भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 572
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५४३

पति हैं। हम दोनोंसे उत्पन्न यह चन्द्रकान्त हमारा पुत्र है। मेरे पतिदेव चन्द्रवंशी राजा मनोजव हैं। ये विक्रमाढ्यके पुत्र हैं। मैं इनकी पतिव्रता पत्नी सुमित्रा हूँ। गोलभने राजा मनोजवको युद्धमें परास्त किया है। ये राज्यसे भ्रष्ट हो अवलम्बशून्य होकर पत्नी और पुत्रके साथ इस भयंकर वनमें चले आये हैं। यहाँ मेरे भूखे पुत्रने हम दोनोंसे भोजन माँगा है। राजा अन्नहीन होनेके कारण पुत्रको क्षुधासे व्याकुल देख शोकसे मूर्च्छित हो गिर पड़े हैं।

रानीकी यह बात सुनकर दयालु पराशर मुनिने कहा—सुमित्रे! तुमको किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये। अब तुमलोगोंका अमंगल शीघ्र ही नष्ट हो जायगा। यों कहकर मन्त्र-जप करते हुए भगवान् शंकरका ध्यान करके पराशरजीने अपने हाथसे राजाका स्पर्श किया। महामुनिके हाथका स्पर्श पाते ही राजा मनोजव मूर्च्छा त्यागकर सहसा उठ बैठे और पराशर मुनिको प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'मुने! आज आपके चरणकमलोंके सेवनसे मेरी मूर्च्छा शीघ्र ही दूर हो गयी और मेरे सब पातकोंका भी नाश हो गया। जो पुण्यात्मा नहीं है, उसको आपका दर्शन कदापि नहीं हो सकता। मुझे शत्रुओंने अपने नगरसे बाहर निकाल दिया है। आप अपनी कृपादृष्टिसे देखकर मेरी रक्षा कीजिये।'

पराशरजी बोले—राजन्! तुम्हें शत्रुपर विजय पानेके लिये मैं एक उपाय बतलाता हूँ। परम पुण्यमय गन्धमादन पर्वतपर जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका परम पुण्यमय सेतु है, वहाँ सब ऐश्वर्योंको देनेवाला मंगलतीर्थ विद्यमान है। उस सरोवरमें सब लोगोंका उपकार करनेके लिये रघुनाथजी लक्ष्मीस्वरूपा सीताजीके साथ सदैव स्थित रहते हैं। तुम पुत्र और स्त्रीसहित वहाँ जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करो। उस तीर्थके प्रभावसे तुम्हें शीघ्र ही सब प्रकारके मंगलोंकी प्राप्ति होगी और युद्धमें शत्रुओंको जीतकर पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।

ऐसा कहकर राजा, रानी और बालक इन तीनोंके साथ पराशर मुनि मंगलतीर्थमें स्नानके उद्देश्यसे रामसेतुपर गये। वहाँ विधिपूर्वक संकल्प लेकर मुनिश्रेष्ठ पराशरने स्वयं स्नान किया और राजा आदिसे भी विधिपूर्वक स्नान करवाया। राजा, रानी और राजकुमारने वहाँ तीन महीनेतक नियमपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् मुनिने राजाको रामजीके एकाक्षर मन्त्रका, जो सब अनर्थोंका नाश करनेवाला है, उपदेश दिया। राजाने चालीस दिनोंतक विधिपूर्वक उस एकाक्षर मन्त्रका जप किया। इस प्रकार मन्त्र जपते हुए राजाके आगे एक सुदृढ़ धनुष प्रकट हुआ। दो अक्षय तरकश, सोनेकी मूठवाली दो तलवारें, एक ढाल, एक गदा, एक उत्तम मुशल, एक भयंकर शब्द करनेवाला शंख, एक घोड़ोंसे जुता हुआ रथ, सारथि, पताका, अग्निके समान प्रकाशमान सुवर्णमय कवच, हार, केयूर, मुकुट और वलय आदि आभूषण, सहस्रों दिव्य वस्त्र और दिव्य माला—ये सब वस्तुएँ उस तीर्थसे प्रकट हुईं। यह सब देखकर राजाने मुनिसे निवेदन किया। तब मुनिने तीर्थका जल लेकर उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसके द्वारा राजाका अभिषेक किया।

तदनन्तर राजा मनोजव कमर कसकर युद्धके लिये तैयार हुए। उन्होंने कवच, खड्ग, धनुष और बाण धारण किया। हार, केयूर, मुकुट और कंकण आदिसे विभूषित हो दिव्य वस्त्र धारणकर उस घोड़े जुते हुए रथपर बैठे। महामुनि पराशरने राजाको अंग, रहस्य, प्रयोग और उपसंहारकी विधिके साथ ब्रह्मास्त्र आदिका उपदेश दिया। राजाने रथसे उतरकर मुनिको प्रणाम किया और आशीर्वाद ले उनकी आज्ञा पाकर तथा उनकी परिक्रमा करके वे पत्नी और पुत्रके साथ विजयके लिये उस रथपर आरूढ़ हुए। नगरमें पहुँचकर राजाने शंख बजाया। शंखनाद