भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५५९

सुचरित मुनिसे कहा—'मुने! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।' तब मुनिने दयानिधान शिवजीसे कहा—'भगवन्! चन्द्रशेखर! वृद्धावस्थाके कारण मेरा शरीर बहुत ढीला हो गया है, इसलिये मैं कहीं भी जानेमें असमर्थ हूँ। तथापि सब तीर्थोंमें स्नान करनेकी मेरी इच्छा है। अतः सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, उसकी प्राप्तिका साधन मुझे भी बताइये।'

महादेवजी बोले—श्रीरामचन्द्रजीके सेतुसे पवित्र हुए इस गन्धमादन पर्वतपर मैं सम्पूर्ण तीर्थोंका आवाहन करूँगा।

यों कहकर महादेवजीने मुनिकी प्रसन्नताके लिये वहाँ सब तीर्थोंका आवाहन किया और सुचरितसे इस प्रकार कहा—'मुने! यहाँ सब तीर्थोंका निवास होनेसे इसका नाम 'सर्वतीर्थ' होगा। यह सर्वतीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होगा। अतः शीघ्र मुक्ति पानेके लिये इस तीर्थमें स्नान करो। यह काम, मोह, भय, क्रोध, लोभ और रोग आदिका नाशक, तत्काल मोक्षकी प्राप्तिका साधन, जन्म-मृत्यु आदि ग्राहसमूहोंसे भरे हुए संसारसमुद्रसे पार उतारनेवाला तथा कुम्भीपाक आदि समस्त नरकोंकी आग बुझा देनेवाला है।'

भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सुचरितने उनके समीप ही सर्वतीर्थमें स्नान किया। स्नान करके जब वे जलसे बाहर निकले, तब सब मनुष्योंने देखा, उनके शरीरमें वृद्धावस्थाकी झुर्रियाँ नहीं रह गयी हैं और वे अत्यन्त सुन्दर तरुण हो गये हैं।

तदनन्तर महादेवजीने कहा—'सुचरित! तुम इस तीर्थके किनारे रहते हुए मुझ मुक्तिदाता शिवका स्मरण करते हुए सदा इसीमें स्नान करो, अन्य देशके तीर्थोंमें मत जाओ। अन्तमें इस तीर्थके माहात्म्यसे तुम मुझे अवश्य प्राप्त कर लोगे। दूसरे मनुष्य भी जो इस तीर्थमें स्नान करेंगे, वे मुझे प्राप्त कर लेंगे।

ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद सुचरित मुनि बहुत समयतक सर्वतीर्थके किनारे टिके रहे। वे मनको संयममें रखते हुए सदा उसी तीर्थमें स्नान करते थे। देहावसान होनेपर उन्होंने सब बन्धनोंसे मुक्त हो भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार यहाँ सर्वतीर्थके माहात्म्यका वर्णन किया गया। जो मनुष्य इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

अत्यन्त पावन सर्वतीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश करनेवाली धनुष्कोटिमें स्नान करनेके लिये जाय। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो लोग धनुष्कोटिका दर्शन, उसमें स्नान अथवा उसकी चर्चा करते हैं, वे अट्ठाईस भेदोंवाले नरकमें कभी नहीं पड़ते। मनुष्योंको तुलापुरुषके दानसे जो फल मिलता है, वही धनुष्कोटिमें गोता लगानेसे भी मिल जाता है। एक सहस्र गोदान करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वह धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारोंमेंसे मनुष्य जिस-जिस पुरुषार्थकी इच्छा करता है, उस-उसको धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे तत्क्षण प्राप्त कर लेता है। धनुष्कोटितीर्थ सब पातकोंका नाशक, अद्वैत ज्ञान देनेवाला, भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला, अभीष्ट मनोरथोंका दाता तथा अज्ञान दूर करनेवाला है। उसके होते भी मनुष्य उस तीर्थको छोड़कर अन्यत्र रमता रहता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है।

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! उस तीर्थका नाम धनुष्तीर्थ कैसे हुआ?

सूतजी बोले—समस्त लोकोंके लिये कण्टकरूप रावण जब युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और विभीषणको लंकाके राज्यपर स्थापित कर दिया गया, तब सीता, लक्ष्मण तथा सुग्रीव

५६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आदि वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी गन्धमादन पर्वतपर आये। वहाँ आनेपर धर्मज्ञ विभीषणने महात्मा रघुनाथजीसे हाथ जोड़कर प्रार्थना की— 'भगवन्! आपके बनाये हुए इस सेतुके मार्गसे सभी बलाभिमानी राजा आकर मेरी लंकापुरीको पीड़ित करेंगे। अतः आप अपनी धनुषकी कोटिसे इस सेतुको तोड़ डालिये।' विभीषणके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने धनुषकी कोटिसे उस पुलको तोड़ डाला। इसीलिये उस तीर्थका नाम धनुष्कोटि हो गया। श्रीरामके धनुषकी कोटिसे की हुई रेखाका जो दर्शन करता है, उसकी मुक्ति हो जाती है। नर्मदाके तटपर किया हुआ तप बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है, गंगातटपर मृत्यु हो तो वह मोक्षरूप फल देनेवाली है और कुरुक्षेत्रमें दिया हुआ दान ब्रह्महत्या आदि पापोंको शुद्ध करनेवाला है; किंतु धनुष्कोटिमें तप, मृत्यु अथवा दान कोई भी हो तो वह महापातकोंका नाश, मोक्षकी प्राप्ति और मनोरथकी सिद्धि करानेवाला होता है। मनुष्य तभीतक पातकों और उपपातकोंसे पीड़ित होता है, जबतक कि उसे मोक्षदायक धनुष्कोटिका दर्शन नहीं होता। धनुष्कोटिका दर्शन करनेवाले पुरुषके हृदयकी अज्ञानमयी ग्रन्थि कट जाती है, उसके सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त पापकर्मोंका क्षय हो जाता है। पृथ्वीपर दस कोटि सहस्र (एक खर्व) तीर्थ हैं। उन सबका निवास इस धनुष्कोटिमें है। धनुष्कोटिमें तपस्या करके देवता और महर्षि बड़ी-बड़ी सिद्धियोंको प्राप्त हुए हैं। जो मनुष्य उसमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ एक ब्राह्मणको भोजन कराता है, वह इहलोक और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा | शूद्र—कोई भी धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे निन्दित योनिमें जन्म नहीं लेता। जो मानव मकर राशिमें सूर्यके स्थित होनेपर माघ मासमें धनुष्कोटिमें स्नान करता है, वह गंगा आदि सब तीर्थोंमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त करता है। उसे अक्षय लोकोंकी तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। स्त्री अथवा पुरुषके जन्मसे लेकर जितने पाप हैं, वे सब माघ मासमें धनुष्कोटितीर्थमें स्नान करनेसे नाशको प्राप्त होते हैं। जो क्रोधको जीतकर प्रतिदिन एक समय भोजन करते हुए माघ मासमें धनुष्कोटिमें नहाता है, वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। शिवरात्रिमें निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर रातमें जागरण करे और प्रत्येक पहरमें रामेश्वर महादेवकी विशेष विधिपूर्वक पूजा करे। फिर दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर धनुष्कोटिमें गोता लगाकर अन्य तीर्थोंमें भी नियमपूर्वक रहकर स्नान करे। पुनः नित्यकर्म करके भगवान् रामेश्वरकी आराधना करे, ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अन्न भोजन करावे। उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार भूमि, गौ, तिल, धान्य और धन दान करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषके ऊपर प्रसन्न हो भगवान् रामेश्वर उसके सब पाप छुड़ा देते और उसे भोग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं। अतः मोक्ष चाहनेवाले पुरुषोंको माघ मासमें धनुष्कोटिमें अवश्य स्नान करना चाहिये। जो सूर्यनारायणके आधे उदयके समय धनुष्कोटिमें स्नान करता है, उसके वशमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता हो जाते हैं। जो मनुष्य चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय इस तीर्थमें स्नान करता है, वह सायुज्य मोक्षको पाता है। मुनिवरो! तुम सब कुछ छोड़कर भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले परम पवित्र धनुष्कोटिको जाओ। वहाँ जाकर पितरोंको पिण्डदान करो। क्योंकि वहाँ पिण्डदान करनेसे कल्पपर्यन्त

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६१

पितरोंकी तृप्ति होती है। सेतुमूल, धनुष्कोटि तथा गन्धमादन पर्वत ये देवनिर्मित तीनों स्थान ऋणसे छुटकारा दिलानेवाले कहे गये हैं। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके धनुष्कोटिका सेवन करना चाहिये। द्रोणाचार्यका पुत्र अश्वत्थामा धनुष्कोटिमें आकर यहाँ नियमपूर्वक स्नान करके सोते हुए बालकोंको मारनेके भयंकर पापसे क्षणभरमें मुक्त हो गया।


अश्वत्थामाके द्वारा सोते हुए पाण्डव योद्धाओंका वध तथा धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे उसका उद्धार

ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अश्वत्थामाने किस प्रकार सोते हुए मनुष्योंको मारनेका पाप किया और कैसे धनुष्कोटिमें स्नान करके वह पापमुक्त हो गया?

सूतजी बोले—ब्राह्मणो ! पहले पाण्डवोंका धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ राज्यके लिये युद्ध छिड़ा था। अनेक अक्षौहिणी सेनाओंसे युक्त उस महायुद्धमें लगातार दस दिनोंतक संग्राम करके शान्तनुनन्दन भीष्मजी मारे गये। पाँच दिन युद्ध करनेपर द्रोणाचार्य, दो दिनकी लड़ाईमें कर्ण और एक दिन युद्ध करके राजा शल्य मार डाले गये। अठारहवें दिनके युद्धमें जब दुर्योधनसे सामना हुआ, तब भीमने गदा मारकर उसकी जाँघ तोड़ डाली। इससे वह श्रेष्ठ राजा दुर्योधन धराशायी हो गया। तदनन्तर युद्धकी समाप्ति हो गयी। सब राजा अपनी-अपनी छावनीपर लौट जानेकी जल्दी करने लगे। सबने प्रसन्नतापूर्वक शिविरको प्रस्थान किया। धृष्टद्युम्न, शिखण्डी आदि समस्त सृंजयवंशी क्षत्रिय तथा अन्य राजा लोग भी अपने-अपने शिविरको लौट गये। श्रीकृष्ण और सात्यकिके साथ पाण्डव भी अपने शिविरमें चले गये। उस समय श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे कहा—'हमलोगोंको मंगलके लिये आजकी रातमें शिविरसे बाहर निवास करना चाहिये। तब श्रीकृष्ण और सात्यकिके साथ सब पाण्डव छावनीसे बाहर निकल गये। उन सबने ओघवती नदीके किनारे जाकर सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की।'

