भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 573

५४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुनकर गोलभ सेनाके साथ युद्धके लिये तुरंत ही बाहर निकला और मनोजवके साथ तीन दिनोंतक युद्ध करता रहा। चौथे दिन मनोजवने युद्धमें ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके सेनासहित गोलभको नष्ट कर दिया। उसके बाद स्त्री और पुत्रसहित नगरमें आकर राजा समूची पृथ्वीका पालन करने लगा। तबसे उसने कभी अहंकार नहीं किया। असूया आदि दोषोंको त्याग दिया। अहिंसा, इन्द्रियसंयम और धर्ममें सदा तत्पर रहने लगा। इस प्रकार सहस्रों वर्षोंतक राजाने पृथ्वीका पालन किया। फिर विरक्त होकर अपने पुत्रको राज्य दे वह गन्धमादनपर्वतपर मंगलतीर्थपर चला गया। वहाँ हृदयमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गया। तदनन्तर थोड़े ही समयमें शरीर त्यागकर मनोजवने उस तीर्थके माहात्म्यसे शिवलोकको प्रस्थान किया। उसकी पत्नी सुमित्रा भी उसके शरीरका आलिंगन करके चितापर आरूढ़ हो गयी और पतिलोकको प्राप्त हुई।

इसलिये मंगलतीर्थ सर्वथा प्रयत्न करके सेवन करने योग्य है। यह तीर्थ अतिशय सुन्दर एवं कल्याणमय है। मनुष्योंको सदा भोग और मोक्ष देनेवाला है। पापराशिरूपी तिनकों और रूईके ढेरको जलानेके लिये अग्निके समान है। इसका मोक्षके लिये सब लोग सेवन करो।

o

एकान्तरामनाथ, ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड और अगस्त्यतीर्थका माहात्म्य

श्रीसूतजी कहते हैं— मंगल नामक महातीर्थमें स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य 'एकान्तरामनाथ' नामक उत्तम क्षेत्रमें जाय। वहाँ समस्त लोगोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे जगदीश्वर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सीता, लक्ष्मण तथा हनुमान् आदि वानरोंके साथ सदा निवास करते हैं। वहाँ 'अमृतवापिका' नामक एक पुण्यदायिनी पुष्करिणी है, जिसमें गोता लगानेवाले मनुष्योंको जरा और मृत्युका भय नहीं होता। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस अमृतवापीमें स्नान करता है, वह भगवान् शंकरके प्रसादसे अमृतत्वको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस तीर्थमें सावधान होकर तीन वर्षोंतक स्नान करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं।

ऋषियोंने पूछा— सूतजी! उस क्षेत्रका नाम 'एकान्तरामनाथ' कैसे हुआ?

श्रीसूतजी बोले— पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव, विभीषण, लक्ष्मण और मन्त्रज्ञ हनुमान् इन सबके साथ वानरोंद्वारा बाँधे हुए सेतुपर समुद्रके बीचमें एकान्त प्रदेशमें मन-ही-मन सीताका चिन्तन करते हुए कुछ सलाह करने लगे। उस समय समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंके साथ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसकी भयंकर ध्वनि बढ़ती ही चली जाती थी। इसलिये वे परस्परकी बातचीतको सुन नहीं पाते थे। तब श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रको बलपूर्वक काबूमें करके राक्षसोंको मारनेके विषयमें एकान्तमें उन सबके साथ परामर्श किया। इसीलिये उस क्षेत्रका नाम 'एकान्तरामनाथ' हो गया। उस स्थानपर आज भी समुद्रका जल निश्चल एवं शान्त दिखायी देता है। जो मनुष्य वहाँ जाकर अमृतवापीमें नियमपूर्वक स्नान करेंगे और श्रीराम आदिकी सेवामें तत्पर होंगे, वे सब मुक्तिको प्राप्त होंगे।

अमृतवापीमें स्नान और एकान्तरामनाथका सेवन करके जितेन्द्रिय मनुष्य ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके लिये जाय। गन्धमादनपर्वतपर सेतुके मध्यभागमें वह महातीर्थ ब्रह्मकुण्ड विद्यमान है। ब्रह्मकुण्डका दर्शन सब पापराशिका नाश करनेवाला है। वह लाखों ब्रह्महत्याओंका निवारण करनेवाला है। ब्रह्मकुण्डसे उत्पन्न हुए भस्मसे जो त्रिपुण्ड्र लगाते हैं, मोक्ष उनके हाथमें ही स्थित है। जो मनुष्य इस तीर्थमें आकर स्नान करते हैं, वे