संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४५
अवश्य ही महादेवजीका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं। जो एक बार ब्रह्मकुण्डमें स्नान कर लेता है, उसके लिये मोक्षधामके द्वारके कपाट खुल जाते हैं। यह उत्तम कुण्ड देवता, मनुष्य और मुनीश्वरोंसे वन्दित, सबके संसार-बन्धनका नाश करनेवाला, शुभकारक, सर्वपापहारक तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है।
महापुण्यमय ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर मनुष्य हनुमत्कुण्डपर जाय। पूर्वकालमें समस्त राक्षसोंका वध हो जानेपर जब युद्ध समाप्त हो गया और श्रीरामचन्द्रजी आदि लंकासे लौटकर गन्धमादन पर्वतपर आ गये, तब पवनपुत्र हनुमान्जीने सब लोकोंका उपकार करनेके लिये अपने नामसे एक उत्तम तीर्थका निर्माण किया, जो सब तीर्थोंसे उत्तम है। उसमें स्नान करके मनुष्य सनातन शिवलोकको प्राप्त होते हैं। पूर्वकालमें धर्मसख नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करते थे। वे शत्रुविजयी, परम धार्मिक, प्रजापालनपरायण तथा नीतिमान् थे। उनके सौ पतिव्रता स्त्रियाँ थीं। किंतु उनसे कोई वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र नहीं हुआ। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रवरो! मैंने बहुत सोच-विचारकर सौ स्त्रियोंसे विवाह किया, उन सबके साथ रहते हुए मेरी वृद्धावस्था आ गयी। अतः आप बतावें किस उपायसे मेरे बहुत-से पुत्र होंगे? मेरी सौ स्त्रियोंमेंसे प्रत्येकको एक-एक गुणवान् पुत्र हो जाय, वह यत्न सोचिये। छोटा-बड़ा अथवा दुष्कर ही कर्म क्यों न हो, यदि उससे यह कार्य सिद्ध होनेवाला हो, तो उसे मैं अवश्य करूँगा।'
राजाके इस प्रकार पूछनेपर सब ऋत्विज् और पुरोहित एकत्र हो उनसे अपना निश्चय किया हुआ विचार प्रकट करते हुए बोले—'राजन्! कोई परम पवित्र गन्धमादन पर्वत है, जो दक्षिण समुद्रके बीच सेतुके रूपमें विद्यमान है। वहाँ लोकविख्यात हनुमत्कुण्ड है, जो बड़े भारी दुःखोंका नाश करनेवाला और स्वर्ग एवं मोक्षरूपी फल देनेवाला है। वह नरकोंके क्लेशका निवारण तथा दरिद्रताको दूर करनेवाला है। पुत्रहीन मनुष्योंको पुत्र और स्त्रीहीन पुरुषोंको स्त्री देनेवाला है। वहाँ संयमपूर्वक स्नान करके तुम एकाग्रचित्त हो उस तीर्थके तटपर पुत्रेष्टि यज्ञ करो। उससे तुम्हारी सौ स्त्रियोंमें प्रत्येकको एक-एक पुत्र प्राप्त हो सकता है।' यह सुनकर राजा धर्मसख अपनी स्त्रियों, मन्त्रियों, सेवकों और पुरोहितजीको साथ ले यज्ञकी आवश्यक सामग्रीसहित दक्षिणसमुद्रके किनारे गन्धमादन पर्वतपर गये। वहाँ हनुमत्कुण्डमें जाकर उन्होंने सैनिकोंके साथ स्नान किया। इस प्रकार वे उसके किनारे एक मासतक ठहरकर प्रतिदिन स्नान करते रहे। तत्पश्चात् वसन्त आनेपर चैत्र मासमें पुरोहितसहित राजाने पुत्रेष्टि यज्ञ प्रारम्भ किया। पुरोहित और ऋत्विजोंने विधिपूर्वक सब कर्म सम्पन्न किये। सपत्नीक राजाका जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब पुरोहितने हवनसे बचे हुए हविष्यको लेकर राजाकी सब स्त्रियोंको भोजन कराया। उसके बाद राजा धर्मसखने अपनी सौ पत्नियोंके साथ यज्ञान्तस्नान किया और ऋत्विजोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। इस प्रकार यज्ञ पूरा करके मन्त्री, परिवार और पत्नियोंके साथ वे धर्मात्मा राजा प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको लौट आये। कुछ समयमें जब दसवाँ मास व्यतीत हो गया, तब उन सौ स्त्रियोंने सौ गुणवान् पुत्रोंको जन्म दिया। ब्राह्मणो! जब वे सब पुत्र बढ़कर युवा हुए, तब राजाने उन्हें राज्य बाँटकर दे दिया और स्वयं अपनी स्त्रियोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर हनुमत्कुण्डके किनारे जाकर तपस्या करने लगे। भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए तपस्यामें तत्पर हुए राजाको जब वहाँ बहुत समय व्यतीत हो गया, तब एक दिन वे मृत्युको प्राप्त हुए। उनकी पत्नियोंने