इधर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा सूर्यास्त होनेसे पहले दुर्योधनके पास गये। दुर्योधन रणभूमिमें धूलि-धूसरित होकर पड़ा था। उसका सारा वदन रक्तसे नहा गया था और वह धरतीपर पड़ा-पड़ा छटपटाता था। उसे उस अवस्थामें देखकर अश्वत्थामा आदि तीनोंको बड़ा शोक हुआ। राजा दुर्योधन भी उन सुहृदोंको देखकर शोकमग्न हो गया। तब अश्वत्थामा क्रोधसे प्रचण्ड अग्निकी भाँति जल उठा और इस प्रकार बोला—'राजन्! इन नीच शत्रुओंने छलसे मेरे पिताजीको रणभूमिमें गिरा दिया था, परंतु उसके कारण मुझे वैसा शोक नहीं हुआ, जितना कि आज तुम्हारे गिराये जानेपर हो रहा है। सुयोधन ! मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ, आज रातमें सृंजयोंसहित पाण्डवोंका श्रीकृष्णके देखते-देखते वध कर डालूँगा, मुझे आज्ञा दो।'

अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर उसे स्वीकृति दे दी और कृपाचार्यसे कहा—'आचार्य! आप द्रोणपुत्रको कलशके जलसे सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कीजिये।' कृपाचार्यने ऐसा ही किया। सेनापतिके रूपमें अभिषिक्त होनेपर अश्वत्थामाने दुर्योधनको हृदयसे लगाया और कृपाचार्य तथा कृतवर्माके साथ तुरंत वहाँसे चल दिया। वे तीनों वीर दक्षिणकी ओर गये और सूर्यास्तसे पहले ही

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शिविरके समीप पहुँच गये। वहाँ पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर वे तीनों विजयाभिलाषी योद्धा भयसे भाग चले। एक स्थानपर उन्होंने घोड़ोंको पानी पिलाया। पास ही अनेक शाखाओंसे युक्त सघन वटका वृक्ष था। वहाँ जाकर तीनों रथसे उतर गये और घोड़ोंको वहीं छोड़कर आचमन एवं सन्ध्योपासना की। तदनन्तर, अन्धकारसे व्याप्त भयानक रात्रि सब ओर फैल गयी। कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा शोकसे पीड़ित हो वटके समीप बैठ गये। कृतवर्मा और कृपाचार्यको तो नींद आ गयी, किंतु क्रोधसे कलुषितचित्त होनेके कारण अश्वत्थामाको निद्रा नहीं आती थी। वह सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचता रहा। उसने देखा, इस बरगदपर बहुत-से कौए रहते हैं और सब-के-सब भिन्न-भिन्न शाखाओंपर सुखपूर्वक सो गये हैं। इतनेमें ही वहाँ मास नामक पक्षी आया। वह बड़ा भयंकर था। मास बहुत शब्द करके उस वृक्षमें छिप गया और उछल-उछलकर सोये हुए कौओंको मारने लगा। थोड़ी ही देरमें कौओंके कटे हुए अंगोंसे उस वृक्षके सब ओरका भाग आच्छादित हो गया। इस प्रकार कौओंका अन्त करके वह उल्लू बहुत प्रसन्न हुआ।

अश्वत्थामाने उल्लूकी वह सारी करतूत रातमें देखी। फिर उसने भी मनमें यह निश्चय किया कि मैं भी इसी प्रकार रात्रिमें सोते हुए शत्रुओंका संहार करूँगा। उसने उल्लूके उस कुकृत्यको अपने लिये उपदेश माना और सोचा, सीधे मार्गसे युद्ध करके मैं पाण्डवोंको जीत नहीं सकूँगा, अतः छलसे ही उन्हें मारना चाहिये। ऐसा विचार करके अश्वत्थामाने सोते हुए कृपाचार्य और कृतवर्माको जगाया और इस प्रकार कहा— 'निर्दयी भीमने राजा दुर्योधनके सिरपर लात मारी है, अतः आज रातमें पाण्डवोंके शिविरमें जाकर हमलोग उन्हें सोतेमें ही अनेक अस्त्र-शस्त्रोंसे मार डालेंगे।' यह सुनकर कृपाचार्यने कहा—'सोते हुओंको मारना इस लोकमें धर्म नहीं है। इस कुकर्मका कहीं भी आदर नहीं होता। इसी प्रकार जो लोग शस्त्र, रथ और घोड़ोंको त्याग चुके हैं, उनको भी मारना धर्म नहीं है। हमलोग धृतराष्ट्र, पतिव्रता गान्धारी तथा विदुरजीसे पूछ लें और वे लोग जैसा कहें, वैसा करें।' तब अश्वत्थामा बोला—'मामाजी! पाण्डवोंने छलसे युद्धमें मेरे पिताको मारा है, उसी प्रकार मैं भी रातमें सोते हुए पाण्डवोंका वध करूँगा।'

ऐसा कहकर अश्वत्थामा घोड़े जुते हुए रथपर सवार हो क्रोधसे जलता हुआ पाण्डवोंकी ओर चल दिया। उसके पीछे-पीछे कृतवर्मा और कृपाचार्य भी गये। शिविरके द्वारपर पहुँचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा खड़ा हो गया। उसने रातमें ही कृपानिधान महादेवजीकी आराधना करके उनसे एक उज्ज्वल खड्ग प्राप्त किया। तत्पश्चात् कृतवर्मा और कृपाचार्य दोनोंको शिविरके द्वारपर ही खड़ा करके वह स्वयं भीतर घुस गया। उस समय द्रोणपुत्र अत्यन्त कुपित हो तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। धीरे-धीरे वह धृष्टद्युम्नके शिविरमें गया। वहाँ महायुद्धसे थके हुए धृष्टद्युम्न आदि वीर अपनी सेनाके साथ निश्चिन्त होकर सो रहे थे। अश्वत्थामाने उत्तम शय्यापर सोते हुए महाबली धृष्टद्युम्नको क्रोधपूर्वक लातसे मारा। उस आघातसे जगकर धृष्टद्युम्न शय्यासे उठने लगा। उसी समय द्रोणपुत्रने उसके बाल खींचकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया और उसकी छातीपर चढ़कर धनुषकी डोरीसे उसके गलेको कसकर बाँध दिया। बेचारा विवश होकर चीखता और छटपटाता रहा, किंतु अश्वत्थामाने उसे पशुकी तरह गला दबाकर मार डाला। उसने सब सैनिकोंको भी सोतेमें ही मार डाला। युधामन्यु

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६३

और महापराक्रमी उत्तमौजाको, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको तथा युद्धसे बचे हुए सोमक नामवाले क्षत्रिय वीरोंको भी उसने मौतके घाट उतार दिया। शिखण्डी आदि बहुत-से क्षत्रिय वीरोंको अश्वत्थामाने तलवारसे काट डाला। उसके भयसे भागकर जो लोग दरवाजेसे निकले, उन सब सैनिकोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यने मृत्युका ग्रास बना दिया। इस प्रकार सारी सेनाके मारे जानेसे वह शिविर उसी प्रकार सूना हो गया, जैसे प्रलयकालमें तीनों लोक शून्य हो जाते हैं। तदनन्तर वे तीनों योद्धा पाण्डवोंसे भयभीत होकर शीघ्र गतिसे इधर-उधर निकल भागे।

अश्वत्थामा नर्मदाके मनोरम तटपर चला गया। वहाँ सहस्रों वेदवादी ऋषि परस्पर पुण्यकथाएँ कहते हुए उत्तम तपस्यामें संलग्न रहते थे। द्रोणाचार्यका पुत्र उन ऋषियोंके आश्रमोंमें गया। उसके प्रवेश करते ही ब्रह्मवादी मुनियोंने योगबलसे उसका दुश्चरित्र जान लिया और इस प्रकार कहा—'द्रोणपुत्र ! तू सोते हुए मनुष्योंको मारनेवाला पापी अधम ब्राह्मण है। तेरे दर्शनसे भी हमलोग निश्चय ही पतित हो जायँगे। तुझसे वार्तालाप करनेपर दस हजार ब्रह्महत्याओंका पाप लगेगा। अतः नराधम ! तू हमारे आश्रमोंसे दूर हो जा।'

उनके ऐसा कहनेपर अश्वत्थामा लज्जित हो उस मुनिसेवित आश्रमसे निकल गया। इसी प्रकार वह काशी आदि सभी पुण्यतीर्थोंमें गया; परंतु वहाँके महात्मा ब्राह्मणोंसे निन्दित होकर लौट आया और अन्तमें प्रायश्चित करनेकी इच्छासे भगवान् वेदव्यासजीकी शरणमें गया। महामुनि व्यासजी बदरिकारण्यमें विराजमान थे। उनके पास जाकर उसने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। तब व्यासजीने उससे कहा—'द्रोणकुमार ! तू शीघ्र मेरे आश्रमसे निकल जा। सोते हुओंको मारनेके पापसे तू महापातकी हो गया है। तेरे साथ बात करनेसे भी मुझे महान् पाप लगेगा।'

अश्वत्थामा बोला—भगवन्! सबसे निन्दित होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। यदि आप भी ऐसी बात कहते हैं तो दूसरा कौन मुझे शरण देनेवाला होगा? ब्रह्मन्! मुझपर कृपा कीजिये। क्योंकि साधुपुरुष दीनोंपर दया करनेवाले होते हैं। सोते हुए मनुष्योंको मारनेसे जो पाप हुआ है, उसकी शान्तिके लिये आप मुझे कोई प्रायश्चित्त बताइये। कारण कि आप सर्वज्ञ हैं।

अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर व्यासजीने दीर्घकालतक सोच-विचारकर उससे कहा—इस पापकी शान्तिके लिये धर्मशास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। तथापि मैं उस दोषके निवारणके लिये एक उपाय बतलाता हूँ। दक्षिण समुद्रके तटपर जो परम पवित्र रामसेतु है, वह मोक्ष देनेवाला है। वहीं धनुष्कोटि नामसे विख्यात एक महान् तीर्थ है, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला और मनुष्योंको स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाला है। उसमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या आदि पाप भी शुद्ध हो जाते हैं। वह पवित्रोंमें सबसे अधिक पवित्र तथा तीर्थोंमें सबसे उत्तम है। दुःस्वप्न और नरकके क्लेशोंका नाशक तथा पुण्यजनक है। उस धनुष्कोटितीर्थमें जाकर तुम एक महीनेतक निरन्तर स्नान करो तो सोते हुओंको मारनेके पापसे शुद्ध हो जाओगे।

महर्षि व्यासके इस प्रकार कहनेपर अश्वत्थामा रामसेतुपर जाकर पुण्यदायिनी धनुष्कोटिमें पहुँचा। वहाँ उसने संकल्पपूर्वक एक मासतक निरन्तर स्नान किया। वह प्रतिदिन तीनों समय श्रीरामेश्वर शिवकी सेवामें रहता था। तदनन्तर तीसवें दिन जलमें स्नान करके उसने पंचाक्षर मन्त्रका जप और उपवास किया। फिर रातमें भगवान् रामेश्वरके समीप जागरण किया। दूसरे दिन पुनः संकल्पपूर्वक धनुष्कोटिमें स्नान करके उसने श्रीरामेश्वरकी भक्तिपूर्वक सेवा-पूजा की। तदनन्तर आनन्दके आँसू बहाता हुआ वह शिवजीके आगे नृत्य करने

