच्छासे संकल्प करके उसमें स्नान किया। इससे अन्तःशुद्धिको पाकर अज्ञानका नाश हो जानेपर वे अपने परमानन्द-स्वरूपको प्राप्त हो गये। दूसरे लोग भी, जो मनकी शुद्धि चाहते हैं, जटातीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करें। वेदोंके प्रवचनसे, पुण्यसे, यज्ञ, दान, तप और व्रतसे तथा उपवास, जप और योगसे भी मनुष्योंके मनकी शुद्धि होती है, किंतु परमपावन जटातीर्थमें स्नान कर लेनेपर इन पूर्वोक्त साधनोंके बिना भी निश्चितरूपसे मनकी शुद्धि हो जाती है। इस प्रकार यह जटातीर्थका माहात्म्य बतलाया गया।
लक्ष्मीतीर्थ और अग्नितीर्थका माहात्म्य—पिशाचयोनिको प्राप्त हुए दुष्पण्यका उद्धार
श्रीसूतजी कहते हैं—सब पातकोंका नाश करनेवाले जटातीर्थमें स्नान करके विशुद्ध चित्तवाला पुरुष लक्ष्मीतीर्थको जाय। जो-जो कामना मनमें रखकर मनुष्य लक्ष्मीतीर्थमें स्नान करता है, वह सब प्राप्त कर लेता है। लक्ष्मीतीर्थ बड़ी भारी दरिद्रताकी शान्ति करनेवाला, महान् धन-धान्यकी समृद्धि देनेवाला, बड़े-बड़े दुःखोंका नाश करनेवाला और महान् वैभवको बढ़ानेवाला है। वह स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला, महान् ऋणसे छुटकारा दिलानेवाला तथा श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करनेवाला है। ब्राह्मणो! इस प्रकार यह लक्ष्मीतीर्थका माहात्म्य बतलाया गया।
इस तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् अग्नितीर्थको जाय। वह महापुण्यमय और महापातकोंका विनाशक है। पूर्वकालमें रावणको उसकी सेनासहित मारकर तथा विभीषणको लंकाका राजा बनाकर दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी जब सीता और लक्ष्मणके साथ सेतुमार्गसे गन्धमादन पर्वतपर आये, तब लक्ष्मीतीर्थके किनारे ठहरकर उन्होंने देवताओं, ऋषियों और पितरोंके समीप वहाँ अग्निदेवका आवाहन किया। तब लक्ष्मीतीर्थसे कुछ दूरपर अग्निदेव महासागरसे ऊपर उठे और मानवरूपधारी श्रीरघुनाथजीको देखकर इस प्रकार बोले—'राम! राक्षसोंको भय देनेवाले महाबाहु श्रीराम! आपने जो रावणका वध किया है, वह जानकीजीके पातिव्रत्य धर्मके बलसे ही सम्भव हुआ है। यह बात सत्य है, सत्य है, सत्य है। ये साक्षात् जगन्माता लक्ष्मी हैं। इन्होंने लीलाके लिये मानव-शरीर धारण किया है। जब आप देवशरीरमें स्थित होते हैं, तब ये भी दिव्य देहसे आपकी सेवा करती हैं। आपने मानवशरीर धारण किया है, इसलिये ये भी मानवकन्याके रूपमें प्रकट हुई हैं। आप भगवान् विष्णुके शरीरके अनुरूप ही ये भी शरीर धारण कर लेती हैं। जगत्स्वामिन्! देवाधिदेव