संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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- ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५७३
| विश्वामित्रको अपने हाव-भावोंसे लुभाओ। जिस प्रकार उनकी तपस्यामें विघ्न पड़े, वैसा प्रयत्न करो।'<br><br>इन्द्रके ऐसा कहनेपर रम्भा विश्वामित्रके आश्रमपर गयी और मुनिके नेत्रोंके सामने खड़ी हो सुन्दर रूप धारण करके अपनी मनोहर चेष्टाओंद्वारा उनके मनको लुभाने लगी। इतनेमें ही मनमें आनन्द बढ़ाती हुई कोयल भी कूक उठी। पिकीका मधुर कलरव सुनकर और रम्भाको वहाँ उपस्थित देखकर मुनिवर विश्वामित्रका हृदय संशयमें पड़ गया। उन्होंने समझ लिया कि 'यह सारी करतूत इन्द्रकी है।' तब उन तपोधनने क्रोधमें आकर रम्भाको शाप दिया— 'रम्भे! मैं क्रोधको जीतनेकी इच्छा रखता हूँ और तू यहाँ विघ्न डालनेके लिये आकर मेरे क्रोधको बढ़ा रही है, इसलिये तू दस लाख वर्षोंतक यहाँ शिला होकर पड़ी रह।'<br><br>विश्वामित्रके इस प्रकार शाप देनेपर रम्भा उनके आश्रमपर बहुत कालतक शिला होकर रही। धर्मात्मा विश्वामित्रने पुनः बड़ी भारी तपस्या करके वसिष्ठके वचनोंद्वारा अनुमोदित तथा दूसरे क्षत्रियोंके लिये दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। फिर उसी पवित्र आश्रममें अगस्त्यजीके प्रिय शिष्य श्वेत मुनिने मोक्षकी इच्छा रखकर बड़ा भारी तप किया। दीर्घकालतक तपस्यामें लगे हुए मुनिवर श्वेतके आश्रमपर एक दिन कोई राक्षसी आयी। उसका नाम अंगारका था। | उस भयानक राक्षसीने मूत्र, रक्त और विष्ठा आदिके द्वारा उनके आश्रमको गंदा कर दिया और अनेक उपद्रवोंसे उन्हें सताना आरम्भ किया। तब श्वेतजीने कुपित हो विश्वामित्रजीके शापसे शिलाभावको प्राप्त रम्भाको ही वायव्यास्त्रसे संयोजित करके उस राक्षसीके ऊपर फेंका। वह शिला वायव्यास्त्रसे प्रेरित हो राक्षसीके ऊपर टूट पड़ी। राक्षसी उस शिलाके भयसे भाग चली। भागते-भागते वह दक्षिण समुद्रके तटपर कपितीर्थके समीप जा पहुँची। भयसे वह राक्षसी अत्यन्त व्याकुल हो रही थी। वह शिला भी राक्षसीका पीछा करती हुई वहाँतक गयी और कपितीर्थमें गोता लगाती हुई राक्षसीके ऊपर गिर पड़ी। मस्तकपर शिलाके आघातसे राक्षसी वहीं मर गयी। इधर कपितीर्थमें स्नान करनेसे विश्वामित्रके शापको प्राप्त हुई वह शिला अपने शिलारूपको छोड़कर रम्भाके रूपमें परिणत हो गयी। तत्पश्चात् दिव्य वस्त्रोंसे सुशोभित हो वह दिव्य विमानपर चढ़ी और बारंबार कपितीर्थके माहात्म्यकी प्रशंसा करती हुई अमरावती पुरीको चली गयी। वह राक्षसी भी घृताची नामक अप्सरा थी, जो कपितीर्थमें स्नान करके अपने स्वरूपको प्राप्त हुई। इस प्रकार अगस्त्यशिष्य श्वेतजीके प्रसादसे रम्भा और घृताची कपितीर्थमें स्नान करके शिलाभाव और राक्षसीरूपको त्यागकर अपने-अपने स्वरूपको प्राप्त हो गयीं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक कपितीर्थमें स्नान करना चाहिये। |
रामेश्वर नामक महालिंगकी महिमा
| श्रीसूतजी कहते हैं— जो मनुष्य भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित रामेश्वर शिवलिंगका एक बार दर्शन कर लेता है, वह भगवान् शंकरके सायुज्यस्वरूप मोक्षको प्राप्त करता है। सत्ययुगमें दस वर्षोंमें जो पुण्य किया जाता है, | उसीको त्रेताके मनुष्य एक वर्षमें सिद्ध करते हैं। वही द्वापरमें एक मास और कलियुगमें एक दिनमें साध्य होता है। परंतु जो लोग भगवान् रामेश्वरका दर्शन करते हैं, उनको वही पुण्य कोटिगुना होकर एक-एक पलमें प्राप्त होता है, |