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लगा। उस समय भगवान् शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गये। उनका दर्शन करके उसने भगवान् शिवका इस प्रकार स्तवन किया— 'देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। करुणाकर शंकर! विपत्ति-रूपी समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंको पार लगानेके लिये आपके चरणारविन्द जहाजरूप हैं। मृत्युंजय! त्रिलोचन! आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करनेपर महादेवजी प्रसन्न हो अश्वत्थामासे बोले— 'द्रोणकुमार! सोते हुओंको मारनेके कारण जो तुम्हें पाप लगा था, वह धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो गया। अब तुम कोई वर माँगो।'

अश्वत्थामा बोला— 'महेश्वर! आज आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतार्थ हो गया। आपके चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो।' 'तथास्तु' कहकर देवदेव महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार पापरहित, शुद्ध एवं निर्मल हुए अश्वत्थामाको उस समयसे सभी महर्षियोंने ग्रहण किया।


धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुका पापसे उद्धार

सूतजी कहते हैं—पहलेकी बात है, बृहद्द्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक महाबली चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। वे समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। उन्होंने सत्रयागद्वारा इन्द्र आदि देवताओंका यजन किया। परम विद्वान् धर्मात्मा रैभ्यजी उनके पुरोहित थे। रैभ्यके दो पुत्र हुए, अर्वावसु और परावसु। वे दोनों छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् तथा श्रौत-स्मार्त कर्मोंके तत्त्वज्ञ थे। न्याय, मीमांसा, सांख्य, वेदान्त, वैशेषिक, योगशास्त्र और व्याकरणशास्त्रके मर्मज्ञ विद्वान् थे। मनु आदि धर्मशास्त्रोंके वे निष्णात पण्डित और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें चतुर थे। इन दोनों विद्वानोंको सत्रयागमें सहायता करनेके लिये राजा बृहद्द्युम्नने माँगा। पिताकी आज्ञा ले वे दोनों भाई बृहद्द्युम्नके सत्रमें गये। वे युगल अश्विनीकुमारोंकी भाँति परम सुन्दर दिखायी देते थे। रैभ्य मुनि जेठी पुत्रवधूके साथ स्वयं ही आश्रमपर रह गये थे।

उन दोनों बन्धुओंने वहाँ जाकर राजा बृहद्द्युम्नके यज्ञको बड़ी उत्तमतासे सम्पन्न कराया। जब वह यज्ञ होने लगा, तब राजाके बुलाये हुए सभी मुनि उस यज्ञको देखनेके लिये आये। उनको आया हुआ देख महाराज बृहद्द्युम्नने सबका आदरपूर्वक अर्घ्य आदिसे सत्कार किया। उसी समय आमन्त्रित हुए राजालोग आदरपूर्वक वह यज्ञोत्सव देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे चतुरंगिणी सेनाके साथ आये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इन चारों वर्णों तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन चारों आश्रमोंके लोग भी वहाँ जुटे हुए थे। श्रेष्ठ राजाने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया और सबको भोजनके लिये अन्न, घी आदि पदार्थ दिये। वस्त्र, सुवर्ण, हार एवं नाना प्रकारके रत्न भी भेंट किये। इस प्रकार राजा बृहद्द्युम्नने यज्ञमें पधारे हुए सभी अतिथियोंका सत्कार किया।

रैभ्यके पुत्र अर्वावसु और परावसुने यज्ञ आदि कर्मोंको बिना किसी भूलके विधिपूर्वक कराया। उन दोनों भाइयोंकी निपुणता देखकर वसिष्ठ आदि सभी महर्षियोंने उनकी प्रशंसा की। परावसु कुछ कर्म कराकर तृतीय सवनके अन्तमें सायंकालके समय घरका काम-काज देखनेके लिये चले गये। उस समय रैभ्य मुनि काला मृगचर्म ओढ़कर वनमें विचर रहे थे। उन्हें देखकर परावसुके मनमें मृगकी आशंका हुई। रात्रिमें निविड़ अन्धकारमें उनके नेत्र निद्रासे

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५६५ ---|--- भारी हो रहे थे। उन्होंने पिताको देखकर यह समझा कि यह कोई वनवासी मृग है, मुझे मारनेके लिये आ रहा है। ऐसा सोचकर उस सघन वनमें अपने शरीरकी रक्षा चाहनेवाले परावसुने मृगके धोखेसे अपने पिताको ही मार डाला। निकट जाकर उसने अपने मरे हुए पिताको पहचाना; फिर तो वह शोकमें डूब गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्यथासे व्याकुल हो उठीं। तत्पश्चात् परावसु पिताका दाहसंस्कार करके पुनः राजाके सत्रमें आ गये और अपने द्वारा जो पाप हो गया था, वह सब उन्होंने छोटे भाईको बताया। पिताको मरा हुआ सुन अर्वावसु शोकसे व्याकुल हो उठा। तब बड़े भाईने छोटेको यह आदेश दिया कि राजाका यह महान् यज्ञ आरम्भ हुआ है, तुम अभी बालक हो, तुममें इस यज्ञका भार सँभालनेकी शक्ति नहीं है। मैंने रातमें मृगकी आशंकासे पिताका ही वध कर डाला है, अतः उस ब्रह्महत्यासे मुक्त होनेके लिये प्रायश्चित्त भी करना चाहिये। तात! छोटे भैया! तुम्हीं मेरे लिये व्रत करो। मैं अकेला भी इस यज्ञका भार वहन करनेमें समर्थ हूँ।<br><br>बड़े भाईके ऐसा कहनेपर अर्वावसुने कहा—बड़े भैया! आपकी जैसी आज्ञा हो वैसा ही होगा। ऐसा कहकर वह यज्ञसे निकल गया और बड़े भाईने सब कर्मोंको कराया। छोटे भाईने बारह वर्षोंतक बड़े भाईके लिये ब्रह्महत्यानाशके लिये व्रत किया। तत्पश्चात् प्रसन्नतापूर्वक वह पुनः सत्रयज्ञमें आया। अपने भाईको आया देख ज्येष्ठने राजा बृहद्द्युम्नसे कहा—'राजन्! यह अर्वावसु ब्रह्महत्यारा है, इस समय आपके यज्ञमें आया है। नृपश्रेष्ठ! इसे शीघ्र ही इस यज्ञसे हटा दीजिये, अन्यथा सत्रयागके फलकी हानि होगी।' परावसुके ऐसा कहनेपर राजाने अपने सेवकोंद्वारा अर्वावसुको यज्ञसे निकाल दिया। वहाँके ब्राह्मण भी उसे धिक्कार दे रहे थे। | अर्वावसु यह सब सहन करके चुपचाप वनको चला गया और वहाँ ऐसी तपस्या की, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थी। उसके तपसे भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न हो सामने प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'अर्वावसो! तुम तपस्या, ब्रह्मचर्य, आचार, शास्त्रश्रवण तथा वेद-शास्त्र आदिकी शिक्षाकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ हो। परावसुने तुम्हें अपमानपूर्वक निकाला है तथापि क्षमायुक्त होकर तुम उसके प्रति क्रोध नहीं करते हो। तुम्हारे बड़े भाईने ही पिताको मारा है, तुमने नहीं; फिर भी तुमने भाईकी शुद्धिके लिये स्वयं ही ब्रह्महत्यानाशक व्रत किया है, इसलिये हम तुम्हें श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं।' ऐसा कहकर देवताओंने उसको ज्येष्ठ बना दिया। तत्पश्चात् इन्द्रादि देवताओंने सूर्यनारायणको आगे करके कहा—'अर्वावसो! तुम कोई वर माँगो।' उसने प्रार्थना की—'मेरे पिता जीवित हो जायें और उन्हें अपने मारे जानेकी स्मृति न हो।' देवताओंने कहा—'ऐसा ही होगा। इसके सिवा हम तुम्हें दूसरा वर भी देना चाहते हैं, माँगो।'<br><br>अर्वावसु बोला—मेरे भाईकी दुष्टता दूर हो। अर्वावसुकी यह बात सुनकर देवताओंने कहा—'परावसुने अपने ब्राह्मणपिताकी हत्या की है, अतः उसे महान् पाप लगा है। दूसरेके किये हुए पापकी दूसरे द्वारा किये गये प्रायश्चित्तसे निवृत्ति नहीं होती, विशेषतः पाँच महापातकोंके सम्बन्धमें ऐसी ही बात है। इस कारण तुम्हारे भाई परावसुका अभी पापसे उद्धार नहीं हुआ है।' देवताओंकी यह बात सुनकर अर्वावसुने कहा—'आपका कहना ठीक है तथापि आपलोगोंके माहात्म्य और प्रसादसे पिता और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले मेरे भाईका जिस प्रकार उद्धार हो, वह उपाय कृपापूर्वक आप बतावें।'<br><br>अर्वावसुका यह वचन सुनकर देवताओंने दीर्घकालतक विचार किया। फिर एक निश्चयपर

५६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पहुँचकर इस प्रकार कहा—'उस महापातकके निवारणका उपाय तुम्हें हम बता रहे हैं। दक्षिण समुद्रके तटपर जो परम पवित्र मोक्षदायक रामसेतु है, उसीपर धनुष्कोटि नामसे विख्यात एक परम उत्तम मुक्तिदायक तीर्थ है, जो ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्णकी चोरी, गुरुशय्यागमन तथा इन सबके संसर्गरूप महापातकोंका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य मनमें कोई कामना नहीं रखकर उसमें स्नान करता है, उसको वह तीर्थ मोक्षफल प्रदान करता है। वह दुःस्वप्नों तथा नरकके क्लेशोंका नाश करनेवाला एवं धन्य है। तुम्हारा ज्येष्ठ भाई परावसु यदि वहीं जाकर स्नान करे तो तत्काल ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकता है।' यों कहकर देवतालोग अपनी पुरीको चले गये।

तदनन्तर अर्वावसु अपने बड़े भाई परावसुको साथ ले श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटि नामक तीर्थमें गया। परावसुने पातकशुद्धिके लिये उस सेतुवर्ती तीर्थमें संकल्प करके अपने भाईके साथ नियमपूर्वक स्नान किया। स्नान करके जब वे उठे, तब आकाशवाणीने कहा—'परावसो! तुम्हारी पितृहत्या और ब्रह्महत्या नष्ट हो गयी।' तब छोटे भाईके साथ परावसुने श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और रामेश्वर महादेवको भक्तिभावसे मस्तक नवाकर दोनों भाई अपने पिताके आश्रमपर गये। वहाँ रैभ्य मुनि मरकर पुनः जीवित हो गये थे। उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंको आया देख मन-ही-मन बड़े सन्तोषका अनुभव किया और पुत्रोंके साथ वे आश्रमपर सुखपूर्वक रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुके पातकका नाश हो गया था। इसलिये सब मुनियोंने उन्हें स्वीकार किया।

