संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भी उन्हींका अनुसरण किया। राजाके ज्येष्ठ पुत्र सुचन्द्रने पिता-माताका दाहसंस्कार करके श्रद्धापूर्वक श्राद्धपर्यन्त सब कर्म किये। राजा पत्नियोंसहित वैकुण्ठलोकमें गये। सुचन्द्र आदि सब महातेजस्वी राजकुमार आपसमें ईर्ष्या-द्वेषका त्याग करके अपने-अपने राज्यका उपभोग करने लगे। अतः समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये मनुष्य हनुमान्जीके कुण्डमें स्नान करे।
हनुमत्कुण्डमें स्नान करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर अगस्त्यतीर्थमें जाय। साक्षात् अगस्त्यजीने इस तीर्थका निर्माण किया है। एक समयकी बात है, अगस्त्यजी दक्षिणके देशोंमें भ्रमण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर गये। वहाँ गन्धमादनका माहात्म्य जानकर महर्षि अगस्त्यने अपने नामसे यह महापुण्यमय तीर्थ बनाया। वे आज भी अपनी धर्मपत्नी लोपामुद्राके साथ वहाँ निवास करते हैं। उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होता।
रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ और जटातीर्थकी महिमा
**श्रीसूतजी कहते हैं—**अगस्त्यतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् सब पापोंसे मुक्त होनेके लिये परम पवित्र रामकुण्डको जाय। रघुनाथजीका वह पवित्र सरोवर पुण्यदायक तथा पापोंका अपहरण करनेवाला है। रामकुण्डके किनारे किया हुआ थोड़ी दक्षिणावाला यज्ञ भी पूर्ण फल देनेवाला होता है। इसी प्रकार स्वाध्याय और जप भी थोड़ा भी हो, तो वहाँ पूर्ण फलद होता है। रामकुण्डके किनारे मुट्ठीभर अन्न भी यदि वेदज्ञ ब्राह्मणको दिया जाय, तो वह अनन्तगुना फल देनेवाला होता है। विप्रवरो! मुनिवर अगस्त्यके शिष्य एक मुनि थे, जो अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते थे। उनका नाम सुतीक्ष्ण था। वे भगवान् श्रीरामके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए रामकुण्डके तटपर अत्यन्त दुष्कर तपस्या करने लगे। प्रतिदिन श्रीरामचन्द्रजीके षडक्षर मन्त्र* रूप मन्त्रराजका पाँच हजार जप करते थे। आलस्य छोड़कर रघुनाथसरोवरके जलमें स्नान करते, भिक्षाके अन्नका नियमपूर्वक आहार करते तथा क्रोधको काबूमें और इन्द्रियोंको वशमें रखते थे। इस प्रकार उनका बहुत समय व्यतीत हो गया। एक दिन सुतीक्ष्णजी सीतासहित श्रीरामका हृदयमें ध्यान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।
**सुतीक्ष्ण बोले—**जानकीनाथ! आपको नमस्कार है। विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाका व्रत लेनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार है। कौसल्यानन्दन! आपको नमस्कार है। विश्वामित्रजीके परमप्रिय! आपको प्रणाम है। शिवधनुषको भंग करनेवाले रघुवीर! आपको नमस्कार है। दशरथनन्दन विष्णो! आप परशुरामजीको जीतनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। समुद्रके गर्वको हरनेवाले और उसमें सेतुनिर्माण करनेवाले आपको प्रणाम है।
इस प्रकार सुतीक्ष्णजी श्रीरामचन्द्रजीमें चित्त लगाकर प्रतिदिन उनकी स्तुति करते हुए समय बिताते थे। सदा श्रीरामके षडक्षर मन्त्रका जप, उनकी स्तुति और रामकुण्डमें स्नान आदि करते हुए उनकी श्रीरामचन्द्रजीमें अत्यन्त निर्मल एवं निश्चल भक्ति हो गयी। उन्हें आत्मसाक्षात्कार करानेवाला अद्वैत विज्ञान प्राप्त हुआ और बिना पढ़े हुए ही तीनों वेदोंका ज्ञान हो गया। बिना सुनी हुई बातको भी जान लेना, दूसरेके शरीरमें प्रवेश करना, आकाशमें विचरण करना, समस्त कलाओंमें निपुण हो जाना, जो शास्त्र कभी
* 'ॐ रामाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र है।