भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 576
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४७

नहीं सुने गये, उनका भी बिना गुरुके ही ज्ञान हो जाना, सब लोकोंमें बेरोक-टोक आना-जाना, इन्द्रियातीत विषयोंका भी साक्षात्कार होना, देवताओंसे वार्तालाप होना, चींटी आदि जन्तुओंकी भी बातें समझ लेना तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकोंमें भी चला जाना आदि जो योगियोंको प्राप्त होनेवाली एवं अन्यान्य दुर्लभ सिद्धियाँ हैं, वे सभी श्रीरामतीर्थके सेवनसे सुतीक्ष्णजीको प्राप्त हो गयीं। उस तीर्थका ऐसा ही प्रभाव है। वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके द्वारा बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वह अपमृत्युनिवारक, भोग-मोक्षदायक तथा नरकसम्बन्धी क्लेशोंको दूर करनेवाला है। वह तीर्थ सदा श्रीरामचन्द्रजीकी भक्ति देनेवाला तथा संसारबन्धनका नाश करनेवाला है। रामतीर्थके तटपर समस्त लोकोंपर अनुग्रहकी इच्छासे महान् शिवलिंग प्रकट हुआ है। उस तीर्थमें स्नान करके उक्त शिवलिंगका दर्शन करनेसे मनुष्योंको मोक्षतक प्राप्त हो जाता है, फिर अन्य विभूतियोंकी तो बात ही क्या है?

तारकब्रह्म श्रीरामचन्द्रजीके तीर्थमें स्नान करनेके अनन्तर चित्तको एकाग्र करके श्रीलक्ष्मणजीके तीर्थमें जाय। उसमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हुआ मनुष्य निर्मल मुक्तिको प्राप्त होता है। लक्ष्मणतीर्थके तटपर जो उनके मन्त्रका जप करता है, वह सब शास्त्रोंका विद्वान् और चारों वेदोंका ज्ञाता होता है। उसके तटपर लक्ष्मणजीने महान् शिवलिंगकी स्थापना की है। जो उस तीर्थमें स्नान करके लक्ष्मणेश्वरका सेवन करता है, वह इस संसारमें दरिद्रता, रोग और संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

लक्ष्मणजीके महान् तीर्थमें स्नान करके अपने चित्तकी शुद्धिके लिये जटातीर्थमें जाना चाहिये। पूर्वकालमें साक्षात् भगवान् शंकरने गन्धमादन पर्वतपर सबके उपकारके लिये इस अज्ञाननाशक तीर्थको प्रकट किया है। रावणके मारे जानेपर धर्मात्मा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने जिस जलमें अपनी जटाको धोया था, वही जटातीर्थ कहलाता है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके अन्तःकरणकी शुद्धि हो जाती है। उससे ज्ञान होता है और उस ज्ञानसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वह अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूपसे स्थित होता है। पूर्वकालमें मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको प्रणाम करके शुकदेवजीने पूछा—'तात! जिससे अन्तःकरणकी शुद्धि, अज्ञानका नाश, ज्ञानका उदय और अन्तमें सनातन मुक्ति प्राप्त हो, वह उपाय मुझे बतलाइये।'

व्यासजी बोले—बेटा शुकदेव ! महापुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर जो रामसेतु है, वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला जटातीर्थ है। वह अविद्याकी ग्रन्थिको भेदन करनेवाला, अन्तःकरणको शुद्ध बनानेवाला तथा मनुष्योंके जन्म-मृत्यु आदि भयका नाश करनेवाला है। वहाँ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने अपनी जटा धोयी है और उस तीर्थको यह वरदान दिया है कि 'यज्ञ, ज्ञान, जप और उपवासके बिना ही केवल जटातीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्योंकी बुद्धि शुद्ध हो जायगी।'

शुक ! वरुणनन्दन भृगुने पूर्वकालमें अपने पितासे जब बुद्धिको शुद्ध करनेवाले शुभ एवं पावन उपायके विषयमें प्रश्न किया, तब वरुणने उन्हें जटातीर्थमें स्नान करनेकी सलाह दी। पिताके कहनेसे भृगुजी जटातीर्थमें गये और वहाँ स्नान करनेसे उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी। तत्पश्चात् वे अद्वैत बोध प्राप्त करके अखण्ड सच्चिदानन्दस्वरूप पूर्णतम परमात्मरूपसे स्थित हुए। इसी प्रकार शिवजीके अंश दुर्वासा भी जटातीर्थमें स्नान करनेसे अन्तःशुद्धिको प्राप्त हो ब्रह्मानन्दमय हो गये। जो अपने अज्ञानका नाश चाहता है, वह सब पापोंका नाश करनेवाले पुण्यमय परम शुद्ध जटातीर्थमें स्नान करे। इसलिये तुम जटातीर्थमें जाओ और मनको शुद्ध करनेवाले उस पुण्यदायक तीर्थमें स्नान करो।