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धनुष्कोटिकी महिमा; सियार, वानर तथा दुराचार ब्राह्मणकी कथा और महालय श्राद्धकी आवश्यकता

सूतजी कहते हैं— अब मैं धनुष्कोटिकी प्रशंसामें सियार और वानरके संवादका वर्णन करता हूँ। प्राचीन कालमें एक स्थानपर सियार और वानर रहते थे। दोनोंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे दोनों परस्पर मित्र थे। सियारका नाम रुद्रभूमिष्ठ था। एक समय वानरने शृगालको श्मशानभूमिमें देखकर पूर्वजन्मका स्मरण करते हुए पूछा—'सियार! तुमने पूर्वजन्ममें कौन-सा अत्यन्त भयंकर पाप किया था, जिससे तुम श्मशानभूमिमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दोंको खा रहे हो?' वानरके ऐसा पूछनेपर सियारने कहा—'वानर! मैं पूर्वजन्ममें वेदोंका पारंगत विद्वान् और समस्त कर्मकलापोंका ज्ञाता ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदशर्मा था। मैंने उस जन्ममें एक ब्राह्मणको धन देनेके लिये संकल्प करके भी वह धन उसे नहीं दिया, उसीसे सियार हुआ और अब इस प्रकारके अत्यन्त घृणित पदार्थोंको खाता हूँ। जो दुरात्मा देनेकी प्रतिज्ञा करके भी कोई वस्तु नहीं देते हैं, वे अत्यन्त घृणित सियारकी योनिको प्राप्त होते हैं। वानर! ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि वह वस्तु उसे न दी जाय, तो उसी क्षण उसके दस जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। इसलिये समझदार मनुष्यको उचित है कि वह देनेकी प्रतिज्ञा करनेपर उस वस्तुको अवश्य दे डाले।'

ऐसा कहकर सियारने वानरसे पूछा— तुमने क्या पाप किया था, जो वानर हो गये?

वानर बोला— पूर्वजन्ममें मैं भी ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदनाथ था। मेरे पिता विश्वनाथ नामसे विख्यात थे और मेरी माताका नाम कमलालया था। सियार! पूर्वजन्ममें भी हमारी तुम्हारी मित्रता

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६७

थी। तुम इस बातको नहीं जानते हो, परंतु पुण्यके गौरवसे मुझे उसका स्मरण है। पूर्वजन्ममें मैंने ब्राह्मणका साग चुरा लिया था, उसी पापसे मैं वानर हुआ हूँ। अतः ब्राह्मणका धन अपहरण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणका धन लेनेसे नरक होता है और नरक भोगनेके बाद वानरकी योनि मिलती है। ब्राह्मणका धन अपहरण करनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। विष तो केवल पीनेवालेको मारता है, किंतु ब्राह्मणका धन समूचे कुलको जला डालता है। ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे पापी मनुष्य कुम्भीपाक नामक नरकमें पकाया जाता है। पश्चात् शेष पापोंके फलस्वरूप वह वानर योनिको प्राप्त होता है। इसलिये ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये। उनके साथ सदा क्षमाका ही व्यवहार करना चाहिये। बालक, दरिद्र, कृपण तथा वेदशास्त्र आदिके ज्ञानसे शून्य ब्राह्मणोंका भी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्रोधमें आनेपर वे अग्निके समान भस्म कर देनेवाले हो जाते हैं। सियार ! कितने ही समयसे ऐसा कष्ट भोगते हुए हम दोनोंको इस पापसे छुड़ानेवाला कौन होगा ?

सियार और वानर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, इतनेमेंही दैवयोगसे अथवा पूर्वजन्मके किसी पुण्यवश वहाँ महातेजस्वी सिन्धुद्वीप नामक मुनि स्वेच्छानुसार घूमते हुए आ पहुँचे। वे रुद्राक्षकी मालासे विभूषित हो भगवान् शिवके नामोंका कीर्तन कर रहे थे। सियार और वानरने मुनिको देखकर प्रणाम किया तथा इस प्रकार पूछा—'भगवन् ! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं, अपनी कृपादृष्टिसे हमारी ओर देखिये और हम दोनोंकी रक्षा कीजिये। हमारी वानर और सियारकी योनि जिस उपायसे छूट जाय, उसे बतानेकी कृपा कीजिये। साधुपुरुष सदा किसी प्रकारकी अपेक्षा न रखते हुए अपनी कृपादृष्टिसे अनाथों, दीनों, अज्ञानियों, बालकों तथा रोगपीड़ित मनुष्योंकी रक्षा करते हैं।'

उन दोनोंके ऐसा कहनेपर महामुनि सिन्धुद्वीपने मन-ही-मन बहुत देरतक विचार किया और इस प्रकार कहा—'सियार और वानर ! तुम दोनोंके पापकी शान्तिके लिये मैं एक उपाय बताता हूँ। तुम दोनों दक्षिण समुद्रके तटपर श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटि तीर्थमें शीघ्र जाकर स्नान करो। ऐसा करनेसे पापसे मुक्त हो जाओगे।' सिन्धुद्वीपके इस वचनको सुनकर सियार और वानर बड़े प्रयाससे धनुष्कोटिमें गये और उसके जलमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोकमें चले गये। वहाँ उन्हें इन्द्रका आधा आसन प्राप्त हुआ।

गोदावरीके तटपर दुराचार नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहता था। वह बड़ा पापी और निर्दयतापूर्ण कर्म करनेवाला था। ब्रह्महत्यारे, शराबी, सुवर्णकी चोरी करनेवाले तथा गुरुपत्नीगामी महापातकियोंके संसर्गसे दूषित होकर वह सदा वैसे ही लोगोंके साथ निवास करता था। महापातकियोंके संसर्गदोषसे उस ब्राह्मणकी ब्राह्मणता पूर्णतः नष्ट हो गयी थी। ब्राह्मणतासे हीन उस दुराचार ब्राह्मणको एक महाभयंकर महाबलवान् वेतालने अपने अधीन कर लिया। वेतालके आवेशसे अत्यन्त पीड़ित एवं परवश होकर वह देश-देश और वन-वन घूमने लगा। घूमते-घूमते वह श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटिमें चला गया। वहाँ वेतालने प्रेरित करके उसे धनुष्कोटिके जलमें नहलाया। स्नान करके वह ज्यों ही जलसे निकला, वेतालने उसे छोड़ दिया। तब वह ब्राह्मण स्वस्थ होकर विचार करने लगा कि 'यह समुद्रके किनारे कौन-सा देश है? गोदावरीके तटपर निवास करनेवाला मैं यहाँ कैसे आ गया?' इसी चिन्तामें पड़ा हुआ वह धनुष्कोटिनिवासी योगिप्रवर महात्मा दत्तात्रेयके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—

५६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

'भगवान्! मैं नहीं जानता यह कौन-सा देश है? मेरा घर तो गोदावरीके किनारे है, मैं यहाँ कैसे आ पहुँचा। यह सब बतानेकी कृपा करें।' उसकी यह बात सुनकर महायोगी दत्तात्रेयने थोड़ी देरतक ध्यान करके कहा—'पहले महापातकियोंके संसर्गसे तुम्हारी ब्राह्मणता नष्ट हो गयी थी, इसलिये तुम्हें किसी वेतालने पकड़ लिया। उसीके आवेशसे विवश होकर तुम यहाँ आये हो। वेतालने तुम्हें धनुष्कोटिके जलमें नहलाया है। धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे ही तुम्हारा महापातकियोंके संसर्गका दोष सर्वथा नष्ट हो गया। जिस वेतालने तुम्हें पकड़ रखा था, वह पूर्वजन्ममें ब्राह्मण था। उसने आश्विनमासके कृष्ण पक्षमें पार्वणकी विधिसे पितरोंका हर्षपूर्वक महालय श्राद्ध नहीं किया। अतः पितरोंके शाप देनेसे वह वेतालभावको प्राप्त हुआ। इस धनुष्कोटिके दर्शनसे वह वेताल भी वेताल-योनिसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त हुआ है। जो मनुष्य आश्विनमासके कृष्णपक्षमें अत्यन्त लोभवश पितरोंके उद्देश्यसे महालय श्राद्ध नहीं करते, वे वेताल होते हैं। जो आश्विनमासके कृष्णपक्षमें महालय श्राद्धके अवसरपर अपनी शक्तिके अनुसार एक, दो या तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। भादों शुक्लपक्षसे लेकर मार्गशीर्षमासके अन्ततक तत्त्वदर्शी मुनियोंने महालय श्राद्धका समय बतलाया है। इसमें भी भादोंका शुक्लपक्ष विशिष्ट है और उसकी अपेक्षा भी आश्विनका कृष्णपक्ष अधिक उत्तम माना गया है। उस कृष्णपक्षमें प्रतिपदा तिथिको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय श्राद्ध करता है, उसके ऊपर सबको पवित्र करनेवाले भगवान् अग्निदेव प्रसन्न होते हैं। वह अग्निलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य द्वितीया तिथिमें महालय श्राद्ध करता है, उसके ऊपर गिरिजापति भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं और वह कैलाशको प्राप्त होता है। जो तृतीया तिथिमें भक्तिपूर्वक महालय श्राद्ध करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता अनुग्रह करते हैं। इसी प्रकार तृतीयासे लेकर चतुर्दशीतक महालय श्राद्धकी उत्तरोत्तर अधिक-से-अधिक महिमा है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अमावास्या तिथिमें महालय श्राद्ध करता है, उसके पितरोंको अनन्तकालतक तृप्ति बनी रहती है। स्वर्गलोकमें देवताओंको अमृत पीनेसे जो तृप्ति प्राप्त होती है, वैसी ही अनन्त तृप्ति पितरोंको अमावास्यामें महालय श्राद्ध करनेसे होती है। अमावास्या तिथि भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है। यह परम शान्त तिथि है। इसमें महालय श्राद्ध करके वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अमावास्याको श्राद्ध करनेवाला पुरुष प्रत्यगात्मा और ब्रह्मकी एकताको जानकर सायुज्य मोक्षको प्राप्त होता है।'

'भाद्रपदमास आनेपर देवस्वरूप पितर हर्षसे नाचने लगते हैं कि हमारे पुत्र हमलोगोंको तृप्तिके उद्देश्यसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करायेंगे। उस भोजनसे हमें अत्यन्त दारुण नरकका क्लेश नहीं भोगना पड़ेगा और जबतक चन्द्रमा तथा सूर्य बने

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५६९

रहेंगे, तबतक हमारा स्वर्गलोकमें निवास होगा। पितरोंको तृप्ति देनेवाले भाद्रपदमास एवं आश्विन-मास प्राप्त होनेपर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इससे उसके पितृकुल और मातृकुलके पितर तृप्तिको प्राप्त होते हैं। आश्विन कृष्णा सप्तमीसे लेकर अमावास्यातक मनुष्य प्रतिदिन तीन-तीन ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। द्वादशीसे लेकर अमावास्यातक तो अवश्य ही ऐसा करे। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको इस प्रकार भोजन करावे, जिससे उन्हें पूर्णतः तृप्ति हो। उस ब्राह्मणकी तृप्तिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तृप्त होते हैं। अग्निष्वात्त आदि पितर, इन्द्र आदि देवता और अधिक कहाँतक कहें, तीनों लोक भी तृप्त होते हैं। मनुष्य महालय पार्वणविधिसे श्राद्ध करे। महालय श्राद्धमें पितृकुलके पितरोंकी ही भाँति मातृकुलके मातामहादि पितरोंको भी प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जैसे आगे चलनेवाले बैलोंके बिना गाड़ी रास्तेमें आगे नहीं बढ़ती, उसी प्रकार पितृयज्ञ भी बिना दक्षिणाके सफल नहीं होता। अतः कल्याणकी सिद्धिके लिये महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। यदि माता-पिताके क्षयाहके दिन एक-उद्दिष्ट श्राद्ध भूलसे न किया गया हो तो भी महालय श्राद्ध अवश्य करे। यदि अपने पास शक्ति न हो तो दूसरोंसे धनकी याचना करके भी पितरोंका महालय श्राद्ध करे। पहले ब्राह्मणोंसे याचना करनी चाहिये। यदि उनसे धन-धान्य आदिकी प्राप्ति न हो तो महालय श्राद्ध करनेकी इच्छासे उत्तम क्षत्रियोंके यहाँ याचना करे। यदि क्षत्रिय भी देनेवाले न हों तो वैश्योंसे माँगे। यदि लोकमें वैश्य भी दाता न हों तो पितरोंकी तृप्तिके लिये भाद्रपदमासमें गोग्रास अर्पण करे। यदि भादों या आश्विनमासमें सूतक आदिके द्वारा श्राद्धमें विघ्न उपस्थित हो जाय, तो सूतकका समय निवृत्त होनेपर अगहनमासके भीतर किसी दिन भी पार्वण श्राद्ध कर लेना चाहिये। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह महालय श्राद्धके लिये नौ ब्राह्मणोंका वरण करे। एक ब्राह्मण पिताके लिये, एक पितामहके लिये और एक प्रपितामहके लिये वरण करे। इसी प्रकार मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामहके लिये भी एक-एक ब्राह्मणका वरण करे। दो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका वरण विश्वेदेवोंके लिये करे और एक वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण भगवान् विष्णुके लिये करना चाहिये। अथवा पितृवर्गके लिये एक, मातामह वर्गके लिये एक, विश्वेदेवोंके लिये एक और भगवान् विष्णुके लिये एक। इस प्रकार चार ब्राह्मणोंका महालय श्राद्धके लिये वरण करे। वे ब्राह्मण वेदज्ञ एवं सुशील होने चाहिये। जो खोटे स्वभाववाले ब्राह्मणोंका वरण करता है, वह श्राद्धका घातक है। भाद्रपद शुक्लपक्षमें अथवा विशेषतः आश्विन कृष्णपक्षमें महालय श्राद्ध करना चाहिये। जो श्रद्धापूर्वक इस प्रकार महालय श्राद्ध करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। महालय श्राद्ध नित्यकर्ममें गिना जाता है। अतः उसे न करनेपर बड़ा भारी पाप लगता है।'

'धर्मपुत्र युधिष्ठिर वनवासमें महालय श्राद्ध करनेसे ही दुःखके समुद्रसे पार हो धृतराष्ट्रपुत्रोंको मारकर युद्धमें विजयी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, अत्रि, भृगु, कुत्स, गौतम, अंगिरा, काश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, अगस्त्य, पराशर, मृकण्ड तथा अन्यान्य मुनिवर विधिपूर्वक उत्तम महालय श्राद्धका अनुष्ठान करके ही अणिमा आदि आठों सिद्धियों, व्रतों और तपस्याओंके निवासस्थान बन गये। महालय श्राद्ध करनेसे ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ। अतः अपना कल्याण एवं अभ्युदय चाहनेवाले पुरुषको महालय श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। तुम्हारे भीतर जिस भूतने प्रवेश किया था, वह पूर्वजन्ममें ब्राह्मण

५७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। उसका नाम वेदनिधि था। वह महात्मा भरद्वाजका पुत्र तथा कुशस्थली ग्रामका निवासी था। उसने विधिपूर्वक महालय श्राद्धको नहीं किया, इसलिये पितरोंके शापसे वह वेताल हो गया। दुराचार! तुम भाद्रपदमास (आश्विन कृष्णपक्ष) में पितरोंकी तृप्तिके लिये षड्रस भोजन तैयार करके ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराओ। ऐसा करनेसे तुम्हें कभी दरिद्रता नहीं होगी और तुम सदा सुखी रहोगे। आजसे तुम कभी महापातकियोंसे संसर्ग न रखना, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। अब शीघ्रतापूर्वक अपने देशको चले जाओ।' | योगी दत्तात्रेय मुनिके इस प्रकार आज्ञा देनेपर दुराचार कृतार्थमनसे उन्हें प्रणाम करके अपने देशको चला गया और दत्तात्रेयजीके बताये हुए मार्गसे अपने वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा। उसने महापातकियोंका संसर्ग त्याग दिया। श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटितीर्थमें स्नान करनेकी महिमासे दुराचार देहान्त होनेपर परम मोक्षको प्राप्त हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुराचारके उद्धारकी पवित्र कथा कह सुनायी। इस प्रकार धनुष्कोटितीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।


क्षीरकुण्डकी उत्पत्ति और महिमा—महर्षि मुद्गलको भगवान् विष्णुका दर्शन

**श्रीसूतजी कहते हैं—**नैमिषारण्यनिवासियो! चक्रतीर्थसे लेकर धनुष्कोटिपर्यन्त चौबीस तीर्थोंका तुमसे वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो?

**मुनि बोले—**सूतजी! हमलोग क्षीरकुण्डका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, जिसके समीप पहले आपने चक्रतीर्थकी स्थिति बतलायी है।

**सूतजीने कहा—**मुनिवरो! परम पवित्र देवीपुरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर फुल्लग्रामके नामसे प्रसिद्ध बड़ा भारी स्थान है, जहाँसे प्रारम्भ करके श्रीरामचन्द्रजीने महासागरमें सेतु बाँधा है। वह फुल्लग्राम अतिशय पुण्यतम क्षेत्र है। वहाँपर महापातकोंका नाश करनेवाला क्षीरकुण्ड है, जो दर्शन, स्पर्श, ध्यान और कीर्तनसे भी मोक्ष देनेवाला है। प्राचीन कालमें दक्षिण समुद्रके तटपर अतिशय पवित्र फुल्लग्राममें वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले मुद्गल नामक मुनि निवास करते थे। उन्होंने भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाले एक उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञसे सन्तुष्ट होकर प्रसन्नात्मा भगवान् विष्णु उनके आगे प्रकट हुए। उनकी कान्ति श्याम मेघके समान थी। वे पीताम्बरसे सुशोभित थे। विनतानन्दन गरुड़की पीठपर बैठे हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। उनका दर्शन करके मुद्गल मुनि भक्ति एवं प्रेमसे विह्वल हो गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने कानोंको सुख देनेवाले मधुर शब्दोंमें भगवान् विष्णुका स्तवन किया।

**मुद्गल बोले—**पहले संसारके सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके रूपमें, तत्पश्चात् उसका पालन करनेवाले विष्णुके रूपमें, तदनन्तर जगत्‌का संहार करनेवाले रुद्ररूपमें आप भगवान् नारायणको मेरा नमस्कार है। मत्स्य और कच्छपरूप धारण करनेवाले आप सच्चिदानन्दमय प्रभुको प्रणाम है। वराह और नृसिंह्यरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन और परशुरामरूपधारी आप भगवान्‌को प्रणाम है। राम और बलरामके रूपमें आपको नमस्कार

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७१

है। श्रीकृष्ण, कल्कि तथा विज्ञानात्मा बुद्धके रूपमें आपको नमस्कार है। करुणासिन्धो! नारायण! जगत्पते! आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं निर्लज्ज, कृपण, क्रूर, चुगलखोर, दम्भी, दुर्बल, परायी स्त्री, पराये धन और पराये क्षेत्रके लिये सदा लोलुप रहनेवाला तथा मनसे सबके दोषोंपर ही दृष्टि रखनेवाला हूँ। हरे! कृपया मेरी रक्षा कीजिये।

महर्षि मुद्गलके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात् भगवान् विष्णु मेघके समान गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले—मुद्गल! मैं तुम्हारे इस स्तोत्र और यज्ञसे बहुत प्रसन्न हूँ और प्रत्यक्षरूपसे हविष्यको भोग लगानेके लिये तुम्हारे यज्ञमें आया हूँ।

मुद्गलने कहा—हृषीकेश! मैं कृतार्थ हो गया। मेरी धर्मपत्नी भी धन्य-धन्य हो गयी। आज मेरा जन्म सफल हुआ। मेरी तपस्या सफल हुई; मेरा वंश, मेरे पुत्र, मेरा आश्रय और मेरा सब कुछ आज सफल हो गया। क्योंकि आप साक्षात् भगवान् विष्णु मेरी यज्ञशालामें हविष्य ग्रहण करनेके लिये पधारे हैं। योगपरायण योगी लोग अपने हृदयमें जिनकी खोज करते हैं, उन्हीं आप नारायणको मैं आज प्रत्यक्ष देख रहा हूँ।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णुके लिये आसन दे मुनिने चन्दन और पुष्प आदि उपचारोंसे भगवान्‌को अर्घ्य दे उनका पूजन किया और उनके लिये प्रसन्नतापूर्वक पुरोडाश आदि हविष्य अर्पण किया। विश्वभावन भगवान् विष्णुने महर्षि मुद्गलके द्वारा समर्पित उस हविष्यको स्वयं हाथसे लेकर भोजन किया। भगवान् विष्णुके द्वारा उस हविष्यके भोजन करनेपर अग्निसहित सम्पूर्ण देवता तृप्त हो गये। इतना ही नहीं, ऋत्विज्, यजमान, वहाँके ब्राह्मण तथा जीवलोकमें जो कोई भी चराचर प्राणी थे, वे सब-के-सब तृप्त हो गये। सम्पूर्ण जगत् तृप्त हुआ। तदनन्तर भगवान् विष्णुने कहा—'सुव्रत! मैं प्रसन्न हूँ और वर देनेको उद्यत हूँ, अतः कोई वर माँगो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर महर्षि बोले—'प्रभो! आपने प्रत्यक्षरूपसे दर्शन देकर मेरे यज्ञमें हविष्यको भोग लगाया है। इतनेसे ही मैं कृतार्थ हो गया। इससे अधिक और क्या वर हो सकता है। तथापि भगवन्! 'आपमें निश्चल एवं निष्कपट भक्ति सदा बनी रहे' यह मेरा प्रथम वर है। माधव! मैं प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल आपके स्वरूपभूत अग्निकी तृप्ति एवं आपकी प्रीतिके लिये गायके दूधसे हवन करना चाहता हूँ, मेरी यह इच्छा पूर्ण हो—यह मेरे लिये दूसरा वर है।' मुद्गलजीके ऐसा कहनेपर भगवान् नारायणने अमृतभोजी देवता विश्वकर्मा शिल्पीको बुलाकर उनके द्वारा एक सुन्दर सरोवरका निर्माण करवाया। विश्वकर्माने उसे चारों ओरसे चहारदीवारी आदि लगाकर सब प्रकारसे सुशोभित कर दिया। उसके बाद भगवान्‌ने सुरभिको बुलाकर कहा—'सुरभे! ये मेरे भक्त मुद्गलजी प्रतिदिन मेरी प्रसन्नताके लिये दूधसे हवन करना चाहते हैं। अतः तुम मेरे आदेशसे नित्य सबेरे और सन्ध्याके समय यहाँ आकर इस सरोवरको दूधसे भर दिया करो।' सुरभिने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्‌की आज्ञा स्वीकार की। फिर भगवान्‌ने मुद्गलजीसे कहा—'ब्रह्मन्! इस सरोवरमें सदा सुरभिका दूध वर्तमान रहेगा। तुम उसके द्वारा प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल मेरी प्रसन्नताके लिये अग्निमें होम करो। इससे मैं तुमपर प्रसन्न रहूँगा और मेरी प्रसन्नतासे तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी। यह 'क्षीरसरोवर' नामसे विख्यात तीर्थ होगा। इसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके पाँच महापातक तथा अन्यान्य पाप तत्काल नष्ट हो जायेंगे। मुद्गल! तुम देहावसान होनेपर सब बन्धनोंसे मुक्त हो मुझे प्राप्त होओगे।'

यों कहकर भगवान् विष्णुने मुद्गलको हृदयसे

५७२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लगा लिया। तत्पश्चात् महर्षि मुद्गलने भगवान्‌को प्रणाम किया और भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। भगवान् विष्णुके चले जानेपर महर्षि मुद्गलने प्रतिदिन सुरभिके दूधसे श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये अग्निमें आहुति करते हुए मोक्षदायक फुल्लग्राममें अनेक सौ वर्षोंतक निवास किया। तदनन्तर देहान्त होनेपर उन्होंने भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लिया।


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कपितीर्थकी महिमा—उसमें स्नान करनेसे रम्भा और घृताचीका शापसे उद्धार

श्रीसूतजी कहते हैं—अब मैं 'कपितीर्थ' के माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, जिसे पूर्वकालमें सब वानरोंने मिलकर गन्धमादन पर्वतपर निर्माण किया था। उस तीर्थको बनाकर वानरोंने उसमें हर्षपूर्वक स्नान किया और तीर्थके लिये इस प्रकार वर दिया—'जो मनुष्य भक्तिसे विनीतचित्त होकर इस तीर्थमें स्नान करेंगे, वे महापातकोंसे मुक्त होकर मोक्षके भागी होंगे। इस तीर्थमें गोता लगानेवाले पुरुषोंको नरकका भय नहीं होगा। इसमें स्नान करनेवाले लोगोंको दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। यमराजकी यातना भी नहीं भोगनी पड़ेगी।' इस प्रकार इस तीर्थके लिये वरदान देकर कपीश्वरोंने दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके उनसे भी प्रार्थना की—'स्वामिन् ! आप भी इस तीर्थके लिये अद्भुत वरदान दें।' वानरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उनकी प्रीतिके लिये श्रीरामचन्द्रजीने हर्षपूर्वक उस तीर्थको वरदान दिया—'इस तीर्थमें गोता लगानेवालोंको गंगास्नानका फल मिलेगा, प्रयागस्नानका पुण्य प्राप्त होगा तथा सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होगी। यह अति उत्तम तीर्थ कपियोंद्वारा बनाया गया है, इसलिये संसारमें 'कपितीर्थ' के नामसे इसकी प्रसिद्धि होगी।' अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इस तीर्थमें अवश्य स्नान करना चाहिये। प्राचीन कालकी बात है, कुशिकवंशमें विश्वामित्र नामक राजा हुए। एक समय महाराज विश्वामित्रने अपने राज्यका निरीक्षण करनेके लिये विशाल सेनाके साथ पृथ्वीपर घूमना आरम्भ किया। अनेक देशोंमें घूमकर वे वसिष्ठजीके आश्रमपर गये। महात्मा वसिष्ठने अपनी कामधेनुके प्रभावसे राजा विश्वामित्रका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया। कौशिक विश्वामित्रने कामधेनुका प्रभाव जानकर वसिष्ठजीसे वह सब मनोरथोंको देनेवाली गाय माँगी। वसिष्ठजीने उसे देना अस्वीकार कर दिया। तब वे बलपूर्वक उस गायको खींचकर ले चले। कामधेनुने म्लेच्छोंकी बहुत बड़ी सेना उत्पन्न की, जिससे विश्वामित्रको हार खानी पड़ी। तब उन्होंने महादेवजीकी आराधना करके उनसे अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये और वसिष्ठजीके आश्रमपर जाकर उन सबका प्रयोग करना प्रारम्भ किया। विश्वामित्रने सब अस्त्र चलाये, ब्रह्मास्त्रका भी प्रयोग किया; परंतु ब्रह्मन्दन वसिष्ठजीने अपने तपोबलसे एकमात्र ब्रह्मदण्डके द्वारा विश्वामित्रके उन सब अस्त्रोंको नष्ट कर दिया। इस प्रकार पराजित होनेपर विश्वामित्रको बड़ी लज्जा हुई। अब वे स्वयं ब्राह्मणत्वप्राप्तिके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालय पर्वतपर कौशिकी नदीके पापनाशक पुण्यमय तटपर एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की। निराहार और जितेन्द्रिय रहकर नेत्र बंद करके श्वास और क्रोधको जीतकर वे निश्चल भावसे खड़े रहे। तब इन्द्र आदि देवताओंने रम्भासे कहा—'रम्भे! तुम हिमालय पर्वतपर कौशिकी नदीके किनारे तपस्या करनेवाले महामुनि

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७३
विश्वामित्रको अपने हाव-भावोंसे लुभाओ। जिस प्रकार उनकी तपस्यामें विघ्न पड़े, वैसा प्रयत्न करो।'<br><br>इन्द्रके ऐसा कहनेपर रम्भा विश्वामित्रके आश्रमपर गयी और मुनिके नेत्रोंके सामने खड़ी हो सुन्दर रूप धारण करके अपनी मनोहर चेष्टाओंद्वारा उनके मनको लुभाने लगी। इतनेमें ही मनमें आनन्द बढ़ाती हुई कोयल भी कूक उठी। पिकीका मधुर कलरव सुनकर और रम्भाको वहाँ उपस्थित देखकर मुनिवर विश्वामित्रका हृदय संशयमें पड़ गया। उन्होंने समझ लिया कि 'यह सारी करतूत इन्द्रकी है।' तब उन तपोधनने क्रोधमें आकर रम्भाको शाप दिया— 'रम्भे! मैं क्रोधको जीतनेकी इच्छा रखता हूँ और तू यहाँ विघ्न डालनेके लिये आकर मेरे क्रोधको बढ़ा रही है, इसलिये तू दस लाख वर्षोंतक यहाँ शिला होकर पड़ी रह।'<br><br>विश्वामित्रके इस प्रकार शाप देनेपर रम्भा उनके आश्रमपर बहुत कालतक शिला होकर रही। धर्मात्मा विश्वामित्रने पुनः बड़ी भारी तपस्या करके वसिष्ठके वचनोंद्वारा अनुमोदित तथा दूसरे क्षत्रियोंके लिये दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। फिर उसी पवित्र आश्रममें अगस्त्यजीके प्रिय शिष्य श्वेत मुनिने मोक्षकी इच्छा रखकर बड़ा भारी तप किया। दीर्घकालतक तपस्यामें लगे हुए मुनिवर श्वेतके आश्रमपर एक दिन कोई राक्षसी आयी। उसका नाम अंगारका था।उस भयानक राक्षसीने मूत्र, रक्त और विष्ठा आदिके द्वारा उनके आश्रमको गंदा कर दिया और अनेक उपद्रवोंसे उन्हें सताना आरम्भ किया। तब श्वेतजीने कुपित हो विश्वामित्रजीके शापसे शिलाभावको प्राप्त रम्भाको ही वायव्यास्त्रसे संयोजित करके उस राक्षसीके ऊपर फेंका। वह शिला वायव्यास्त्रसे प्रेरित हो राक्षसीके ऊपर टूट पड़ी। राक्षसी उस शिलाके भयसे भाग चली। भागते-भागते वह दक्षिण समुद्रके तटपर कपितीर्थके समीप जा पहुँची। भयसे वह राक्षसी अत्यन्त व्याकुल हो रही थी। वह शिला भी राक्षसीका पीछा करती हुई वहाँतक गयी और कपितीर्थमें गोता लगाती हुई राक्षसीके ऊपर गिर पड़ी। मस्तकपर शिलाके आघातसे राक्षसी वहीं मर गयी। इधर कपितीर्थमें स्नान करनेसे विश्वामित्रके शापको प्राप्त हुई वह शिला अपने शिलारूपको छोड़कर रम्भाके रूपमें परिणत हो गयी। तत्पश्चात् दिव्य वस्त्रोंसे सुशोभित हो वह दिव्य विमानपर चढ़ी और बारंबार कपितीर्थके माहात्म्यकी प्रशंसा करती हुई अमरावती पुरीको चली गयी। वह राक्षसी भी घृताची नामक अप्सरा थी, जो कपितीर्थमें स्नान करके अपने स्वरूपको प्राप्त हुई। इस प्रकार अगस्त्यशिष्य श्वेतजीके प्रसादसे रम्भा और घृताची कपितीर्थमें स्नान करके शिलाभाव और राक्षसीरूपको त्यागकर अपने-अपने स्वरूपको प्राप्त हो गयीं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक कपितीर्थमें स्नान करना चाहिये।

रामेश्वर नामक महालिंगकी महिमा

श्रीसूतजी कहते हैं— जो मनुष्य भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित रामेश्वर शिवलिंगका एक बार दर्शन कर लेता है, वह भगवान् शंकरके सायुज्यस्वरूप मोक्षको प्राप्त करता है। सत्ययुगमें दस वर्षोंमें जो पुण्य किया जाता है,उसीको त्रेताके मनुष्य एक वर्षमें सिद्ध करते हैं। वही द्वापरमें एक मास और कलियुगमें एक दिनमें साध्य होता है। परंतु जो लोग भगवान् रामेश्वरका दर्शन करते हैं, उनको वही पुण्य कोटिगुना होकर एक-एक पलमें प्राप्त होता है,

५७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


इसमें सन्देह नहीं है*। रामेश्वर नामक महालिंगमें सब तीर्थ, सम्पूर्ण देवता, ऋषि-मुनि तथा पितर विद्यमान हैं। जो एक समय, दो समय, तीनों समय अथवा सर्वदा ही मोक्षदायक रामेश्वर नामक महादेवजीका स्मरण या कीर्तन करते हैं, वे पापसमूहसे मुक्त हो जाते हैं और सच्चिदानन्दमय अद्वैतरूप साम्बशिवको प्राप्त होते हैं। रामेश्वर नामक शिवलिंग भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा पूजित हुआ है, उसके स्मरण करनेमात्रसे यमराजकी पीड़ा नहीं प्राप्त होती। जो मनुष्य रामेश्वर नामक महालिंगको नमस्कार और उसका पूजन करते हैं, उनका जन्म सफल है, वे कृतार्थ हो जाते हैं। जो मनुष्य रामेश्वर नामक महालिंगके प्रति भक्ति रखते हैं, उन लोगोंके प्रणाम, स्मरण और पूजनमें तत्पर रहनेवाले मानव भी कभी दुःख नहीं देखते। करोड़ों जन्मोंमें किये गये जो कोई भी पाप हैं, वे भगवान् रामेश्वरका दर्शन कर लेनेपर तत्काल नष्ट हो जाते हैं। रामेश्वर महालिंगका कीर्तन और पूजन करनेवाला मनुष्य अवश्य ही भगवान् रुद्रका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि क्षणभरमें काष्ठके ढेरको भस्म कर डालती है, वैसे ही भगवान् रामेश्वरका दर्शन करनेवाले लोगोंके सब पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। रामेश्वर महालिंगकी भक्ति आठ प्रकारकी बतायी गयी है—(१) रामेश्वरके भक्तोंके प्रति स्नेह एवं दयाभाव रखना, (२) उन भक्तोंका पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट करना, (३) स्वयं भगवान् रामेश्वरकी भक्तिपूर्वक पूजा करना, (४) उन्हींके लिये देहकी सारी चेष्टाओंका होना, (५) श्रीरामेश्वरकी माहात्म्य-कथा श्रवण करनेमें आदरभाव रखना, (६) उनके प्रति प्रेमाधिक्यके कारण वाणीका गद्गद होना, नेत्रोंमें आँसू आना, शरीरमें रोमांचका उदय होना आदि भावोंका स्फुरण, (७) श्रीरामेश्वर महालिंगका निरन्तर स्मरण करना तथा (८) उसीकी शरण लेकर जीवनधारण करना। जिस-किसी म्लेच्छमें भी ऐसी आठ प्रकारकी भक्ति हो, वह भी मुक्तिक्षेत्रोंके मोक्षरूपी धनका अधिकारी बताया गया है। अनन्य भक्ति और ब्रह्मज्ञानके द्वारा मुक्ति निश्चित है। ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंको वेदान्तशास्त्रके श्रवणसे जो मुक्ति प्राप्त होती है, वही सब वर्णों और सब आश्रमके लोगोंको दर्शनशास्त्रके श्रवणजनित ज्ञानके बिना ही केवल रामेश्वर महालिंगके दर्शनसे ही प्राप्त हो जाती है। योगयुक्त ऊर्ध्वरेता मुनियोंकी जो गति होती है, वही भगवान् रामेश्वरका दर्शन करनेवाले समस्त प्राणियोंकी होती है। जो मनुष्य रामेश्वर शिवके क्षेत्रकी प्रसन्नतापूर्वक यात्रा करते हैं, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका पुण्य प्राप्त होता है। अम्बा-पार्वतीसहित परम दयालु रामेश्वर महालिंगरूप भगवान् शिवमें भक्ति होनी अत्यन्त दुर्लभ है, उनकी पूजाका शुभ अवसर भी दुर्लभ है तथा उनका स्तवन और स्मरण भी अत्यन्त दुर्लभ है। जिसकी बुद्धि निरन्तर रामेश्वर महालिंगका चिन्तन करती है, वही इस पृथ्वीपर धन्यातिधन्य पुरुष है। श्रीरामेश्वर महालिंगका दर्शन करनेवाले पुरुषके दर्शनमात्रसे दूसरे प्राणियोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो प्रातःकाल उठकर तीन बार रामनाथ (रामेश्वर) शब्दका


* दशवर्षैस्तु यत्पुण्यं क्रियते तु कृते युगे। त्रेतायामेकवर्षेण तत्पुण्यं साध्यते नृभिः॥
द्वापरे तच्च मासेन तद्दिनेन कलौ युगे। तत्फलं कोटिगुणितं निमिषे निमिषे नृणाम्॥
निस्सन्देहं भवेद्देवं रामनाथविलोकिनाम्॥
(स्क० पु० ब्रा० से० मा० ४३। ३–५)

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७५

उच्चारण करता है, उसका पहले दिनका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। यदि प्राणत्यागके समय मनुष्य भगवान् रामेश्वरका स्मरण करे, तो फिर उसका जन्म नहीं होता। 'रामनाथ! महादेव! करुणानिधे! सदा मेरी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार जो सदा उच्चारण करता है, वह कलियुगसे पीड़ित नहीं होता*। 'रामनाथ! जगन्नाथ! धूर्जटे! नीललोहित!' जो इस प्रकार सदा बोलता है, उसे माया नही सताती। 'नीलकण्ठ! महादेव! रामेश्वर! सदाशिव!' सदा ऐसा बोलनेवाला प्राणी कभी कामसे कष्ट नहीं पाता। 'हे रामेश्वर! हे यमराजके शत्रु! हे कालकूट विषका भक्षण करनेवाले शिव!' प्रतिदिन इस प्रकार उच्चारण करनेवाला पुरुष कभी क्रोधसे पीड़ित नहीं होता। जो स्फटिक आदि भिन्न-भिन्न शिलाओंसे भगवान् रामेश्वरका मन्दिर बनाता है, वह श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् शिवके लोकको जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक त्रिशूलधारी भगवान् रामेश्वरके स्नानके समयमें रुद्राध्याय, चमक, पुरुषसूक्त, त्रिसुपर्ण, पंचशान्ति तथा पावमानी आदि ऋचाओंको प्रेमपूर्वक जपता है, वह कभी नरकका कष्ट नहीं भोगता है। जो रामेश्वर महालिंगको गायके दूधसे स्नान कराता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकमें पूजित होता है। दहीसे स्नान करानेवाला पुरुष सब पापोंसे छूटकर भगवान् विष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। रामेश्वर शिवको नारियलके जलसे कराया हुआ स्नान ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाशक बताया गया है। वस्त्रसे छानकर शुद्ध किये हुए जलके द्वारा रामेश्वर महादेवको स्नान करानेवाला पुरुष वरुणलोकमें जाता है। पुष्पोंके सुगन्धसे वासित जलके द्वारा दयानिधान रामेश्वर महालिंगको स्नान करानेवाला मनुष्य शिवलोकमें पूजित होती है। 'रामसेतु धनुष्कोटिमें विराजमान भगवान् रामेश्वर!' ऐसा उच्चारण करके मनुष्य जहाँ कहीं भी स्नान करे, सेतु-स्नानका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य रामेश्वर शिवके टूटे-फूटे हुए मन्दिरको बनाता या उसकी मरम्मत करता है, वह दस सहस्र ब्रह्महत्याओंको जला डालता है। जो मनुष्य भगवान् रामेश्वरके आगे प्रसन्नतापूर्वक दीपक अर्पण करता है, वह अविद्यामय अन्धकारका भेदन करके प्रकाशस्वरूप सनातन ब्रह्मको प्राप्त होता है। भगवान् रामेश्वरके उद्देश्यसे जो थोड़ा भी आदरपूर्वक दान किया जाता है, वह दाताको परलोकमें अनन्त फल देनेवाला होता है। महाक्षेत्र रामेश्वरमें श्रीरामनाथजीके समीप निवास करनेवाला मनुष्य पुनरावृत्तिरहित मोक्षको प्राप्त होता है। संसारका लाड़-प्यार छोड़कर आपत्तिग्रस्त मनुष्योंकी पीड़ा दूर करनेवाले रामेश्वर महालिंगका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये। भगवान् रामेश्वरका पूजन, वन्दन, स्मरण, श्रवण और दर्शन कर लेनेपर कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। जो लाये हुए गंगाजलके द्वारा रामेश्वर नामक महालिंगको स्नान कराता है, वह भगवान् शिवके लिये भी आदरणीय हो जाता है। जबतक मृत्यु नहीं आती, जबतक बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता और जबतक सम्पूर्ण इन्द्रियाँ शिथिल नहीं हो जातीं, तभीतक मोक्ष चाहनेवाले मनुष्योंको सदैव भगवान् रामेश्वरका वन्दन, पूजन, चिन्तन तथा स्तवन कर लेना चाहिये। परम दयालु भगवान् रामेश्वरका जो भक्तिपूर्वक सदा भजन करते हैं, वे इस


* रामनाथ महादेव मां रक्ष करुणानिधे। इति यः सततं ब्रूयात् कलिनासौ न बाध्यते ॥
(स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४३। ७१)

५७६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भूतलपर सदा सुखी होते हैं और अन्तमें सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार रामेश्वर महालिंगकी महिमाका वर्णन किया गया। जो इस | प्रसंगको भक्तिपूर्वक पढ़ता और सुनता है, वह श्रीरामेश्वरकी सेवाके परम उत्तम फलको पाता है।

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भगवान् श्रीरामके द्वारा राक्षसोंसहित रावणका वध और सेतुके क्षेत्रमें रामेश्वरलिंगकी स्थापना

**ऋषि बोले—**सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले सूतजी ! आपने इस पुराणकी कथा सुनाकर हमलोगोंपर बड़ा अनुग्रह किया। दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार शिवलिंगकी स्थापना की है, उसको हमलोग सुनना चाहते हैं।

**सूतजीने कहा—**वानरोंकी सेनाके साथ महेन्द्रगिरिपर आकर लक्ष्मणसहित महाबली श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रका दर्शन किया। तत्पश्चात् अपार समुद्रके ऊपर सेतु बाँधकर उसीके मार्गसे श्रीरघुनाथजी रावणपालित लंकापुरीको गये। वहाँ पहुँचनेपर सूर्यास्त हो गया। पूर्णिमाके प्रदोषकालमें सेनासहित श्रीरामचन्द्रजी सुवेल पर्वतपर आरूढ़ हो गये। तदनन्तर रात्रिमें महलकी छतपर खड़े हुए लंकापति रावणको देखकर महाबली सूर्यपुत्र सुग्रीवने उसके मुकुटको धरतीपर गिरा दिया। मुकुट भंग हो जानेसे राक्षस घरमें घुस गया। लंकेश्वरके घरमें घुस जानेपर सुग्रीव, लक्ष्मण और सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीने पर्वतके किनारेसे उतरकर लंकाके समीप अपनी सेनाको ठहराया। वहाँ ठहराये जाते हुए वानरोंपर रावणके विशालकाय सैनिकोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर आक्रमण किया। वे सभी दुष्टात्मा राक्षस अदृश्य होकर आये थे। विभीषणने उन सबका अन्तर्धान-विद्यासे ही वध किया। बहुतसे बलवान् वानरोंद्वारा कितने ही राक्षस मारे गये। भयंकर पराक्रमी वानरोंने जिनका अंग-भंग कर दिया था, ऐसे मरनेसे बचे हुए राक्षस शीघ्र ही रावणपालित लंकापुरीमें भाग गये। उस सेनाके नष्ट हो जानेपर रावणके भेजे हुए इन्द्रजित्ने युद्धमें अत्यन्त भयंकर नागास्त्रोंद्वारा दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मणको बाँध लिया। तत्पश्चात् विनतानन्दन महात्मा गरुड़ने आकर उन दोनों भाइयोंको नागपाशसे मुक्त किया। तब विभीषणने आठ घण्टावाली विशाल शक्ति हाथमें लेकर उसे अभिमन्त्रित करके प्रहस्तके मस्तकपर चलाया। उस वज्रकी भाँति गिरती हुई शक्तिने राक्षसका मस्तक काट लिया, जिससे वह आँधीसे गिराये हुए वृक्षकी भाँति दिखायी देने लगा। राक्षस प्रहस्तको युद्धमें मारा गया देख धूम्राक्षने बड़े वेगसे वानरोंपर आक्रमण किया। वानर भाग चले। वानर-सेनाको भागते हुए देख पवनकुमार हनुमान्जीने धूम्राक्षको शीघ्र ही मार डाला। धूम्राक्षको मारा गया देख मरनेसे बचे हुए निशाचरोंने सब समाचार राजा रावणको बताया। तब रावणने कुम्भकर्णको सोतेसे जगाया और उसे युद्ध करनेके लिये भेजा। युद्धमें आये हुए कुम्भकर्णको लक्ष्मणजीने कुपित होकर ब्रह्मास्त्रसे मारा, जिससे वह प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा। तब वहाँ दूषण नामक राक्षसके दो छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी, जो युद्धमें रावणके समान ही बली थे, आये और हनुमान् एवं अंगदके हाथों मारे गये। विश्वकर्माके पुत्र नलने वज्रदंष्ट्रको तथा कुमुद नामक श्रेष्ठ वानरने अकम्पनको मारा। लक्ष्मणजीने अतिकाय और त्रिशिराका वध किया। सुग्रीवने देवान्तक तथा

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७७

नरान्तकको मौतके घाट उतारा। हनुमान्‌जीने कुम्भकर्णके दोनों पुत्रोंको मार डाला। विभीषणने खरके पुत्र मकराक्षका वध किया।

तदनन्तर रावणने इन्द्रजित्‌को युद्धके लिये भेजा। इन्द्रजित्‌ने दोनों भाई राम और लक्ष्मणको मोहित किया। इतनेमें ही अंगदने उसके रथके घोड़ोंको मार डाला। वाहनशून्य हो जानेपर वह आकाशमें स्थित हो गया। उसके प्रहारसे घायल हुए कुमुद, अंगद, सुग्रीव, नल और जाम्बवान् आदिके साथ प्रायः सभी वानर धरतीपर गिर पड़े। इस प्रकार सेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धमें घायल करके महाबली मेघनाद आकाशमें अदृश्य हो गया। तब विभीषणने इक्ष्वाकुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीसे बारंबार प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—'प्रभो! कुबेरकी आज्ञासे एक गुह्यक आपकी सेवामें यह दिव्य जल लेकर उपस्थित हुआ है, महाराज ! इसे कुबेर अन्तर्धान-विद्यासे अदृश्य हुए प्राणियोंको देखनेके लिये आपको अर्पित करते हैं। इसको आँखमें लगा लेनेसे आप आकाशमें अदृश्य हुए प्राणियोंको भी देख सकेंगे और जिसके लिये आप यह जल देंगे, वह भी उन प्राणियोंको देख सकेगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीने आदरपूर्वक उस जलको ग्रहण किया और उससे अपने नेत्रोंको धोया। तत्पश्चात् महाबली लक्ष्मण, सुग्रीव, जाम्बवान्, हनुमान्, अंगद, मैंद, द्विविद, नील तथा अन्य जो वानर थे, उन सबने श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए जलसे अपने-अपने नेत्र धो लिये। तब उन्होंने आकाशमें छिपे हुए वीरवर मेघनादको देखा। दृष्टि पड़ जानेपर सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उसपर आक्रमण किया। तब लक्ष्मण और मेघनादमें अत्यन्त विचित्र तथा आश्चर्यजनक युद्ध हुआ। तीसरे दिन बड़े प्रयाससे महाबली लक्ष्मणके द्वारा मेघनाद युद्धमें मारा गया।

अपने प्रिय पुत्रके मारे जानेपर रावणको बड़ा क्रोध हुआ। वह बहुत-सी सेना साथ ले रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। तब इन्द्रसारथि मातलि हरे घोड़े जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी रथके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने इन्द्रके भेजे हुए उस रथपर सवार हो युद्धमें ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके राक्षसराज रावणके सभी मस्तक काट डाले। रावणके मारे जानेपर देवताओं और ऋषियोंने दशरथनन्दन श्रीरामको आशीर्वाद दे उनकी जय-जयकार की और अत्यन्त सन्तुष्ट हो भगवान्‌का स्तवन किया। सिद्धों तथा विद्याधरोंने कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीपर फूलोंकी वर्षा की। तब श्रीरामचन्द्रजी उन देवताओं, वानर सैनिकों तथा सीता और लक्ष्मणके साथ लंकामें विभीषणको राजाके पदपर अभिषिक्त करके पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर आये। गन्धमादन पर्वतपर विदेहनन्दिनी सीताकी अग्निपरीक्षाद्वारा शुद्धि की गयी। तदनन्तर दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले मुनि अगस्त्यजीको आगे करके कमलनयन जानकी-वल्लभ श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये और उनकी स्तुति करने लगे।

मुनि बोले—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले आप भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आपने इस संसारको रावणसे शून्य करनेके लिये अवतार लिया है, आपको नमस्कार है। ताड़काका संहार और विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले आपको नमस्कार है। मारीचको जीतनेवाले, सुबाहुका प्राण हरण करनेवाले श्रीराम ! आपको नमस्कार है। आपके चरणारविन्दोंकी धूलि अहल्याको मुक्ति देनेवाली है, आपने भगवान् शंकरके धनुषको लीलापूर्वक भंग किया है, आपको नमस्कार है। मिथिलेशकुमारी सीताके पाणिग्रहण-सम्बन्धी उत्सवसे सुशोभित होनेवाले आपको नमस्कार है। रेणुकानन्दन परशुरामजीको पराजित करनेवाले आपको नमस्कार है। कैकेयीके दो

५७८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वरदानोंसे विवश हुए पिताके वचनको सत्य करनेके लिये सीता और लक्ष्मणके साथ वनकी यात्रा करनेवाले आपको नमस्कार है। भरतकी प्रार्थनापर उन्हें अपने चरणोंकी युगल पादुका समर्पित करनेवाले आपको नमस्कार है। शरभंग मुनिको अपने परम धामकी प्राप्ति करानेवाले आपको नमस्कार है। विराध राक्षसका संहार करनेवाले तथा गृध्रराज जटायुको अपना सखा बनानेवाले आपको नमस्कार है। मायासे मृगका रूप धारण करके आये हुए महाक्रूर मारीचके शरीरको अपने बाणोंसे विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। रावणसे हरी गयी सीताको छुड़ानेके लिये जिन्होंने युद्धमें अपने शरीरका त्याग कर दिया, उन जटायुको अपने हाथसे दाह-संस्कार करके कैवल्य मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। कबन्धका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। शबरीने आपके चरणारविन्दोंका पूजन किया है, आपने सुग्रीवके साथ मैत्री जोड़ी है तथा बालि नामक वानरका वध किया है, आपको नमस्कार है। वरुणालय समुद्रमें सेतुनिर्माण करनेवाले आपको नमस्कार है। समस्त राक्षसोंका संहार तथा रावणका प्राण हरण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके चरणारविन्द संसारसागरसे पार उतारनेके लिये जहाज हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप आप श्रीरघुनाथजीको नमस्कार है। जगत्के अभ्युदयके कारणभूत आप श्रीरामभद्रको नमस्कार है। राम आदि पवित्र नामोंका जप करनेवाले मनुष्योंके पाप हर लेनेवाले आपको नमस्कार है। आप सब लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। करुणामूर्ति ! आपको नमस्कार है। भक्तोंकी रक्षाके व्रतकी दीक्षा लेनेवाले प्रभो ! आपको नमस्कार है। सीतासहित आपको नमस्कार है। विभीषणको सुख देनेवाले श्रीराम ! आपने लंकापति रावणका वध करके सम्पूर्ण जगत्की रक्षा की है, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ ! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। जानकीपते ! हम सबका पालन कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके सब मुनि चुप हो गये।

सूतजी कहते हैं— मुनियोंद्वारा किये हुए श्रीरामचन्द्रजीके इस स्तोत्रका जो भक्तिपूर्वक तीनों समय पाठ करता है, वह भोग और मोक्षको प्राप्त करता है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे भूत-वेताल भाग जाते हैं, रोग दूर होते हैं और पापसमूहोंका नाश हो जाता है।

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़ प्रणाम करके मुनियोंसे कहा—मुनिवरो ! जो सदा आत्मलाभसे ही सन्तुष्ट, सम्पूर्ण भूतोंके सुहृद्, अहंकारशून्य, शान्त और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) हैं, उन साधु-महात्माओंको मैं भक्तियुक्त चित्तसे प्रणाम करता हूँ। मैं ब्राह्मणोंका हितकारी—ब्रह्मण्यदेव हूँ; इसलिये सदा ब्राह्मणोंका सेवन करता हूँ। इस समय आपलोगोंसे मैं कुछ पूछता हूँ, आप उसे विचारकर उत्तर दें। ब्राह्मणो ! रावणके वधसे मुझे जो पाप लगा है, उसका प्रायश्चित्त क्या है ? यह मुझे बताइये।

मुनि बोले— सत्यकी रक्षाका व्रत लेनेवाले जगन्नाथ ! आप समस्त संसारकी रक्षाका भार वहन करनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्के उपकारके लिये यहाँ शिवजीकी आराधना कीजिये। गन्धमादन पर्वतका यह शिखर अतिशय पुण्यमय तथा मोक्ष देनेवाला है। आप यहाँ लोकसंग्रहके लिये शिवलिंगकी प्रतिष्ठा कीजिये। इससे रावणके मारनेसे होनेवाला दोष भी दूर हो जायगा। प्रभो ! गन्धमादन पर्वतपर आपके द्वारा जिस शिवलिंगकी स्थापना होगी, उसका दर्शन मनुष्योंको काशी-विश्वनाथके दर्शनसे कोटिगुना अधिक फल देनेवाला होगा। साथ ही वह शिवलिंग संसारमें आपके ही नामसे ख्यातिलाभ करेगा। इसलिये रघुनाथजी ! आप शिवलिंग-स्थापनाके कार्यमें विलम्ब न करें।